बेंगलुरु कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति शारीरिक रूप से सक्षम और शिक्षित है, तो वह केवल आय का स्रोत न होने की दलील देकर अलग रह रही पत्नी के भरण-पोषण की नैतिक व कानूनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। जस्टिस डी के सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति को अपनी पत्नी को 15 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता (परमानेंट एलुमनी) एकमुश्त देने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने 20 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि जब पति काम करने में सक्षम है, तो उसे आजीविका जुटाकर अपनी पत्नी को भरण-पोषण देना ही होगा। इसके साथ ही अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पति की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया।
पति ने केवल गुजारा भत्ते के आदेश को दी थी चुनौती
दोनों पक्षों का विवाह 5 फरवरी 2009 को हुआ था, लेकिन शादी के तीन महीने बाद ही 5 मई 2009 से वे अलग रहने लगे। इसके बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की। पति का आरोप था कि पत्नी वैवाहिक जिम्मेदारियों को निभाने से इनकार करती है, सास-ससुर से अलग रहने की जिद करती है और लगातार विवाद करती है। उसने यह भी दावा किया कि पत्नी बिना बताए ससुराल छोड़कर चली गई और बाद में प्रताड़ना व क्रूरता के आरोप लगाते हुए कानूनी कार्यवाही शुरू की।
इसके विपरीत, पत्नी ने आरोपों को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट को बताया कि ससुराल में उसके साथ शारीरिक और मौखिक दुर्व्यवहार किया गया, जिसके कारण उसे अपने मायके में शरण लेनी पड़ी। उसने दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए भी अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अदालती आदेश के बावजूद पति ने साथ रहने से मना कर दिया।
महिला ने यह भी बताया कि करीब दो महीने की गर्भवती होने के दौरान उसे घर से निकाल दिया गया था। 9 दिसंबर 2009 को उसने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन पति ने गर्भावस्था और बच्चे के पालन-पोषण के दौरान कोई आर्थिक या भावनात्मक सहयोग नहीं दिया।
फैमिली कोर्ट ने 20 मार्च 2024 को विवाह विच्छेद का फैसला सुनाते हुए पति को 15 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। चूंकि पत्नी ने तलाक के फैसले को चुनौती नहीं दी थी, इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि क्रूरता या परित्याग के आरोपों की दोबारा समीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।
आय के दावों पर दस्तावेजी साक्ष्य का अभाव
हाईकोर्ट में अपील दायर कर पति ने केवल 15 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते के निर्देश का विरोध किया। उसका तर्क था कि पत्नी ने औपचारिक रूप से स्थायी भरण-पोषण की मांग नहीं की थी और न ही अपनी जरूरतों का कोई प्रमाण दिया था। पति ने यह भी दावा किया कि महिला हर महीने लगभग 30,000 रुपये कमाती है, जबकि वह खुद पहले से 15,000 रुपये मासिक अंतरिम भरण-पोषण दे रहा है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पति महिला की 30,000 रुपये मासिक आय के दावे के समर्थन में कोई भी दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं कर सका।
सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश और भुगतान की समय-सीमा
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि गुजारा भत्ता या स्थायी एलुमनी तय करते समय दोनों पक्षों की वित्तीय क्षमता, आय, संपत्ति, देनदारियों, जीवन स्तर, उचित जरूरतों और भुगतान करने वाले पक्ष की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के ‘रजनेश बनाम नेहा’, ‘रीमा सल्कान बनाम सुमेर सिंह सल्कान’ और ‘अंजू गर्ग बनाम दीपक कुमार गर्ग’ मामलों का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि अदालत को ऐसी उचित राशि निर्धारित करनी चाहिए जिससे महिला सम्मानपूर्वक जीवन जी सके और बच्चे की परवरिश कर सके। अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि पति पूर्व में एक सरकारी उपक्रम में कार्यरत था।
अदालत के आदेश के तहत, 15 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता मिलने के बाद पति पर पहले से लागू 15,000 रुपये प्रति माह के अंतरिम भरण-पोषण की कोई देनदारी नहीं रहेगी। पति 13 नवंबर 2024 के अंतरिम अदालती आदेश के तहत पहले ही 7.5 लाख रुपये जमा कर चुका है, जिसे पत्नी को निकालने की अनुमति दे दी गई है। पीठ ने पति को शेष 7.5 लाख रुपये का भुगतान आदेश की प्रति मिलने के एक महीने के भीतर करने का निर्देश दिया।
फैमिली कोर्ट्स के लिए संपत्ति का हलफनामा अनिवार्य करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य की सभी फैमिली कोर्ट्स को सुप्रीम कोर्ट के ‘रजनेश’ मामले के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट्स को भरण-पोषण या स्थायी गुजारा भत्ता तय करने से पहले दोनों पक्षों से उनकी संपत्ति और देनदारियों का विस्तृत हलफनामा अनिवार्य रूप से लेना चाहिए, ताकि दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति का निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ और यथार्थवादी मूल्यांकन सुनिश्चित किया जा सके।

