इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिरासत में रखकर बर्बर पिटाई करने और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 के तहत अपराध के आरोपी पुलिसकर्मी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 के तहत अभियोजन से संरक्षण का दावा नहीं कर सकते। एकल पीठ के जस्टिस मदन पाल सिंह ने पुलिसकर्मियों द्वारा दायर दो आपराधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उनकी डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि लोगों के हाथ-पैर बांधकर, उन्हें औंधे मुंह लिटाकर लाठियों से पीटना कोई आधिकारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक जघन्य अपराध है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला बांदा जिले में दर्ज मुकदमों से जुड़ा है। सबसे पहले, बांदा के बबेरू थाने में एक शिकायत पर पेशे से वकील एक व्यक्ति और उनके परिजनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 323, 504 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। विवेचना के दौरान एक घायल व्यक्ति के सिर में फ्रैक्चर पाए जाने पर मामले में धारा 308 आईपीसी बढ़ाई गई। इसके बाद सीआरपीसी की धारा 41ए के तहत नोटिस तामील कराने के लिए चार सिपाही पादरी गांव पहुंचे। आरोप है कि वहां आरोपियों और उनके परिवार वालों ने पुलिसकर्मियों के साथ गाली-गलौज व मारपीट की, नोटिस फाड़े, ईंट-पत्थर चलाए और एक सिपाही का मोबाइल छीन लिया।
इस घटना के संबंध में 13 मई 2022 को एक सिपाही की तहरीर पर 14 नामजद लोगों के खिलाफ बलवा और लोक सेवक पर हमले सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई। 13 मई की रात को ही परिवार की चार महिला सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि 14 मई 2022 को शिकायतकर्ता अधिवक्ता सहित चार पुरुषों को गिरफ्तार किया गया। मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने पर अदालत के निर्देश पर गठित मेडिकल बोर्ड ने सभी आठों गिरफ्तार लोगों का मेडिकल परीक्षण किया, जिसमें उनके शरीर पर गंभीर चोटों की पुष्टि हुई।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता ने पुलिसकर्मियों पर अवैध तरीके से पीटने, छेड़खानी, कस्टोडियल हिंसा, लूटपाट और झूठे मुकदमे में फंसाने का आरोप लगाते हुए पुलिस अधीक्षक से शिकायत की और अदालत में धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत अर्जी दाखिल की। अदालत के आदेश पर 26 जून 2022 को नामजद और अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। हालांकि, विवेचक ने यह निष्कर्ष निकालते हुए फाइनल रिपोर्ट लगा दी कि यह मुकदमा पुलिस पर दबाव बनाने के लिए दर्ज कराया गया था। 18 अक्टूबर 2023 को विशेष न्यायाधीश ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट खारिज करते हुए प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार कर ली और पुलिसकर्मियों के खिलाफ संज्ञान लेते हुए उन्हें आईपीसी की धारा 147, 148, 452, 323, 504, 354, 354-बी और 395 सपठित धारा 34 के तहत तलब (समन) कर लिया।
समन आदेश के खिलाफ पुलिसकर्मियों ने पहले हाईकोर्ट में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दाखिल की थी, लेकिन 8 फरवरी 2024 को उन्होंने सक्षम अदालत में जमानत अर्जी दाखिल करने की छूट मांगते हुए याचिका वापस ले ली। इसके बावजूद, पुलिसकर्मियों ने न तो आत्मसमर्पण किया और न ही जमानत ली; बल्कि उन्होंने ट्रायल कोर्ट के समक्ष धारा 197 सीआरपीसी के तहत डिस्चार्ज अर्जी लगाकर यह दलील दी कि सरकारी पूर्व-स्वीकृति (सैंक्शन) के बिना उन पर मुकदमा नहीं चल सकता। 27 सितंबर 2024 को विशेष न्यायाधीश ने उनकी डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों के वकील ने तर्क दिया कि आरोपी पुलिसकर्मी अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले धारा 197 सीआरपीसी के तहत सक्षम प्राधिकारी की अनिवार्य स्वीकृति आवश्यक है। वकील का यह भी कहना था कि यदि यह मान भी लिया जाए कि पुलिसकर्मियों ने अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान सीमाओं का उल्लंघन किया था, तब भी धारा 197 सीआरपीसी का सुरक्षात्मक दायरा उन पर लागू रहेगा।
