ऑटिस्टिक बेटे का इलाज न करा पाने की मजबूरी में न्यायिक अधिकारी ने दिया था इस्तीफा, यह स्वैच्छिक नहीं था: उड़ीसा हाईकोर्ट ने बहाली का दिया आदेश

उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा है कि न्यायिक अधिकारी इप्सिता मोहंती ने अपने ऑटिस्टिक बेटे के लिए तैनाती वाले स्थान पर जरूरी इलाज और थेरेपी की सुविधा न मिल पाने की परिस्थितियों में इस्तीफा दिया था और इसे स्वैच्छिक नहीं माना जा सकता। जस्टिस मानस रंजन पाठक और जस्टिस सिबो शंकर मिश्रा की बेंच ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर सेवा से मुक्त करने वाली अधिसूचना रद्द करते हुए उन्हें अपर सिविल जज (जूनियर डिवीजन)-कम-एसडीजेएम के पद पर तत्काल बहाल करने का निर्देश दिया। हालांकि, जिस अवधि में उन्होंने काम नहीं किया, उसके लिए उन्हें पिछला वेतन नहीं मिलेगा।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि मोहंती ने 21 दिसंबर 2022 को अपना इस्तीफा वापस ले लिया था, जबकि उस समय तक सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी ने इसे स्वीकार नहीं किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फुल कोर्ट द्वारा इस्तीफा स्वीकार करने की सिफारिश अपने आप में नियुक्ति प्राधिकारी की स्वीकृति नहीं मानी जा सकती। ओडिशा न्यायिक सेवा नियम, 2007 के तहत सिविल जजों के मामले में नियुक्ति प्राधिकारी राज्यपाल हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

मोहंती का बेटा वर्ष 2016 से ऑटिज्म से पीड़ित है। फैसले के अनुसार, जब मोहंती भुवनेश्वर में तैनात थीं, तब वह अपने बेटे को उचित चिकित्सा और थेरेपी उपलब्ध करा पा रही थीं, जिससे उसकी स्थिति में सुधार भी हुआ था।

जुलाई 2022 में उनका ट्रांसफर ढेंकनाल जजशिप के हिंडोल में कर दिया गया। इसके बाद बेटे का जरूरी इलाज और थेरेपी जारी रखने में उन्हें परेशानी होने लगी। उन्होंने अपने बेटे के इलाज के लिए ढाई वर्ष तक भुवनेश्वर में तैनाती की मांग करते हुए एक प्रतिवेदन दिया।

हाईकोर्ट ने पाया कि उनके प्रतिवेदन पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि राज्य सरकार या हाईकोर्ट प्रशासन ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि ढेंकनाल, हिंडोल या आसपास के क्षेत्रों में ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे के लिए उचित चिकित्सा सुविधा, इलाज और प्रशिक्षित थेरेपिस्ट उपलब्ध नहीं थे। हिंडोल ट्रांसफर होने के बाद उनके बेटे की स्थिति भी बिगड़ गई थी।

इन परिस्थितियों के बीच मोहंती ने 29 नवंबर 2022 को अपना इस्तीफा दे दिया। 20 दिसंबर को फुल कोर्ट ने इस्तीफा स्वीकार करने की सिफारिश करते हुए इसे राज्य सरकार को भेजने का निर्णय लिया।

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हालांकि, अगले ही दिन यानी 21 दिसंबर को मोहंती ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया और सेवा में बने रहने की अनुमति मांगी। ढेंकनाल के जिला जज ने उसी दिन उनका आवेदन हाईकोर्ट प्रशासन को भेज दिया।

तत्कालीन चीफ जस्टिस ने 22 दिसंबर को इस्तीफा वापस लेने के उनके अनुरोध को फुल कोर्ट के समक्ष रखने का निर्देश दिया। लेकिन फैसले के अनुसार, बाद में हुए इन घटनाक्रमों की जानकारी राज्य के कानून विभाग और राज्यपाल को नहीं दी गई।

राज्यपाल ने फुल कोर्ट की पहले की सिफारिश के आधार पर 31 दिसंबर 2022 को इस्तीफे से संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके बाद राज्य सरकार ने 2 जनवरी 2023 को अधिसूचना जारी कर मोहंती को सेवा से मुक्त कर दिया।

हाईकोर्ट के समक्ष दलीलें

मोहंती की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा इस्तीफा स्वीकार किए जाने से पहले ही उसे वापस ले लिया था। ऐसे में अधिकारियों को उन्हें सेवा से मुक्त करने से पहले इस्तीफा वापस लेने के उनके अनुरोध पर विचार करना चाहिए था। उन्होंने 2 जनवरी की अधिसूचना रद्द कर सेवा में बहाली और अन्य परिणामी सेवा लाभ देने की मांग की।

उनकी ओर से अधिवक्ता मनोज कुमार खुंटिया ने सुप्रीम कोर्ट के Ms. X v. Registrar General, High Court of Madhya Pradesh and Another के फैसले पर भरोसा किया।

