2009-10 के बाद के लॉ ग्रेजुएट्स दो साल में AIBE पास न करने पर वकालत नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने निर्णय दिया है कि शैक्षणिक सत्र 2009-10 या उसके बाद उत्तीर्ण होने वाले लॉ ग्रेजुएट, जो अनंतिम (प्रोविजनल) नामांकन के दो वर्षों के भीतर ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास करने में विफल रहते हैं, उन्हें किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल या राजस्व प्राधिकरण के समक्ष वकालत करने का अधिकार नहीं है। अधिवक्ताओं के नामांकन और प्रैक्टिस से जुड़े प्रक्रियात्मक व वैधानिक पहलुओं को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिवक्ता पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी तब तक बिना नवीनीकृत प्रैक्टिस प्रमाण पत्र (COP) के प्रैक्टिस जारी रख सकते हैं, जब तक कि राज्य बार काउंसिल बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015 के नियम 20.4 के तहत गैर-प्रैक्टिसिंग वकीलों की सूची आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं कर देती।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला योगेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य में एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। हालांकि, जमानत याचिका का निस्तारण 6 जुलाई 2026 को ही कर दिया गया था, लेकिन आवेदक का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता श्री जयहिंद गौंड की योग्यता को लेकर एक प्रक्रियात्मक सवाल खड़ा हुआ। उक्त अधिवक्ता ने शैक्षणिक सत्र 2009-10 के बाद एलएलबी की डिग्री हासिल की थी, लेकिन नामांकन के दो साल बीत जाने के बाद भी AIBE परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी।

हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं से संबंधित अधिनियम, 1961 की धारा 32 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए संबंधित वकील को एक बार के अपवाद के रूप में बहस करने की अनुमति दी, लेकिन इस कानूनी प्रश्न को निर्णय के लिए खुला रखा। इसके बाद कोर्ट ने प्रोविजनल नामांकन, AIBE उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता और प्रैक्टिस प्रमाण पत्र के सत्यापन से जुड़ी कानूनी आवश्यकताओं को स्पष्ट करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और एडवोकेट्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों से सहयोग मांगा।

विभिन्न पक्षों की दलीलें

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से पेश हुए स्टैंडिंग काउंसिल श्री साईं गिरधर ने तर्क दिया कि 2015 के सत्यापन नियमों का नियम 5 तब लागू होता है जब प्रमाणित प्रैक्टिस के सत्यापन का प्रश्न उठता है। ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन रूल्स, 2010 के अंतर्गत आने वाले लॉ ग्रेजुएट्स को पांच साल बाद अपने COP का सत्यापन या नवीनीकरण कराना होता है। उन्होंने बताया कि BCI के 12 अप्रैल 2013 के संकल्प के अनुसार, 2009-10 के बाद के लॉ ग्रेजुएट्स को दो साल के लिए प्रोविजनल नामांकन मिलता है, जिसके दौरान वे प्रैक्टिस कर सकते हैं। हालांकि, यदि वे दो वर्षों के भीतर AIBE पास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उनका नामांकन स्वतः समाप्त हो जाता है और वे तब तक किसी भी अदालत में प्रैक्टिस करने की पात्रता खो देते हैं जब तक कि वे परीक्षा पास न कर लें। BCI ने 31 जनवरी 2017 के अपने स्पष्टीकरण में यह भी पुष्टि की थी कि उम्मीदवार प्रैक्टिस की पात्रता पुनः प्राप्त करने के लिए असीमित बार AIBE में शामिल हो सकते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री के.के. द्विवेदी ने कोर्ट को सूचित किया कि प्रोविजनल रूप से नामांकित अधिवक्ताओं को बार एसोसिएशन का सदस्य बनने की अनुमति दी जाती है, लेकिन मतदान का अधिकार तीन साल बाद ही मिलता है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट दो साल के लिए प्रोविजनल एडवोकेट रोल जारी करता है, और यदि सामान्य सूचना के बाद AIBE पास करने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जाता है तो इसे रद्द किया जा सकता है।

