बंतवाल हत्याकांड: सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर लॉ स्टूडेंट के खिलाफ दर्ज मुकदमों की जांच पर कर्नाटक हाईकोर्ट की रोक

कर्नाटक हाईकोर्ट ने बंतवाल में एक युवती की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी को लेकर एक लॉ स्टूडेंट के खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मामलों की पुलिस जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस एम नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने सोमवार को यह आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार को नोटिस भेजा और अगली सुनवाई के लिए 7 अगस्त की तारीख तय की है।

यह कानूनी कार्रवाई कानून के छात्र किरण आराध्य से जुड़ी है, जिनके खिलाफ 18 जुलाई को दो अलग-अलग शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई थी। उन पर सार्वजनिक शांति भंग करने की मंशा से बयान देने और दंगा भड़काने के लिए उकसाने के आरोप लगाए गए थे। यह कार्रवाई 17 जुलाई को उनके द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर किए गए एक पोस्ट को लेकर की गई थी।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि अगर इस पोस्ट में किसी भी धर्म, समूह या समुदाय के प्रति नफरत फैलाने का थोड़ा भी संकेत मिलता, तो कोर्ट जांच की अनुमति दे देता। कोर्ट ने पाया कि छात्र का इरादा इस जघन्य घटना का महिमामंडन करने या इसका जश्न मनाने का बिल्कुल नहीं था। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि लोगों को ऐसी घटनाओं को लेकर जरूरत से ज्यादा संवेदनशील होने से बचना चाहिए।

कोर्ट ने राज्य सरकार के रुख पर कड़ा ऐतराज जताते हुए सवाल किया कि जब शिकायतकर्ता ने खुद पोस्ट में कुछ भी सांप्रदायिक नहीं पाया, तो पुलिस इसमें जबरन विवाद क्यों तलाश रही है? कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की कि अगर जांच एजेंसी का नजरिया ऐसा है, तो आईपीसी की धारा 153ए (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) का उल्लंघन खुद एजेंसी कर रही है, न कि याचिकाकर्ता। जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा कि इस ट्वीट से ऐसा कोई विवादित अर्थ निकालना पूरी तरह समझ से परे है।

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बंतवाल में क्या हुआ था?

यह पूरा विवाद 16 जुलाई की शाम को दक्षिण कन्नड़ जिले के बंतवाल में हुई एक हत्या से जुड़ा है। वहां एक निजी क्लिनिक में काम करने वाली 21 वर्षीय नर्स लावण्या गौड़ा की केएसआरटीसी बस स्टैंड पर धारदार हथियार से काटकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस के मुताबिक, उसके दूर के रिश्तेदार 22 वर्षीय चेतन जी ने प्रेम संबंध का प्रस्ताव बार-बार ठुकराए जाने के कारण इस वारदात को अंजाम दिया था। इसी घटना के अगले दिन किरण आराध्य ने सोशल मीडिया पर अपनी टिप्पणी साझा की थी।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

किरण आराध्य की ओर से बेंगलुरु दक्षिण के भाजपा सांसद और अधिवक्ता तेजस्वी सूर्या ने पैरवी की। सूर्या ने दलील दी कि सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि खुद शिकायतकर्ता ने भी माना है कि पोस्ट में किसी धर्म या समुदाय का जिक्र नहीं था। ऐसे में मामला दर्ज करना और कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना ही अपने आप में आरोपी के लिए सजा और प्रताड़ना बन जाता है।

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दूसरी तरफ, विशेष लोक अभियोजक बी एन जगदीशा ने जांच पर रोक लगाने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि राज्य का तटीय क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील है। हत्या के तुरंत बाद, जब तक स्थिति पूरी तरह साफ नहीं थी, ऐसे ट्वीट तनाव को और भड़का सकते थे। उन्होंने तर्क दिया कि स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए लोगों को संयम बरतना चाहिए था। जगदीशा ने यह भी कहा कि छात्र बिना पुलिस नोटिस मिले ही सीधे कोर्ट पहुंच गए, जबकि जांच में कुछ न मिलने पर पुलिस खुद ही केस बंद कर देती।

इस दलील के जवाब में तेजस्वी सूर्या ने कहा कि किसी व्यक्ति के बयान को केवल भौगोलिक पृष्ठभूमि के नजरिए से देखकर आंका नहीं जा सकता।

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