रजिस्ट्रार जनरल की ओर से सीनियर एडवोकेट गौतम मिश्रा ने Shriram Manohar Bande v. Utkranti Mandal and Others के फैसले का हवाला दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि उस मामले के तथ्य मौजूदा मामले से अलग थे।

इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं था

हाईकोर्ट ने मोहंती के इस्तीफे से जुड़ी परिस्थितियों पर गौर किया। इसमें उनके बेटे की मेडिकल स्थिति, हिंडोल ट्रांसफर और वहां जरूरी इलाज तथा थेरेपी उपलब्ध कराने में आ रही परेशानी शामिल थी।

कोर्ट ने कहा:

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“याचिकाकर्ता द्वारा 29.11.2022 को दिया गया इस्तीफा बिल्कुल भी स्वैच्छिक नहीं था और यह मजबूर करने वाली परिस्थितियों तथा दबाव में दिया गया था।”

कोर्ट ने ओडिशा सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1992 के नियम 34(4) पर भी विचार किया। इसके तहत नियुक्ति प्राधिकारी जनहित में इस्तीफा वापस लेने की अनुमति दे सकता है, जहां इस्तीफा ऐसी मजबूर करने वाली परिस्थितियों में दिया गया हो जिनका कर्मचारी की सत्यनिष्ठा, कार्यक्षमता या आचरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़ता हो और बाद में उन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव आया हो जिनके कारण इस्तीफा दिया गया था।

रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि मोहंती के खिलाफ कोई विभागीय कार्यवाही या विजिलेंस केस लंबित या प्रस्तावित नहीं था और उनकी सत्यनिष्ठा या कार्यक्षमता के संबंध में कोई प्रतिकूल सामग्री नहीं थी। इस्तीफा देने के बाद भी वह अपनी ड्यूटी करती रही थीं।

नियुक्ति प्राधिकारी की स्वीकृति से पहले वापस लिया गया था इस्तीफा

हाईकोर्ट ने कहा कि लागू सेवा नियमों के तहत सिविल जजों की नियुक्ति और उनका इस्तीफा स्वीकार करने वाले सक्षम प्राधिकारी राज्यपाल हैं। संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका पर हाईकोर्ट का नियंत्रण होने के बावजूद वह सिविल जजों का नियुक्ति प्राधिकारी नहीं है।

जस्टिस सिबो शंकर मिश्रा ने जस्टिस मानस रंजन पाठक के फैसले से सहमति जताते हुए अपने अतिरिक्त कारणों में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की संवैधानिक स्थिति तथा अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी सेवा नियमों से नियंत्रित होते हैं और उनका इस्तीफा सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकार किए जाने पर प्रभावी होता है।

Union of India v. Gopal Chandra Misra के फैसले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी कानूनी, संविदात्मक या संवैधानिक रोक के अभाव में भविष्य की तारीख से प्रभावी होने वाला इस्तीफा प्रभावी होने से पहले वापस लिया जा सकता है।

मोहंती के मामले में इस सिद्धांत को लागू करते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा:

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“याचिकाकर्ता द्वारा 29.11.2022 को दिया गया इस्तीफा 21.12.2022 को वापस ले लिया गया था, जो सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा 02.01.2023 को इसे स्वीकार किए जाने की तारीख से काफी पहले था। इसलिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष स्वीकार करने के लिए कोई वैध इस्तीफा पत्र मौजूद नहीं था।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फुल कोर्ट द्वारा इस्तीफे को मंजूरी देना और उसे सरकार के पास भेजना नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा इस्तीफा स्वीकार किया जाना नहीं माना जा सकता।

बहाली का आदेश, पिछला वेतन नहीं मिलेगा

हाईकोर्ट ने अंततः कहा कि मोहंती द्वारा 29 नवंबर 2022 को दिए गए इस्तीफे को स्वैच्छिक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने उन्हें सेवा से मुक्त करने वाली 2 जनवरी 2023 की अधिसूचना को कानून की नजर में गलत मानते हुए रद्द कर दिया।

कोर्ट ने अधिकारियों को मोहंती को अपर सिविल जज (जूनियर डिवीजन)-कम-एसडीजेएम के पद पर तत्काल बहाल करने का निर्देश दिया।

हालांकि, जिस अवधि में मोहंती ने काम नहीं किया, उसके लिए उन्हें पिछला वेतन नहीं मिलेगा। उन्होंने हाईकोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि यदि उन्हें दोबारा सेवा में शामिल होने की अनुमति दी जाती है तो वह इस अवधि के वित्तीय लाभ का दावा नहीं करेंगी।

कोर्ट ने उन्हें 3 जनवरी 2023 से सेवा की निरंतरता और उस तारीख से अन्य सभी परिणामी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया। रिट याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने मामले में कॉस्ट को लेकर कोई आदेश नहीं दिया।

केस टाइटल: इप्सिता मोहंती बनाम स्टेट ऑफ ओडिशा एवं अन्य

केस नंबर: W.P.(C) No. 15819 of 2023

बेंच: जस्टिस मानस रंजन पाठक और जस्टिस सिबो शंकर मिश्रा

फैसले की तारीख: 10 सितंबर 2026

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