इसके विपरीत, राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) और शिकायतकर्ता के वरिष्ठ वकील ने इन याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि एक वकील, उनकी 60 वर्षीय बुजुर्ग पत्नी और नाबालिग बेटियों को थाने में बंधक बनाकर बेरहमी से पीटना किसी भी स्थिति में आधिकारिक कर्तव्य या उसका विस्तार नहीं हो सकता। यह भी दलील दी गई कि धारा 197(1) सीआरपीसी के स्पष्टीकरण के अनुसार, यदि किसी लोक सेवक पर धारा 354 आईपीसी के तहत आरोप हैं, तो किसी अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती। इसके अलावा, पुलिसकर्मियों ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेश और अपने आश्वासन का खुला उल्लंघन किया है और जमानत न लेकर न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना की है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड द्वारा तैयार की गई सभी आठ पीड़ितों की चोट रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण किया, जिसमें पीड़ितों के कूल्हों, जांघों और पैरों पर गहरे नीले रंग के गंभीर चोट के निशान और सूजन दर्ज थी। चोटों की भयावहता को देखते हुए कोर्ट ने कहा:
“शिकायतकर्ता सहित उपरोक्त घायलों को आई चोटों के अवलोकन से पता चलता है कि थाने में पुलिस हिरासत के दौरान आवेदकों सहित अन्य पुलिसकर्मियों ने उनके हाथ-पैर रस्सी से बांधकर और उन्हें औंधे मुंह लिटाकर बार-बार पीटा, जिसमें विशेष रूप से कूल्हों, जांघों और पिंडलियों पर वार किए गए। आवेदकों द्वारा की गई ऐसी हिंसा को पुलिस कर्तव्य का हिस्सा नहीं कहा जा सकता, इसे केवल एक जघन्य अपराध ही करार दिया जा सकता है। न ही यह तर्क दिया जा सकता है कि पुलिस ने जांच के दौरान केवल अपनी सीमाओं को थोड़ा लांघा था। कोर्ट की राय में, आवेदकों जैसे पुलिसकर्मी धारा 197 सीआरपीसी के तहत प्रदान किए गए किसी भी संरक्षण के हकदार नहीं हैं।”
कोर्ट ने पुलिस द्वारा जनरल डायरी (जीडी नंबर 54, दिनांक 14 मई 2022) में दर्ज उस स्पष्टीकरण को भी पूरी तरह अविश्वसनीय माना, जिसमें दावा किया गया था कि गिरफ्तारी के दौरान जमीन पर गिरने से आरोपियों को चोटें आईं। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की:
“यह पूरी तरह हास्यास्पद प्रतीत होता है; गिरफ्तारी के समय यदि चारों गिर जाएं और घायल हो जाएं, तो उनके खून बहने लगेगा।”
कोर्ट ने आगे कहा कि यदि ट्रायल कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड से परीक्षण कराने का आदेश न दिया होता, तो इन गंभीर चोटों की सच्चाई कभी सामने नहीं आती और पुलिस द्वारा बनाई गई झूठी रिपोर्ट ही रिकॉर्ड में रह जाती।
हाईकोर्ट के पूर्व आदेश का पालन न करने के रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए पीठ ने माना:
“ऐसी परिस्थितियों में, इस कोर्ट का यह सुविचारित मत है कि धारा 197 सीआरपीसी के तहत संरक्षण की मांग करते हुए आवेदकों द्वारा ट्रायल कोर्ट के समक्ष दायर डिस्चार्ज अर्जी पोषणीय नहीं है। ऐसे लोग, जिन्होंने जानबूझकर कानून की प्रक्रिया की अवहेलना की है, वे धारा 482 सीआरपीसी / 528 बीएनएसएस के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस कोर्ट से किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।”
इसके साथ ही, धारा 197(1) सीआरपीसी के स्पष्टीकरण का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पाया कि चूंकि आरोपियों पर आईपीसी की धारा 354 का आरोप भी लगा है, इसलिए कानूनन किसी पूर्व स्वीकृति की बाध्यता नहीं है:
“इस प्रकार, धारा 197(1) सीआरपीसी के स्पष्टीकरण के मद्देनजर, आरोपी लोक सेवक होने की स्थिति में आवेदकों के मामले में किसी पूर्व अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के जिन फैसलों का हवाला दिया गया था, वे इस मामले के तथ्यों से पूरी तरह भिन्न हैं।
हाईकोर्ट का निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा 27 सितंबर 2024 को डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के आदेश में कोई त्रुटि या अवैधता नहीं है। अदालत ने उस आदेश की पुष्टि करते हुए पुलिसकर्मियों द्वारा दायर दोनों आपराधिक याचिकाओं को योग्यताहीन पाते हुए खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: लेडी कांस्टेबल शिवानी जोशी व 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (संबद्ध मामले के साथ)
वाद संख्या: आवेदन अंतर्गत धारा 482 संख्या 42310/2024 एवं आवेदन अंतर्गत धारा 528 बीएनएसएस संख्या 21927/2025
पीठ: जस्टिस मदन पाल सिंह
निर्णय की तिथि: 9 सितंबर 2026

