एससी-एसटी आरक्षण में आय आधारित मानदंड लागू करने से केंद्र का इनकार, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया हलफनामा

भारत में आरक्षण व्यवस्था केवल आर्थिक स्थिति पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर तय की गई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट किया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से प्रस्तुत इस जवाब में कहा गया है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणियों के भीतर आय-आधारित प्राथमिकताएं लागू करने या क्रीमी लेयर का सिद्धांत विस्तारित करने का निर्णय केवल संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।

नीतिगत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का विरोध

सरकार ने शीर्ष अदालत से 15 जून 2026 को दायर की गई उस याचिका को निरस्त करने की अपील की है, जिसमें सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक प्रवेश प्रक्रियाओं में ‘मेरिट-कम-मीन्स’ मॉडल अपनाने की मांग की गई थी। याचिका में एससी, एसटी, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के भीतर आय आधारित उप-कोटा बनाने के लिए दिशानिर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया था।

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कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि बिना किसी विधायी जनादेश या ठोस सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के अदालत को नीतिगत विषयों में निर्देश देने से बचना चाहिए। मंत्रालय के अनुसार, आरक्षण व्यवस्था की मूल संरचना में ऐसा कोई भी संशोधन करने से पहले व्यापक समीक्षा और प्रामाणिक डेटा का अध्ययन आवश्यक है।

संवैधानिक प्रावधान और अदालती नजीरें

केंद्र ने अपने हलफनामे में विभिन्न कानूनी फैसलों का उल्लेख करते हुए बताया कि क्रीमी लेयर को बाहर रखने की अवधारणा मुख्य रूप से ओबीसी आरक्षण के संदर्भ में विकसित की गई थी। 10 अप्रैल 2008 को अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने साफ किया था कि यह सिद्धांत एससी और एसटी श्रेणियों पर लागू नहीं होता है।

इसके अतिरिक्त, वर्ष 2005 के ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में पांच जजों की पीठ के निर्णय को रेखांकित करते हुए सरकार ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341 के खंड (2) के तहत अनुसूचित जातियों की सूची में संशोधन या क्रीमी लेयर को हटाने का अधिकार विशेष रूप से संसद को ही प्राप्त है।

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याचिकाकर्ताओं ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह मामले का संदर्भ देते हुए एससी-एसटी के भीतर अधिक जरूरतमंदों को प्राथमिकता देने का तर्क दिया था। इसके उत्तर में सरकार ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जातियों की पहचान अस्पृश्यता से जुड़े ऐतिहासिक भेदभाव और अनुसूचित जनजातियों की पहचान भौगोलिक अलगाव एवं विशिष्ट सांस्कृतिक विशेषताओं पर आधारित है। सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि आरक्षण के अलावा अन्य सरकारी विकास व कल्याणकारी योजनाओं में पहले से ही आय जांच की व्यवस्था लागू है, ताकि मदद पात्र लाभार्थियों तक पहुंच सके।

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