सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि अनुबंध में देरी से किए गए भुगतानों पर ब्याज का दावा करने पर स्पष्ट रोक लगाई गई है, तो मध्यस्थता न्यायाधिकरण (आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल) मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 31(7)(ए) के तहत संदर्भ-पूर्व ब्याज (प्री-रेफरेंस इंटरेस्ट) प्रदान नहीं कर सकता। जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (नीपको) की अपील स्वीकार करते हुए मेघालय हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एस्ट्रा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में संदर्भ-पूर्व ब्याज को बहाल किया गया था। कोर्ट ने निर्णय दिया कि जब कोई अनुबंध स्वतंत्र रूप से भुगतान में देरी पर ब्याज पर रोक लगाता है, तो आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल संदर्भ-पूर्व ब्याज देकर अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करता है।
मुख्य विवाद की पृष्ठभूमि
नीपको ने 12 जून 1995 को त्रिपुरा के रामचंद्र नगर स्थित गैस टर्बाइन पावर प्रोजेक्ट के मुख्य संयंत्र और सहायक भवन के सिविल कार्यों के लिए निविदाएं आमंत्रित की थीं। एस्ट्रा कंस्ट्रक्शन की निविदा स्वीकार की गई और 23 मई 1996 को 17,09,26,913 रुपये के मूल्य का एक औपचारिक अनुबंध निष्पादित हुआ, जिसके काम पूरा करने की अंतिम तिथि 26 मार्च 1997 तय की गई थी।
परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया, जिसके बाद मामला मध्यस्थता में गया। 5 जून 2015 को आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने अपना फैसला सुनाते हुए काम में हुई देरी के लिए नीपको को जिम्मेदार ठहराया। ट्रिब्यूनल ने 3.30 करोड़ रुपये की मूल राशि के चार दावों को स्वीकार किया और प्रत्येक दावे पर 12 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से संदर्भ-पूर्व ब्याज, तथा 9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से वादकालीन (पेंडेंटे लाइट) और भविष्य का ब्याज देने का आदेश दिया।
नीपको ने 1996 के अधिनियम की धारा 34 के तहत इस पंचाट (अवार्ड) को वाणिज्यिक अदालत में चुनौती दी। 15 फरवरी 2024 को वाणिज्यिक अदालत ने पंचाट में संशोधन करते हुए दावा संख्या 2, 3, 4 और 5 पर वाद-पूर्व और वादकालीन ब्याज को खारिज कर दिया। सईद अहमद एंड कंपनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के मामले पर भरोसा करते हुए वाणिज्यिक अदालत ने माना कि अनुबंध की सामान्य शर्तों (जीसीसी) का क्लॉज 54 ब्याज के किसी भी दावे पर रोक लगाता है।
इसके बाद एस्ट्रा कंस्ट्रक्शन ने इस निर्णय के खिलाफ 1996 के अधिनियम की धारा 37 के तहत शिलांग स्थित मेघालय हाईकोर्ट में अपील दायर की। 19 जून 2025 को हाईकोर्ट ने वाणिज्यिक अदालत के आदेश को पलटते हुए आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के पूरे फैसले को बहाल कर दिया। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम हरीश चंद्र एंड कंपनी के तीन जजों की पीठ के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि क्लॉज 54 केवल विवाद के कारण रोकी गई राशि पर ब्याज पर रोक लगाता है, और यह अन्य मदों के दावों या अवार्ड पर मिलने वाले ब्याज पर लागू नहीं होता।
दोनों पक्षों की दलीलें
