ईवीएम वोटों की क्लस्टर गणना पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा रुख

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में दर्ज वोटों की गिनती क्लस्टर यानी समूहों में करने के लिए चुनाव नियमों में संशोधन किया जा सकता है। अदालत ने यह कदम मतदाताओं की गोपनीयता बनाए रखने और बूथ-वार नतीजों के आधार पर होने वाली चुनाव बाद की हिंसा व प्रताड़ना को रोकने के उद्देश्य से उठाया है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की बेंच उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें निर्वाचन आयोग को बूथ-वार आंकड़े जारी करने के बजाय पूरे संसदीय क्षेत्र के समेकित परिणाम घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई है। पीठ ने केंद्र से स्पष्ट करने को कहा कि क्या ‘कंडक्ट ऑफ इलेक्शंस रूल्स, 1961’ में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं—जो नियम वर्तमान में मतपत्रों की क्लस्टर गणना की अनुमति देते हैं, ताकि इसके दायरे में ईवीएम को भी लाया जा सके।

टोटलाइजर एक ऐसा उपकरण है जिसकी मदद से लगभग 14 मतदान केंद्रों (बूथों) के मतों को अलग-अलग दर्शाने के बजाय एक साथ जोड़कर गिना जा सकता है।

वोटर सुरक्षा और चुनावी हिंसा रोकने की दलीलें

एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अदालत में दलील दी कि टोटलाइजर व्यवस्था लागू होने से चुनाव बाद होने वाली हिंसा रुकेगी और लोगों की जान बचेगी। उन्होंने कहा कि चुनाव बाद हिंसा की मुख्य वजह यह होती है कि राजनीतिक दलों को यह पता चल जाता है कि उन्हें किस विशेष बूथ से कितने वोट मिले। यदि टोटलाइजर का उपयोग किया जाए तो यह जानकारी किसी को नहीं मिल सकेगी, जिससे मतदाताओं का हित सुरक्षित होगा और लोकतंत्र मजबूत होगा।

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उपाध्याय ने जनवरी 2018 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए बताया कि निर्वाचन आयोग पहले टोटलाइजर शुरू करने का समर्थन कर चुका था, लेकिन बाद में उसने अपना रुख बदल लिया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विधि आयोग ने भी इसकी सिफारिश की थी।

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि राजनीतिक दलों का एकमात्र तर्क यह रहता है कि उन्हें बूथ प्रबंधन के लिए प्रत्येक मतदान केंद्र तक जाना पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मतदाताओं को डराए-धमकाए जाने और निशाना बनाए जाने के जोखिम के सामने यह कोई वैध कारण नहीं हो सकता। उन्होंने रेखांकित किया कि इसी मतदाता संरक्षण को ध्यान में रखते हुए विधि आयोग, निर्वाचन आयोग और संबंधित मंत्रालय ने 2010 में ही इसकी सिफारिश की थी।

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राजनीतिक विरोध और वैधानिक अड़चनें

निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डी.एस. नायडू ने पीठ को बताया कि आयोग ने इस मुद्दे पर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस परामर्श में 50 प्रतिशत राष्ट्रीय दलों और 68 प्रतिशत राज्य स्तरीय दलों ने इस उपकरण का विरोध किया। इसके बाद यह मामला मंत्रियों के समूह (जीओएम) के पास भेजा गया, जहां से भी इसे अस्वीकार कर दिया गया। नायडू ने कहा कि राजनीतिक मोर्चे पर इस व्यवस्था को लेकर पूरी तरह असहमति है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नियम बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, जो आयोग के परामर्श से नियम बनाती है; निर्वाचन आयोग केवल सिफारिश कर सकता है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि यद्यपि टोटलाइजेशन सैद्धांतिक तौर पर मतदाता की पसंद को गोपनीय रखने का एक साधन है, लेकिन इसे लागू करने के लिए वैधानिक आधार की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा कि अदालत अगर कोई आदेश जारी भी कर दे, तो उसे कानूनी समर्थन की जरूरत पड़ेगी। जस्टिस बागची ने यह भी इंगित किया कि आयोग ने इस व्यवस्था को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, बल्कि इसकी बाधाओं को सामने रखा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या इसे उन इलाकों में चुनिंदा तौर पर लागू नहीं किया जा सकता जहां मतदाताओं को प्रताड़ित किए जाने की जमीनी हकीकत स्पष्ट हो। इस पर नायडू ने सहमति जताते हुए कहा कि विधि आयोग ने भी इसके चुनिंदा इस्तेमाल की बात कही थी।

फॉर्म 17सी और ऑडिट व्यवस्था पर प्रभाव

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निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में वैधानिक प्रावधानों के अभाव के साथ-साथ परिचालन से जुड़ी कई कठिनाइयों को भी रेखांकित किया है। आयोग का कहना है कि क्लस्टर गणना से फॉर्म 17सी पर आधारित मौजूदा ऑडिट व्यवस्था प्रभावित होगी।

चुनाव संचालन नियमों के तहत फॉर्म 17सी दो भागों में तैयार किया जाता है और यह डाले गए मतों का आधिकारिक वैधानिक रिकॉर्ड होता है। आयोग ने आगाह किया कि जब कई बूथों की ईवीएम को एक साथ जोड़कर गिना जाएगा, तो किसी एक मशीन में सामने आने वाली विसंगति या गड़बड़ी कुल आंकड़ों के भीतर छिप जाएगी और पकड़ में नहीं आ सकेगी।

मैंने उपरोक्त समाचार रिपोर्ट को प्राकृतिक हिंदी शैली, शीर्षक-उपशीर्षक प्रारूप और आपके द्वारा बताए गए सभी नियमों (जैसे ‘सुप्रीम कोर्ट’ शब्द का प्रयोग तथा दिए गए मुहावरे से परहेज) के अनुसार तैयार कर दिया है। यदि आप इसमें कोई अन्य बदलाव चाहते हैं, तो बताएं।

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