रेप केस में कनाडाई नागरिक को सुप्रीम कोर्ट से मिली अग्रिम जमानत; कहा- बिना पुष्टि वाले आरोपों के आधार पर ‘नैतिक निंदा’ ठीक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में आरोपी कनाडाई नागरिक मनप्रीत सिंह गिल को अग्रिम जमानत दे दी है। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल उन आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति की “नैतिक निंदा” नहीं की जा सकती जिनकी अभी तक पुष्टि नहीं हुई है। गिल ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा उनकी गिरफ्तारी पूर्व जमानत याचिका खारिज किए जाने के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने 20 अप्रैल को यह आदेश जारी किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि रिश्तों का स्वरूप और कथित धमकियों की सच्चाई ट्रायल के दौरान साक्ष्य (एविडेंस) का विषय है।

यह विवाद पंजाब पुलिस द्वारा 11 नवंबर 2025 को दर्ज की गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि गिल ने अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में झूठ बोलकर उसे गुमराह किया और संबंध बनाए।

महिला ने अपनी शिकायत में यह भी दावा किया कि 9 और 10 नवंबर 2025 की मध्यरात्रि को गिल ने उसे शराब पिलाई, डराया-धमकाया और जबरन संबंध स्थापित किए। इसके अलावा, पीड़िता ने आरोप लगाया कि गिल ने उसे पुरानी शिकायत वापस लेने के लिए गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले, गिल की अग्रिम जमानत याचिका को 1 दिसंबर 2024 को ट्रायल कोर्ट ने और फिर 24 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।

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गिल की ओर से पेश वकील सना रईस खान ने तर्क दिया कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह से आपसी सहमति (कंसेंसुअल) पर आधारित थे। खान ने अदालत को बताया कि प्राथमिकी (FIR) केवल जबरन वसूली के इरादे से दर्ज कराई गई है और शिकायतकर्ता को रिश्ते की शुरुआत से ही गिल की वैवाहिक स्थिति के बारे में पूरी जानकारी थी।

बचाव पक्ष ने शिकायतकर्ता की कहानी में कई गंभीर विसंगतियों की ओर इशारा किया:

  • साक्ष्य छिपाने का दावा: महिला ने दावा किया था कि उसे 2 नवंबर 2025 को एक वीडियो मिला था, लेकिन 11 नवंबर को दर्ज कराई गई FIR में इस महत्वपूर्ण आरोप का कोई जिक्र नहीं था।
  • वसूली का आरोप: गिल की याचिका में आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता ने उनके घर जाकर 50 लाख रुपये की मांग की थी। पैसा न मिलने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 183 के तहत दिए जाने वाले बयान में आरोपी के खिलाफ जाने की धमकी दी गई थी।
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सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि अंतरिम संरक्षण मिलने के बाद गिल पहले ही जांच अधिकारी (IO) के सामने पेश होकर सहयोग कर चुके हैं। पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता के अपने बयान के अनुसार भी दोनों पक्षों के बीच संबंध सहमति से थे, जबकि जबरदस्ती या धमकी के आरोपों को साबित किया जाना बाकी है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, “जैसा कि आरोप लगाया गया है कि कोई धमकी दी गई थी या नहीं, यह साक्ष्य का विषय है। बिना पुष्टि वाले आरोपों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि अपीलकर्ता नैतिक निंदा का पात्र है। ऐसे में, हमारा विचार है कि अपीलकर्ता अग्रिम जमानत पर रिहा होने का हकदार है।”

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अदालत ने गिल की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें संबंधित जांच अधिकारी द्वारा निर्धारित शर्तों पर अग्रिम जमानत देने का निर्देश दिया। साथ ही यह शर्त भी रखी गई कि गिल को छूट मिलने के अलावा हर सुनवाई पर संबंधित अदालत में पेश होना होगा।

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