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हाईकोर्ट के एडवोकेट रोल अनुभाग के उप-रजिस्ट्रार श्री सर्वेश कुमार सिंह ने पुष्टि की कि हाईकोर्ट समय-समय पर अपने रोल को अपडेट करता है और यदि अधिवक्ता दो साल बाद परीक्षा पास करने का प्रमाण पत्र जमा नहीं करते हैं, तो प्रोविजनल प्रविष्टियों को समाप्त कर दिया जाता है।

उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के वकील श्री अशोक कुमार तिवारी ने कहा कि नियम 5 के तहत सत्यापन की प्रक्रिया वर्तमान में जारी है और नियम 20.4 के तहत गैर-प्रैक्टिसिंग वकीलों की औपचारिक सूची अभी प्रकाशित नहीं की गई है।

आवेदक के अधिवक्ता श्री जयहिंद गौंड ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने 18 जुलाई 2026 को AIBE परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है और परिणाम भी प्रस्तुत कर दिया है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि यूपी बार काउंसिल को परिणाम कार्ड प्राप्त होने के एक सप्ताह के भीतर स्थायी नामांकन संख्या जारी करने का निर्देश दिया जाए।

राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) श्री डी.पी.एस. चौहान और सुश्री मयूरी मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि 2015 के नियमों के नियम 5 के तहत, वैध COP के बिना कोई भी अधिवक्ता किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल या साक्ष्य लेने के लिए अधिकृत प्राधिकारी के समक्ष बहस नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 2(1)(a) के तहत अदालत की परिभाषा में राजस्व अदालतें भी शामिल हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और उसके तहत बनाए गए नियमों के वैधानिक ढांचे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने न्याय प्रशासन में कानूनी पेशे की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला और टिप्पणी की:

“वकालत का पेशा सबसे प्रतिष्ठित पेशों में से एक है क्योंकि यह लोगों के नागरिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बार और बेंच न्याय के रथ के दो पहिए हैं, और एक के बिना दूसरा काम नहीं कर सकता।”

कोर्ट ने AIBE रूल्स, 2010 के नियम 9 का विश्लेषण किया, जो 2009-10 के बाद से स्नातक करने वाले सभी वकीलों के लिए बार परीक्षा पास करना अनिवार्य बनाता है। कोर्ट ने नोट किया कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24(1) के स्पष्टीकरण के अनुसार, किसी व्यक्ति को उस तिथि से कानून की डिग्री प्राप्त माना जाता है जिस दिन विश्वविद्यालय द्वारा परिणाम घोषित किया जाता है।

फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मील का पत्थर साबित हुए निर्णयों का संदर्भ दिया गया, जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बोनी फोई लॉ कॉलेज (2023) का मामला शामिल है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वी. सुधीर बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया (1999) के फैसले को उलटते हुए पूर्व-नामांकन परीक्षाओं और गुणवत्ता नियंत्रण के उपाय निर्धारित करने की BCI की शक्ति को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया था कि “बार में प्रवेश का गुणवत्ता नियंत्रण समय की आवश्यकता है।”

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि बोनी फोई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी रोजगार में लंबे समय के अंतराल के बाद वकालत में वापस लौटने वाले अधिवक्ताओं के लिए नियम बनाने का सुझाव दिया था:

“हम सिद्धांत रूप में इस सुझाव को स्वीकार करने के इच्छुक हैं कि ऐसे उपयुक्त नियम बनाए जा सकते हैं जिनके तहत गैर-कानूनी संदर्भ में लंबे समय (जैसे पांच वर्ष) के लिए नौकरी करने वाले नामांकित अधिवक्ता को नया नामांकित व्यक्ति माना जाएगा और अपनी योग्यता पुनः प्राप्त करने के लिए उस व्यक्ति को ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन एक बार फिर पास करना होगा।”

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि BCI ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश की अनदेखी की है।

इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने जमशेद अंसारी बनाम हाईकोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर एट इलाहाबाद (2016) का हवाला दिया, जिसने इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के अध्याय XXIV के नियम 3 और 3A की वैधता को बरकरार रखा था। इसमें माना गया था कि धारा 24 के तहत वकालत करने का अधिकार हाईकोर्ट के अपने समक्ष वकालत को विनियमित करने वाले नियमों के अधीन है।

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प्रमुख निष्कर्ष और निर्देश

उठाए गए कानूनी मुद्दों का समाधान करते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निष्कर्ष दिए और दिशा-निर्देश जारी किए:

  1. 2009-10 के बाद प्रैक्टिस का अधिकार: 2009-10 के शैक्षणिक सत्र से लॉ पास करने वाले ग्रेजुएट राज्य बार काउंसिल द्वारा जारी प्रोविजनल नामांकन प्रमाण पत्र के आधार पर दो साल के लिए प्रैक्टिस करने के हकदार हैं। यदि वे दो साल के भीतर AIBE पास करने में विफल रहते हैं, तो वे किसी भी सिविल कोर्ट, क्रिमिनल कोर्ट, ट्रिब्यूनल या राजस्व अदालत (तहसीलदार से लेकर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू तक) में वकालत करने का अधिकार खो देते हैं।
  2. हाईकोर्ट में उपस्थिति: प्रोविजनल नामांकन वाले वकीलों को हाईकोर्ट में बहस करने के लिए हाईकोर्ट एडवोकेट रोल पर भी प्रोविजनल रूप से पंजीकृत होना आवश्यक है। जिनके पास हाईकोर्ट रोल नहीं है, वे केवल ऐसे वकील के साथ ही उपस्थित हो सकते हैं जो हाईकोर्ट रोल पर नामांकित हों।
  3. सत्यापन लंबित रहने के दौरान प्रैक्टिस की वैधता: 2015 के सत्यापन नियमों के नियम 5 के अनुसार, जिन वकीलों ने अपने COP प्राप्ति के पांच वर्ष पूरे कर लिए हैं, वे सत्यापन/नवीनीकरण लंबित रहने पर भी तब तक वकालत जारी रख सकते हैं जब तक कि यूपी बार काउंसिल नियम 20.4 के तहत गैर-प्रैक्टिसिंग वकीलों की सूची आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं कर देती।
  4. अमान्यता के परिणाम: किसी भी अदालत या ट्रिब्यूनल के पीठासीन अधिकारी उन वकीलों को सुनने से मना करने या उनके वकालतनामे को अस्वीकार करने के लिए अधिकृत हैं जो दो साल में AIBE उत्तीर्ण करने में विफल रहे हैं। ऐसे वकीलों को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 45 के तहत मुकदमेबाजी का भी सामना करना पड़ सकता है।
  5. हाईकोर्ट और संबंधित अधिकारियों को निर्देश:
    • हाईकोर्ट के एडवोकेट रोल अनुभाग को निर्देश दिया गया है कि वे नोटिस जारी करने के बाद दो साल में AIBE पास करने का प्रमाण न देने वाले प्रोविजनल नामांकित वकीलों के नाम रोल से हटाएं या निलंबित करें।
    • उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के अध्यक्ष और सचिव को निर्देश दिया गया है कि वे AIBE रिजल्ट कार्ड प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर अधिवक्ताओं को स्थायी नामांकन संख्या जारी करें।
    • उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया गया है कि वे सभी जिला पुलिस प्रमुखों को यूपी बार काउंसिल से फॉर्म मिलने के दो सप्ताह के भीतर लॉ ग्रेजुएट्स का पुलिस सत्यापन पूरा करने के आदेश जारी करें।
    • निर्णय की प्रतियां यूपी के मुख्य सचिव को राजस्व अदालतों और ट्रिब्यूनलों में प्रसारित करने के लिए, राज्य बार काउंसिल, DGP यूपी और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष को भेजने का निर्देश दिया गया है।
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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: योगेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य
वाद संख्या: आपराधिक विविध जमानत आवेदन संख्या 17377/2026
पीठ: जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल
निर्णय की तिथि: 7 अगस्त 2026

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