नीपको की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राघवेंद्र पी. शंकर ने अपनी अपील को केवल संदर्भ-पूर्व ब्याज की बहाली तक ही सीमित रखा। उन्होंने दलील दी कि क्लॉज 54 के तहत रोक की बात ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर बचाव पत्र (स्टेटमेंट ऑफ डिफेंस) में स्पष्ट रूप से उठाई गई थी। उनका कहना था कि हाईकोर्ट ने हरीश चंद्र मामले को लागू करने में गलती की, जो कि 1940 के पुराने मध्यस्थता अधिनियम के तहत तय हुआ था, जबकि 1996 के अधिनियम के तहत सईद अहमद और जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड बनाम टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (टीएचडीसी-I) में तय की गई कानूनी स्थिति की अनदेखी की गई। नीपको ने फेरो कंक्रीट कंस्ट्रक्शन (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम राजस्थान राज्य और ओएनजीसी बनाम जी एंड टी बेकफील्ड ड्रिलिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के फैसलों पर भी भरोसा जताया।
एस्ट्रा कंस्ट्रक्शन का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रितिन राय ने तर्क दिया कि नीपको ने आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के समक्ष क्लॉज 54 का मुद्दा कभी प्रभावी ढंग से नहीं उठाया था, इसलिए भारत संघ बनाम सुसाका प्राइवेट लिमिटेड के सिद्धांत के अनुसार उसने यह अधिकार छोड़ (वेव कर) दिया था। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने क्लॉज 54 की भाषा पर हरीश चंद्र के सिद्धांत को सही रूप से लागू किया था।
हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन ने एस्ट्रा कंस्ट्रक्शन का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि क्लॉज 54 केवल निगम के पास पड़ी राशि पर ब्याज रोकता है, हर्जाने जैसी अन्य मदों पर अवार्ड-पूर्व ब्याज पर नहीं। उन्होंने हरीश चंद्र, रिलायंस सेल्युलोज प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम ओएनजीसी और टीएचडीसी-I का हवाला देते हुए कहा कि “या किसी भी अन्य मामले में” वाक्यांश का अर्थ उसके पहले आए शब्दों के संदर्भ में ही निकाला जाना चाहिए।
कानूनी स्थिति: 1940 का अधिनियम बनाम 1996 का अधिनियम
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों कानूनों के तहत मध्यस्थ द्वारा ब्याज देने के अधिकार के विधिक ढांचे का विस्तार से विश्लेषण किया।
1940 के पुराने अधिनियम में ब्याज को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था। सचिव, सिंचाई विभाग, उड़ीसा सरकार व अन्य बनाम जी.सी. रॉय के मामले में संविधान पीठ ने माना था कि जब तक समझौते में स्पष्ट रूप से मनाही न हो, तब तक मध्यस्थ के पास वादकालीन ब्याज देने का अंतर्निहित अधिकार है। संविदात्मक प्रतिबंधों की व्याख्या हमेशा उस पक्ष के विरुद्ध सख्ती से की जाती थी जो उसका सहारा लेता था, जैसा कि अंबिका कंस्ट्रक्शन और रिलायंस सेल्युलोज के मामलों में भी दोहराया गया।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि 1996 के अधिनियम की धारा 31(7)(ए) ने “जब तक कि पक्षों द्वारा अन्यथा सहमति न हो” शब्दों के साथ ट्रिब्यूनल के अधिकार को दोनों पक्षों की संविदात्मक स्वायत्तता के अधीन कर दिया। पाम डेवलपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का संदर्भ लेते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि 1996 के कानून में ब्याज देने की शक्ति को समाप्त करने के लिए अनुबंध में स्पष्ट रोक ही पर्याप्त है।
प्रक्रियात्मक और मूल कानूनी दावों के अंतर को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा:
“यह अब स्थापित हो चुका है, और हम इस स्थिति की पुनः पुष्टि करते हैं, कि वादकालीन ब्याज प्रक्रियात्मक कानून के दायरे में आता है और यह धारा 31(7)(ए) द्वारा नियंत्रित होता है। वहीं संदर्भ-पूर्व अवधि का ब्याज पूरी तरह से भिन्न धरातल पर स्थित है: यह मूल (सबस्टेंटिव) कानून से संबंधित है और इसे केवल धारा 31(7)(ए) से प्राप्त नहीं किया जा सकता।”
क्लॉज 54 पर सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न जीसीसी के क्लॉज 54 की व्याख्या का था, जिसमें कहा गया है:
