सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 का इस्तेमाल किसी आरोपी को केवल इसलिए दोषी ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता कि वह मृत्यु की परिस्थितियों का स्पष्टीकरण नहीं दे सका। इस प्रावधान को लागू करने से पहले अभियोजन पक्ष को आरोपी की संलिप्तता दर्शाने वाला प्रथम दृष्टया मामला स्थापित करना आवश्यक है।
जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए अपनी बहू को जलाकर मारने के आरोप में दोषी ठहराई गई कमलबाई वामन पाटिल की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने सेशन कोर्ट के बरी करने के फैसले को बहाल करते हुए कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने परस्पर विरोधी मृत्यु पूर्व बयानों में से एक अपुष्ट बयान पर भरोसा किया और महिला को ऐसे आरोप में दोषी ठहराया, जो उसके खिलाफ स्वतंत्र रूप से तय ही नहीं किया गया था।
पहले अभियोजन को आरोपी की संलिप्तता साबित करनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी घटना के संबंध में आरोपी द्वारा संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं देना अपने आप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 के प्रावधान तभी लागू होंगे, जब अभियोजन पक्ष संबंधित आरोपी की संलिप्तता दर्शाते हुए अपना प्रारंभिक सबूत पेश करने का दायित्व पूरा कर चुका हो।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“जब अभियोजन पक्ष ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत कर चुका हो, जिन पर विश्वास किए जाने की स्थिति में दोषसिद्धि कायम रह सकती है, तभी आरोपी द्वारा कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं देना उसके खिलाफ एक कारक माना जा सकता है।”
इस निष्कर्ष के लिए बेंच ने Anees v. State Govt. of NCT मामले में तीन न्यायाधीशों की बेंच के फैसले का उल्लेख किया।
बहू की जलने से मौत और तीन अलग-अलग बयान
अभियोजन के अनुसार, सुनीताबाई को उनके पति, ससुर, सास कमलबाई वामन पाटिल और देवर द्वारा प्रताड़ित किया जाता था।
आरोप था कि विवाह के बाद संतान नहीं होने और दहेज की मांग को लेकर उन्हें परेशान किया गया।
अभियोजन ने दावा किया कि 10 अप्रैल 2005 को चारों आरोपियों ने साझा इरादे से सुनीताबाई को आग लगा दी। उनकी मृत्यु 15 अप्रैल 2005 को हुई।
चारों आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 498A, 342, 406 और 302 के साथ धारा 34 के तहत आरोप तय किए गए थे।
सेशन कोर्ट ने मृतका के तीन मृत्यु पूर्व बयानों में विरोधाभास पाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।
मेडिकल अधिकारी द्वारा मेडिको-लीगल रिकॉर्ड में दर्ज बयान, प्रदर्श-56, में कमलबाई को आग लगाने वाला बताया गया था। हालांकि, प्रदर्श-44 और प्रदर्श-48 में मृतका ने अपने ससुर पर आग लगाने का आरोप लगाया था।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सास को सुनाई थी उम्रकैद
राज्य सरकार की अपील पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रदर्श-56 को विश्वसनीय मानते हुए अन्य दोनों मृत्यु पूर्व बयानों को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने पति, ससुर और देवर को बरी करने का फैसला बरकरार रखा, लेकिन कमलबाई को अकेले आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी ठहरा दिया।
उन्हें आजीवन कठोर कारावास और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के इस बयान को भी महत्वपूर्ण माना कि घटना के समय घर में मृतका के साथ केवल कमलबाई मौजूद थीं।
इसके आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि कमलबाई द्वारा जलने की घटना का स्पष्टीकरण नहीं देना उनके खिलाफ जाता है।
बिना आरोप तय किए हत्या की स्वतंत्र धारा में दोषसिद्धि गलत
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि चारों आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के साथ धारा 34 के तहत आरोप तय किए गए थे।
किसी भी आरोपी के खिलाफ स्वतंत्र रूप से धारा 302 का आरोप तय नहीं हुआ था।
इसके बावजूद हाईकोर्ट ने अन्य तीन आरोपियों को बरी करते हुए कमलबाई को अकेले हत्या के अपराध में दोषी ठहरा दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“ऐसा करना अपीलकर्ता के खिलाफ एक नया आरोप तैयार करने के समान होगा, जिसके तहत उस पर कभी आरोप ही तय नहीं किया गया था।”
बेंच ने इस संबंध में Krishna Govind Patil v. State of Maharashtra के फैसले पर भरोसा किया।
विरोधाभासी मृत्यु पूर्व बयान की पुष्टि जरूरी थी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मृतका के तीन मृत्यु पूर्व बयानों में विरोधाभास था, तो हाईकोर्ट को किसी एक बयान के आधार पर दोषसिद्धि करने से पहले उसके समर्थन में अन्य साक्ष्यों की तलाश करनी चाहिए थी।
बेंच ने Abhishek Sharma v. State (Govt. of NCT of Delhi) के सिद्धांतों को लागू किया।
कोर्ट ने पाया कि विश्वास देसले नामक व्यक्ति ने आग बुझाई थी और मृतका को अस्पताल पहुंचाया था। वह प्रदर्श-56 दर्ज किए जाने के समय भी मौजूद था।
इसके बावजूद अभियोजन पक्ष ने उसे गवाह के रूप में पेश नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“बिना किसी पुष्टिकारक साक्ष्य के प्रदर्श-56 अकेले अपीलकर्ता को बरी करने के फैसले को पलटने और उसके बाद केवल उसे दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकता।”
बेंच ने मृतका और अपीलकर्ता की उम्र के अंतर को भी प्रासंगिक माना। घटना के समय मृतका लगभग 30 वर्ष की थीं, जबकि कमलबाई की उम्र करीब 60 वर्ष थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 386(a) की आवश्यकता के अनुसार सजा के प्रश्न पर अपीलकर्ता को नहीं सुना था।
सेशन कोर्ट से बरी होने के बाद निर्दोषता की धारणा और मजबूत हुई
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिलीप तौर ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने प्रदर्श-56 को बिना किसी पुष्टिकारक साक्ष्य के स्वीकार कर लिया।
उन्होंने State of Punjab v. Parveen Kumar के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बरी करने के फैसले को पलटने के लिए भरोसा किए गए साक्ष्य संदेह से मुक्त होने चाहिए।
महाराष्ट्र सरकार की ओर से अधिवक्ता रमन यादव ने दोषसिद्धि का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्श-56 स्वेच्छा से दिया गया बयान था, जिसकी पुष्टि बरामद सामग्री और केमिकल एनालाइजर की रिपोर्ट से होती है।
राज्य ने यह भी कहा कि घटना के समय अपीलकर्ता घर में अकेली थीं। इसके समर्थन में Jagbir Singh v. State (NCT of Delhi) और Rajendra s/o Ramdas Kolhe v. State of Maharashtra के फैसलों का हवाला दिया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों को दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
बेंच ने कहा:
“सेशन कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के कारण अपीलकर्ता के पक्ष में निर्दोषता की धारणा वास्तव में और मजबूत हो गई थी।”
सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2017 का बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और कमलबाई वामन पाटिल को आरोपों से बरी कर दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उनकी हिरासत आवश्यक नहीं है, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Sau. Kamalbai Waman Patil v. The State of Maharashtra
केस नंबर: Criminal Appeal No. 118 of 2018
पीठ: जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
फैसले की तारीख: 5 नवंबर 2026
