सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए पांच लोगों को बरी करते हुए स्पष्ट किया है कि भले ही किसी त्रुटिपूर्ण जांच का लाभ आरोपी को नहीं दिया जा सकता, लेकिन भरोसेमंद और पुख्ता सबूतों के अभाव में अदालत केवल इसलिए दोष की उपधारणा नहीं कर सकती क्योंकि जांच अधिकारी लापरवाह था या उस पर मिलीभगत का आरोप था। हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई सजा और आजीवन कारावास के आदेश को रद्द करते हुए जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि चश्मदीदों के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों के बीच गंभीर विरोधाभासों तथा घटनास्थल से किसी भी प्रकार की बरामदगी न होने के कारण अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिहार में कथित तौर पर चुनाव के दिन दिनदहाड़े हुई एक हत्या से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, मृतक अपने बेटे (पीडब्लू7), एक कर्मचारी (पीडब्लू1), भतीजे (पीडब्लू2) और गांव के ही एक अन्य व्यक्ति के साथ अपने खेतों की ओर जा रहे थे। रास्ते में आरोपियों ने कथित तौर पर उन्हें घेर लिया, सभी को जान से मारने की ललकार लगाई और अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।
गोलीबारी के दौरान मृतक की पीठ में गोली लगी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। उनके साथ मौजूद लोग जान बचाकर भागे, तभी एक मजिस्ट्रेट की चुनावी गश्ती गाड़ी वहां पहुंच गई, जिसे देखकर हमलावर फरार हो गए। घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
नौ गवाहों की गवाही के बाद निचली अदालत ने छह आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 और 307 के साथ धारा 149 के तहत दोषी करार दिया था। आरोपी संख्या 1, 4 और 6 को धारा 148 आईपीसी तथा आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत भी दोषी ठहराया गया, जबकि आरोपी 2, 3 और 5 को धारा 147 आईपीसी के तहत सजा सुनाई गई थी। पहले आरोपी ने अपनी सजा पूरी कर ली थी और उसे समयपूर्व रिहाई (रेमिशन) मिल चुकी थी, जिसके बाद शेष पांच अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में दी गई दलीलें
राज्य के सरकारी वकील ने दोषसिद्धि का समर्थन करते हुए दलील दी कि चश्मदीद गवाहों के बयान सुसंगत हैं। घटनास्थल से खोखे बरामद न होने के सवाल पर राज्य ने कहा कि पीड़ित जिस मेड़ से जा रहे थे वह ऊबड़-खाबड़ थी और आसपास कंटीली घास व बिना कटी फसलें थीं, जिसके कारण खोखे मिलना संभव नहीं था। यह भी कहा गया कि जांच अधिकारी (पीडब्लू9) द्वारा तैयार किए गए घटना स्थल के नक्शे (महजर) में स्थान का विस्तृत ब्योरा दिया गया था।
वहीं, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ मिलीभगत के एक बाहरी शिकायती पत्र पर विचार किया था। हाईकोर्ट ने उस शिकायत के आधार पर यह माना कि अधिकारी की लापरवाही के चलते ही खोखे जब्त नहीं हुए, स्वतंत्र गवाहों के बयान नहीं लिए गए और खून से सनी मिट्टी जांच के लिए नहीं भेजी गई। हाईकोर्ट का मानना था कि गवाहों ने सुसंगत गवाही दी है, जिससे हत्या का साझा उद्देश्य साबित होता है। मेडिकल साक्ष्यों में विरोधाभास को हाईकोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि भागते हुए निशाने पर गोली चलाते समय शूटर का हाथ कांप सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की थ्योरी में कई गंभीर खामियां पाईं और हाईकोर्ट के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया।
पीठ ने पाया कि भौतिक और फोरेंसिक साक्ष्य चश्मदीदों के बयानों का खंडन करते हैं:
- मेडिकल साक्ष्यों में विरोधाभास: पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर (पीडब्लू4) ने बताया कि गोली का घाव अंडाकार था और उस पर जलने व टैटू के निशान थे। इससे स्पष्ट होता है कि गोली तीन से चार फीट की बेहद नजदीकी दूरी से और तब चलाई गई थी जब पीड़ित बैठा हुआ था। यह बात चश्मदीदों के उस बयान के बिल्कुल उलट थी जिसमें कहा गया था कि मृतक कतार में सबसे आगे चल रहे थे और उन्हें पीछे से गोली मारी गई।
- बरामदगी का अभाव: अंधाधुंध गोलीबारी के आरोपों के बावजूद जांच अधिकारी ने घटनास्थल से न तो खोखे तलाशे, न हथियार बरामद किए और न ही मृतक के शरीर से आर-पार हुई गोली को तलाशने का कोई प्रयास किया। इसके अलावा, पीडब्लू9 ने खुद माना कि घटनास्थल जुते हुए खेतों के बीच पैदल चलने का एक साफ रास्ता था, जिससे राज्य की ऊबड़-खाबड़ मेड़ वाली दलील खारिज हो गई।
- संदेहास्पद और गैर-परीक्षित गवाह: घटना के समय कथित रूप से मौजूद गांव के स्वतंत्र गवाह से अदालत में पूछताछ नहीं की गई। जिन चश्मदीदों के बयान दर्ज हुए, वे सभी मृतक के करीबी रिश्तेदार या कर्मचारी थे, जिनका आरोपियों के साथ पुराना विवाद चल रहा था। अंधाधुंध गोलीबारी के बावजूद इनमें से किसी को खरोंच तक नहीं आई, और न ही यह साबित करने के लिए उनके कपड़े जब्त किए गए कि वे खून से लथपथ शव को उठाकर गश्ती गाड़ी तक ले गए थे।
- प्रक्रियागत गड़बड़ियां: जांच अधिकारी ने स्वयं स्वीकार किया कि प्रथम सूचना बयान (एफआईएस) दर्ज करने से पहले ही पंचनामा (इनक्वेस्ट) तैयार कर लिया गया था, जिससे साफ होता है कि अभियोजन की कहानी पहले से गढ़ी गई थी। मौके से उठाई गई खून से सनी मिट्टी को भी कभी फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया।
- कमजोर मकसद: अभियोजन द्वारा पेश किया गया मकसद—जिसमें एक लड़की के अपहरण और आरोपी संख्या 1 के पिता के साथ राजनीतिक रंजिश की बात कही गई थी—अदालत में साबित नहीं हो सका। इसके अलावा, जिसके साथ मुख्य विवाद बताया गया था, उस पूर्व मुखिया को मामले में आरोपी तक नहीं बनाया गया था।
हाईकोर्ट द्वारा जांच अधिकारी के खिलाफ मिली शिकायत पर भरोसा किए जाने की कड़ी आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“यह मामला केवल खराब जांच का नहीं है, बल्कि जांच न किए जाने का है। यहां तक कि पंचनामा भी एफआईएस दर्ज करने से पहले तैयार किया गया, जिससे यह सुनियोजित प्रतीत होता है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के विचारण में पेश न की गई आई.ओ. के खिलाफ एक शिकायत को देखकर आरोपियों के दोष को पुख्ता मानने में भारी भूल की है। खराब जांच का फायदा आरोपी को नहीं मिल सकता, लेकिन जब कोई भरोसेमंद सबूत ही न हो, तो केवल इसलिए कि आई.ओ. लापरवाह था या उस पर मिलीभगत का आरोप था, अदालत आरोपियों के दोष की उपधारणा नहीं कर सकती। वर्तमान मामले में सबूतों का पूर्ण अभाव है और गवाहों के बयान, जैसा कि हमने पाया, कतई विश्वास पैदा नहीं करते।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
अभियोजन पक्ष द्वारा उचित संदेह से परे अपराध सिद्ध न कर पाने का निष्कर्ष निकालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार कर लिया और सभी आरोपियों की दोषसिद्धि व सजा रद्द कर दी। पीठ ने निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता हिरासत में हैं और किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए, तथा यदि वे जमानत पर हैं तो उनके जमानत बांड निरस्त समझे जाएं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: ध्रुब सिंह आदि बनाम बिहार राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1434-1438/2017
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 1 सितंबर, 2026