“54.0 विवाद आदि के कारण भुगतान में देरी पर कोई दावा नहीं इंजीनियर-इन-चार्ज और ठेकेदार के बीच किसी विवाद, मतभेद या गलतफहमी के कारण निगम के पास जमा किसी भी पैसे या शेष राशि के संबंध में, अथवा इंजीनियर-इन-चार्ज द्वारा आवधिक या अंतिम भुगतान करने में किसी भी देरी के संबंध में, या किसी भी अन्य मामले में, निगम द्वारा ब्याज या हर्जाने का कोई दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा हरीश चंद्र पर भरोसा किए जाने को अनुचित ठहराया। कोर्ट ने इंगित किया कि हरीश चंद्र वाले मामले का क्लॉज केवल आवधिक या अंतिम भुगतान के दौरान उठे विवादों और केवल विवाद के कारण रोकी गई राशि तक सीमित था।
इसके विपरीत, क्लॉज 54 में “या” शब्द से जुड़े दो बिल्कुल अलग और स्वतंत्र आधार तय किए गए हैं: पहला, किसी विवाद या गलतफहमी के कारण निगम के पास पड़ा पैसा; और दूसरा, इंजीनियर-इन-चार्ज द्वारा आवधिक या अंतिम भुगतान करने में हुई कोई भी देरी।
दोनों के अंतर को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह केवल मसौदे का मामूली अंतर नहीं है। भुगतान में देरी को एक स्वतंत्र आधार के रूप में नामित करके, जो किसी विवाद से बंधा नहीं है, क्लॉज 54 वह काम करता है जो हरीश चंद्र वाले मामले का क्लॉज कभी नहीं करता था: यह देरी से भुगतान से उत्पन्न होने वाले ब्याज के दावे को स्पष्ट रूप से खारिज करता है, चाहे उस पर कोई विवाद रहा हो या नहीं। वही स्थिति जो हरीश चंद्र में रोक से बाहर थी—यानी भुगतान में देरी—क्लॉज 54 में स्पष्ट रूप से रोक के दायरे में लाई गई है। हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण का यह सटीक और पूर्ण उत्तर है कि दोनों क्लॉज एक ही बात कहते हैं; वे एक जैसे नहीं हैं, और यह अंतर निर्णायक है।”
कोर्ट ने दोहराया कि सईद अहमद और जयप्रकाश एसोसिएट्स (टीएचडीसी-II) के मामलों में भी इसी तरह के दोहरे आधार वाले अनुबंधों को संदर्भ-पूर्व और वादकालीन ब्याज पर पूर्ण रोक माना गया था:
“दोनों क्लॉज की भाषा अलग है, और भाषा का यही अंतर कानून में बड़ा अंतर पैदा करता है। इस मामले पर हरीश चंद्र का नहीं, बल्कि सईद अहमद और उसके बाद के फैसलों का क्रम लागू होता है।”
अधिकार त्याग (वेवर) के तर्क पर पीठ ने पाया कि नीपको ने 23 अगस्त 2012 को ट्रिब्यूनल के समक्ष दाखिल अपने बचाव पत्र में क्लॉज 54 की रोक को स्पष्ट रूप से उठाया था, अतः अधिकार छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जीसीसी के क्लॉज 54 और 1996 के कानून की धारा 31(7)(ए) के मद्देनजर आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के पास संदर्भ-पूर्व ब्याज देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। कोर्ट ने नीपको की अपील स्वीकार करते हुए कहा:
“उपर्युक्त कारणों से, हमारा यह सुविचारित मत है कि जीसीसी का क्लॉज 54 संदर्भ-पूर्व अवधि के लिए ब्याज देने पर रोक लगाता है, और आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने ऐसा ब्याज देकर 1996 के अधिनियम की धारा 31(7)(ए) के तहत अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का उल्लंघन किया। हाईकोर्ट ने क्लॉज 54 की तुलना हरीश चंद्र मामले के क्लॉज से करने और उस आधार पर संदर्भ-पूर्व ब्याज को बहाल करने में भूल की। विवादित फैसला, जिस सीमा तक वह संदर्भ-पूर्व ब्याज को बहाल करता है, टिकने योग्य नहीं है और तदनुसार उसे रद्द किया जाता है।”
अदालत ने मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (नीपको) बनाम एस्ट्रा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या … वर्ष 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 24803/2025 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 22 सितंबर, 2026

