मवेशियों के अनधिकृत परिवहन के आरोप में पीएसए के तहत हिरासत गलत: हाईकोर्ट ने रद्द किया राजौरी डीएम का आदेश

श्रीनगर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत एक व्यक्ति को हिरासत में लेने के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति मवेशियों के परिवहन का महज आरोप किसी व्यक्ति पर पीएसए लगाने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता, बशर्ते यह साबित न हो कि इस कृत्य से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने या जनआक्रोश भड़कने की आशंका थी।

बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस एम. ए. चौधरी ने हिरासत में रखे गए व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। अदालत ने 21 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि जब तक सक्षम प्राधिकारी यह निष्कर्ष दर्ज नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों से व्यापक अशांति फैलने की आशंका थी, तब तक केवल पशु परिवहन के आरोपों पर निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) का सहारा नहीं लिया जा सकता।

सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे का अभाव

यह मामला राजौरी के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 3 मार्च को जारी किए गए एक आदेश से जुड़ा है। जिला प्रशासन ने हिरासत का बचाव करते हुए कहा था कि यह कदम पुलिस रिकॉर्ड और मवेशी तस्करी के तीन अलग-अलग मामलों के आधार पर उठाया गया। प्रशासन का तर्क था कि इन गतिविधियों में लगातार संलिप्तता व्यक्ति की आपराधिक प्रवृत्ति को दर्शाती है और इससे जिले की कानून-व्यवस्था व शांति के लिए खतरा पैदा हो रहा था।

इसके विपरीत, याचिकाकर्ता ने हिरासत आदेश को चुनौती देते हुए इसे अस्पष्ट और बिना सोचे-समझे की गई कार्रवाई बताया। याचिका में दलील दी गई कि प्रशासन ने 2023 और 2025 की पुरानी प्राथमिकियों (एफआईआर) का हवाला दिया है, जिनका वर्तमान में सार्वजनिक व्यवस्था में किसी भी तरह के व्यवधान से कोई सीधा या तात्कालिक संबंध नहीं है।

संवैधानिक प्रक्रिया और अधिकारों का उल्लंघन

हाईकोर्ट ने आदेश के क्रियान्वयन में एक बड़ी प्रक्रियात्मक खामी भी पाई। अदालत ने दर्ज किया कि संबंधित व्यक्ति को सरकार के समक्ष अपनी हिरासत के खिलाफ प्रतिवेदन (रिप्रजेंटेशन) देने के अधिकार की जानकारी तो दी गई थी, लेकिन उसे यह नहीं बताया गया कि वह आदेश जारी करने वाले प्राधिकारी (डिटेनिंग अथॉरिटी) के समक्ष भी अपना पक्ष रख सकता है।

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जस्टिस चौधरी ने रेखांकित किया कि अपनी हिरासत के खिलाफ प्रभावी प्रतिवेदन देने की संवैधानिक गारंटी तभी सार्थक होती है, जब व्यक्ति को उन सभी सक्षम मंचों की स्पष्ट जानकारी दी जाए जहां वह जल्द से जल्द राहत मांग सकता है। अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत से जुड़े वैधानिक और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन होना अनिवार्य है और इस प्रक्रियात्मक चूक के कारण हिरासत आदेश अवैध और रद्द किए जाने योग्य हो जाता है।

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