कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ दायर जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया। यह याचिका कोलकाता में एक जनसभा के दौरान बांग्लादेशी कार्यकर्ता की हत्या को लेकर उनके द्वारा दिए गए कथित बयानों के संबंध में दाखिल की गई थी। चीफ जस्टिस रवींद्र विठ्ठलराव घुगे की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यह याचिका जनहित याचिका के रूप में विचारणीय नहीं है।
एक वकील द्वारा दायर इस याचिका में बनर्जी के बयानों पर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी, जिसे अदालत ने सुनवाई योग्य न मानते हुए निरस्त कर दिया।
राज्य सरकार की रिपोर्ट: कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता
इससे पूर्व, पश्चिम बंगाल सरकार ने हाईकोर्ट में अपनी जांच रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट में राज्य सरकार ने कहा था कि जनसभा में पूर्व मुख्यमंत्री के भाषण से किसी भी संज्ञेय अपराध का मामला नहीं बनता है।
मामले की पैरवी करते हुए राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने अदालत को अवगत कराया कि आधिकारिक जांच में यह बात सामने आई है कि याचिकाकर्ता स्वयं उस कार्यक्रम स्थल पर मौजूद ही नहीं थे। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि उस सभा के दौरान किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली थी।
ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के उल्लंघन का आरोप
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि ममता बनर्जी ने 2 जून को कोलकाता में आयोजित एक राजनीतिक रैली के दौरान ढाका में दिसंबर 2025 में हुई बांग्लादेशी कार्यकर्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां की थीं। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इन बयानों का भारत के राष्ट्रीय हितों पर प्रतिकूल असर पड़ा। याचिकाकर्ता का यह भी तर्क था कि पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में बनर्जी ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के प्रावधानों से बंधी हुई हैं।
दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के वकील कल्याण बंद्योपाध्याय और अर्क कुमार नाग ने अदालत के समक्ष दलील दी कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहे हैं कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट की किसी भी धारा या प्रावधान का उल्लंघन किस प्रकार हुआ है।
जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर अदालत की टिप्पणी
इस मामले की विचारणीयता पर हाईकोर्ट ने पहले भी कड़ा रुख अपनाया था। 1 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई के दौरान तत्कालीन कार्यकारी चीफ जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सवाल उठाया था कि इस मामले को जनहित याचिका के तौर पर क्यों स्वीकार किया जाना चाहिए। उस दौरान पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल एक “विशेष साधन या हथियार” के रूप में किया जाने लगा है।

