सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के न्यायिक अधिकारी दिलीप एस. घुमारे के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा शुरू की गई अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह कार्यवाही हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान उनके कथित व्यवहार को लेकर शुरू की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने घुमारे की याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट से जवाब मांगा है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि अवमानना कार्यवाही पर रोक नहीं लगाई जाएगी। साथ ही हाईकोर्ट से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई तक इस मामले में कोई अंतिम फैसला न लिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।
बेंच ने न्यायिक अधिकारी के कथित व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कोई न्यायिक अधिकारी हाईकोर्ट के सामने इस तरह आवाज ऊंची नहीं कर सकता। कोर्ट ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता माना।
179 पदों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान हुआ विवाद
मामला 1 सितंबर को बॉम्बे हाईकोर्ट में हुई सुनवाई से जुड़ा है। जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की बेंच फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए बनाए गए 179 नए पदों की रिक्तियों से संबंधित एक हलफनामे पर विचार कर रही थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हलफनामे को लेकर राज्य सरकार के वकील से सवाल किए। उस समय कोर्ट में मौजूद घुमारे से स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया।
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, घुमारे ने सवाल का जवाब देने के बजाय आक्रामक और ऊंची आवाज में बोलना शुरू कर दिया और 179 पद नहीं भरे जाने के लिए हाईकोर्ट प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया।
हाईकोर्ट ने माना कि भरी अदालत में इस तरह का व्यवहार कोर्ट की गरिमा और अधिकार को कम करने वाला था। इसके बाद घुमारे को संविधान के अनुच्छेद 215 और अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत अवमानना का नोटिस जारी किया गया।
घुमारे ने इस कार्यवाही को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
वकील ने कहा, अधिकारी चिल्लाए नहीं बल्कि सुनाई देने के लिए ऊंची आवाज में बोले
सुप्रीम कोर्ट में घुमारे की ओर से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि न्यायिक अधिकारी ने हाईकोर्ट के सामने चिल्लाकर बात नहीं की थी। उनका कहना था कि घुमारे माइक्रोफोन के पास खड़े नहीं थे, इसलिए अपनी बात सुनाने के लिए उन्हें आवाज ऊंची करनी पड़ी।
सिंह ने कोर्ट को यह भी बताया कि घुमारे ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है। इसके बावजूद उन्हें अगले तीन महीने उस स्थान पर सेवा देनी होगी जहां उनका ट्रांसफर किया गया है। वकील ने इसे करीब 1,000 किलोमीटर दूर नक्सल प्रभावित क्षेत्र बताया। उन्होंने घुमारे को अपना इस्तीफा वापस लेने की अनुमति देने का भी अनुरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल किया कि घुमारे ने इस्तीफा क्यों दिया और बिना शर्त माफी मांगने का रास्ता क्यों नहीं अपनाया। बेंच ने टिप्पणी की कि यदि कोई न्यायिक अधिकारी इतना गुस्सैल है तो न्यायिक सेवा में उसकी उपयुक्तता पर भी सवाल उठता है।
विकास सिंह ने बताया कि घुमारे हाईकोर्ट के सामने पहले ही माफी मांग चुके हैं और इस तथ्य का उल्लेख हाईकोर्ट के आदेश में भी किया गया है।
ट्रांसफर का मुद्दा उठाने के बावजूद नहीं मिली राहत
सिंह ने घुमारे के ट्रांसफर की परिस्थितियों का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि घटना के अगले ही दिन अधिकारी को नक्सल प्रभावित क्षेत्र में भेज दिया गया और उन्हें वहां तीन महीने तक सेवा देनी होगी।
इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना कार्यवाही रोकने से इनकार कर दिया। बेंच ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को कोर्ट में खड़े होकर हाईकोर्ट से यह कहने का अधिकार नहीं है कि उसने पदों को नहीं भरा। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अदालत में पेश होने वाले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी इस तरह आवाज ऊंची करने की हिम्मत नहीं करते।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक अवमानना मामले में कोई अंतिम फैसला न लिया जाए।
मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।

