रिव्यू के तहत मेरिट्स पर दोबारा बहस नहीं हो सकती: दिल्ली हाईकोर्ट ने एसबीआई के खिलाफ मकान मालिक की याचिका खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के खिलाफ मेस्ने प्रॉफिट्स (अनधिकृत उपयोग शुल्क) और ब्याज की मांग को लेकर दायर एक मकान मालिक की रिव्यू पिटीशन खारिज कर दी है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने स्पष्ट किया कि किसी निर्णय के गुण-दोष (मेरिट्स) और न्यायिक निष्कर्षों को चुनौती देना सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी), 1908 की धारा 114 और ऑर्डर 47 रूल 1 के तहत रिव्यू के सीमित दायरे से बाहर है। हाईकोर्ट ने कहा कि जहां रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष रूप से कोई त्रुटि नजर नहीं आती, वहां रिव्यू याचिका को अपील का रूप नहीं दिया जा सकता।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह रिव्यू पिटीशन 9 जुलाई 2026 को रेगुलर फर्स्ट अपील (आरएफए संख्या 73/2023) में पारित फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। अपीलकर्ता राज कुमारी गर्ग ने अपने बेटे और जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) धारक दीपक गर्ग के माध्यम से नई दिल्ली स्थित डिफेंस कॉलोनी मार्केट की एक कमर्शियल प्रॉपर्टी 10 मार्च 2003 की लीज डीड के तहत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को पट्टे पर दी थी।

मूल लीज डीड ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 111(ए) के तहत 31 दिसंबर 2004 को समय समाप्त होने के कारण निष्प्रभावी हो गई थी। इसके बाद लीज बढ़ाने की मंशा को लेकर 6 जनवरी 2005 और 26 दिसंबर 2007 को दो पत्र लिखे गए। इसके अलावा, अपीलकर्ता ने बैंक की रेंट स्कीम के तहत 25 लाख रुपये का ऋण लेते हुए 2 फरवरी 2007 को एक गैर-पंजीकृत वचनपत्र (अंडरटेकिंग) भी निष्पादित किया था। यह ऋण मई 2012 में चुकता किया गया।

मकान मालिक ने 9 मई 2008 को नोटिस जारी कर 1 जून 2008 से किरायेदारी समाप्त करने की मांग की और 11 अगस्त 2008 को संपत्ति का कब्जा वापस लेने व मेस्ने प्रॉफिट्स के लिए मुकदमा दायर किया। बैंक ने 31 दिसंबर 2017 को परिसर खाली किया। हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2026 के अपने फैसले में माना था कि गैर-पंजीकृत पत्राचार और अंडरटेकिंग के आधार पर मई 2012 तक बैंक का कब्जा अधिकृत था। इस आधार पर अदालत ने 11 अगस्त 2008 से अप्रैल 2012 तक (44 महीने) के लिए मेस्ने प्रॉफिट्स की मांग अस्वीकार कर दी थी।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने रिव्यू के लिए मुख्य रूप से तीन आधार प्रस्तुत किए:

  1. गैर-पंजीकृत दस्तावेज एक वर्ष से अधिक की लीज नहीं बना सकते: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 107 और रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 49 के तहत एक गैर-पंजीकृत अंडरटेकिंग एक वर्ष से अधिक की किरायेदारी नहीं बना सकती और न ही किरायेदार को बेदखली से बचा सकती है। उन्होंने कहा कि 1 फरवरी 2008 को एक साल की अवधि समाप्त होने और 9 मई 2008 को बेदखली नोटिस जारी होने के बाद बैंक की स्थिति केवल अनधिकृत दखलकार (टेनेंट बाय सफरेंस) या अतिचारी जैसी रह गई थी। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आर.वी. भूपाल प्रसाद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1995) का हवाला देते हुए दावा किया कि बैंक के कब्जे को मई 2012 तक अधिकृत मानना रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष त्रुटि है।
  2. किराया वृद्धि संबंधी मिसाल पर विचार न करना: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि अदालत ने हाईकोर्ट की समन्वय पीठ द्वारा अनिल कुमार खन्ना एवं अन्य बनाम इंडियन टूरिज्म डेवलपमेंट (निर्णय तिथि: 17 जुलाई 2015) में तय कानूनी स्थिति पर गौर नहीं किया, जिसमें प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में किराये या मेस्ने प्रॉफिट्स में प्रति वर्ष 15 प्रतिशत की वृद्धि को मान्यता दी गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि निचली अदालत ने 15 प्रतिशत वृद्धि के साथ 163 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से मेस्ने प्रॉफिट्स तय किया था। इस सिद्धांत को नजरअंदाज किए जाने से उन्हें अगस्त 2008 से अप्रैल 2012 तक की राशि और उस पर बनने वाले ब्याज से वंचित होना पड़ा।
  3. सीपीसी की धारा 34 के तहत कब्जा खाली होने के बाद के ब्याज से इनकार: सुप्रीम कोर्ट के फैसले लिली थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2000) का संदर्भ देते हुए तर्क दिया गया कि धारा 34 सीपीसी के तहत अदालत को अपने न्यायिक विवेक का उचित उपयोग करना चाहिए। परिसर खाली होने की तिथि (31 दिसंबर 2017) से लेकर वास्तविक भुगतान की तिथि तक बकाया मेस्ने प्रॉफिट्स पर ब्याज न देना याचिकाकर्ता के साथ अन्याय है।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण

ऑर्डर 47 रूल 1 सीपीसी के स्थापित सिद्धांतों के तहत दलीलों का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए तीनों बिंदु वास्तव में फैसले के गुण-दोष पर दोबारा बहस करने के अस्वीकार्य प्रयास हैं।

गैर-पंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर पांच साल के विस्तार को मान्यता देने से जुड़ी आपत्ति पर जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने टिप्पणी की:

“यह तर्क पूरी तरह से भ्रामक है क्योंकि यह मानने के लिए ठोस कारण दिए गए हैं कि किरायेदारी पांच वर्षों के लिए बढ़ाई गई थी। उठाया गया यह आधार वास्तव में इस अदालत के निष्कर्ष को चुनौती देना है, जो रिव्यू पिटीशन के दायरे से बाहर है।”

अनिल कुमार खन्ना मामले की मिसाल और अगस्त 2008 से 15 प्रतिशत की वृद्धि के दावे पर हाईकोर्ट ने दोहराया कि मूल फैसले में इस अधिकार पर पहले ही विचार किया जा चुका है:

“हालांकि, यह पहलू भी फैसले के गुण-दोष (मेरिट्स) से संबंधित है, क्योंकि फैसले में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि चूंकि किरायेदारी में पांच साल का विस्तार था, इसलिए अपीलकर्ता अप्रैल 2012 तक मेस्ने प्रॉफिट्स पाने की हकदार नहीं थी। यह आधार भी अनिवार्य रूप से आक्षेपित फैसले के निष्कर्षों के मेरिट्स पर दोबारा विचार की मांग करता है और यह रिव्यू पिटीशन के दायरे से परे है।”

कब्जा सौंपे जाने के बाद यानी 31 दिसंबर 2017 के बाद ब्याज न दिए जाने के तीसरे आधार पर अदालत ने स्पष्ट किया कि सीपीसी की धारा 34 के तहत ब्याज देना अदालत के विवेकाधिकार का विषय है और इसे रिव्यू याचिका का आधार नहीं बनाया जा सकता।

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हाईकोर्ट का फैसला

रिव्यू क्षेत्राधिकार के कानूनी प्रावधानों को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा:

“जिन तीन आधारों पर किसी फैसले का रिव्यू किया जा सकता है, वे हैं रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाली त्रुटि, नए और महत्वपूर्ण तथ्यों या साक्ष्यों की खोज, अथवा कोई अन्य पर्याप्त कारण। रिव्यू अर्जी में लिए गए आधार रिव्यू के दायरे से बाहर हैं, क्योंकि रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष रूप से कोई त्रुटि नजर नहीं आती। वास्तव में, ये तीनों आधार इस अदालत के 09.07.2026 के आक्षेपित फैसले में दिए गए निष्कर्षों और टिप्पणियों को दी गई चुनौती हैं।”

अदालत ने माना कि “आक्षेपित फैसले का रिव्यू करने के लिए रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष रूप से कोई त्रुटि नजर नहीं आती।” इसके साथ ही हाईकोर्ट ने रिव्यू पिटीशन और लंबित अर्जी को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: राज कुमारी गर्ग बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
वाद संख्या: रिव्यू पिटीशन 365/2026, आरएफए संख्या 73/2023 में
पीठ: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
निर्णय की तिथि: 10 सितंबर 2026

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