पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दूसरी पत्नी को मिलेगा पारिवारिक पेंशन का हक, मुजफ्फरपुर के मुख्य अभियंता का आदेश रद्द

पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के एक कर्मचारी की दूसरी पत्नी को पारिवारिक पेंशन देने का रास्ता साफ कर दिया है। अदालत ने मुजफ्फरपुर स्थित बाढ़ नियंत्रण एवं जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता द्वारा 5 फरवरी 2019 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत महिला का पेंशन दावा खारिज कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि दशकों पुराने वैवाहिक रिश्ते, छह बच्चों के पालन-पोषण और बुजुर्ग अवस्था में महिला को जीवनसाथी के दर्जे और वित्तीय सहारे से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने 25 अगस्त को सुनाए फैसले में विभाग को निर्देश दिया कि वह कर्मचारी के 1982 के आधिकारिक आवेदन और सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर नया आदेश जारी करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता महिला अपने पति की मृत्यु की तारीख, यानी 17 अप्रैल 2009 से आजीवन पारिवारिक पेंशन पाने की हकदार है।

प्रशासनिक लापरवाही पर अदालत की सख्त टिप्पणी

मामला जल संसाधन विभाग के मुजफ्फरपुर कार्यालय में कार्यरत लिपिक साह से जुड़ा है, जिनका 17 अप्रैल 2009 को निधन हो गया था। इसके बाद उनकी दूसरी पत्नी ने पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया था। विभाग ने 2019 में यह कहते हुए उनका दावा खारिज कर दिया था कि दिवंगत कर्मचारी ने दूसरी शादी करने से पहले सक्षम प्राधिकार से विधिवत पूर्व अनुमति नहीं ली थी।

याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के संज्ञान में आया कि कर्मचारी ने सेवाकाल के दौरान 28 फरवरी 1982 को विभाग में औपचारिक आवेदन देकर दूसरी शादी के लिए अनुमति मांगी थी। अदालत ने पाया कि पेंशन खारिज करते समय विभाग ने इस अहम दस्तावेज की पूरी तरह अनदेखी की। जस्टिस सिंह ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद इस महत्वपूर्ण तथ्य पर विचार न करना 2019 के प्रशासनिक आदेश को कानूनी रूप से कमजोर बनाता है। अदालत ने इसे बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 23(2) के विपरीत करार देते हुए खारिज कर दिया।

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सरकार की दलीलें और कानूनी प्रावधान

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि लिपिक ने शादी के लिए अनिवार्य सरकारी स्वीकृति हासिल नहीं की थी। सरकार का तर्क था कि लागू सेवा नियमों और हिंदू पर्सनल लॉ के तहत पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी वैध नहीं मानी जा सकती।

सरकारी पक्ष ने 6 सितंबर 1996 के वित्त विभाग के संकल्प का भी हवाला दिया। इस प्रावधान के अनुसार, पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी करने वाली महिला पारिवारिक पेंशन की पात्र नहीं होती; इस व्यवस्था में केवल दूसरी शादी से जन्मे नाबालिग बच्चों को बालिग होने तक पेंशन का हक दिया गया है।

दूसरी ओर, अदालत ने सेवा नियमावली के नियम 23(2) का विश्लेषण करते हुए रेखांकित किया कि हालांकि यह नियम पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी पर रोक लगाता है, लेकिन यह सरकार को यह अधिकार भी देता है कि यदि पर्सनल लॉ अनुमति दे और उचित आधार मौजूद हों, तो शादी की पूर्व अनुमति दी जा सकती है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि और न्याय का सिद्धांत

मामले के मानवीय पहलुओं को दर्ज करते हुए अदालत ने बताया कि दिवंगत कर्मचारी की पहली पत्नी की कोई संतान नहीं थी और उन्होंने इस दूसरी शादी पर कभी कोई आपत्ति नहीं जताई थी। पति की मृत्यु के कुछ ही महीनों बाद, दिसंबर 2009 में पहली पत्नी का भी निधन हो गया था।

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रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता और कर्मचारी दशकों तक पति-पत्नी की तरह रहे और इस वैवाहिक संबंध से उनकी चार बेटियों सहित कुल छह बच्चे हुए। अदालत ने टिप्पणी की कि पहली पत्नी के निधन के बाद दोनों ने एक-दूसरे का सहारा बनकर जीवन बिताया। ऐसे में बुजुर्ग अवस्था में महिला को पत्नी का दर्जा न देना और आजीविका से वंचित करना न्यायसंगत नहीं होगा, खासकर तब जब दिवंगत पति ने अपनी सेवा के दौरान अनुमति का आवेदन देकर अपनी जिम्मेदारी निभाई थी।

बकाया भुगतान के साथ नया आदेश जारी करने का निर्देश

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हाईकोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए मुजफ्फरपुर के मुख्य अभियंता को आदेश दिया कि वे कर्मचारी के 28 फरवरी 1982 के आवेदन और पहली पत्नी के निधन के बाद बने हालात को ध्यान में रखते हुए सकारण नया आदेश पारित करें। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को कानून सम्मत प्रक्रिया अपनाते हुए महिला को 17 अप्रैल 2009 से बकाया राशि सहित नियमित पारिवारिक पेंशन का भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

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