खरगे परिवार के ट्रस्ट को जमीन आवंटन मामला: विशेष अदालत की जांच पर हाईकोर्ट की रोक, प्रक्रियात्मक खामियां सुधारने के निर्देश

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के परिवार द्वारा संचालित ट्रस्ट को बेंगलुरु में वर्ष 2010 में आवंटित सीए (नागरिक सुविधा) भूखंड में कथित भ्रष्टाचार की जांच विशेष अदालत द्वारा खुद कराए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनप्रतिनिधियों की विशेष अदालत ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना खुद जांच शुरू करने का फैसला लेकर गलती की थी।

न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना की पीठ ने 18 अगस्त को पारित और हाल ही में जारी अपने आदेश में विशेष अदालत के 11 अगस्त के उस निर्देश को खारिज कर दिया, जिसके तहत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223 के अंतर्गत अदालत स्तर पर जांच शुरू की गई थी। हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता को अपने हलफनामे की कमियां दुरुस्त करने का अवसर देने और उसके बाद तय वैधानिक प्रक्रिया के तहत मामला आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।

शिकायतकर्ता की याचिका और अदालत का फैसला

यह मामला ‘फोरम फॉर ए करप्शन फ्री कर्नाटक’ के अध्यक्ष विजयराघव मराठे की याचिका पर आया था। मराठे ने विशेष अदालत द्वारा मामले की जांच पुलिस को सौंपने के बजाय खुद जांच करने के कदम को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पीठ ने रेखांकित किया कि यदि किसी हलफनामे में कोई ऐसी त्रुटि हो जिसे ठीक किया जा सकता है, तो कानूनी प्रक्रिया को ही छोड़ देने के बजाय उस खामी को दुरुस्त करने का मौका दिया जाना चाहिए। अदालत ने पाया कि किसी लोक सेवक के खिलाफ पुलिस जांच की मांग करते समय शिकायतकर्ता ने बीएनएसएस में निहित सुरक्षा उपायों और पूर्व पुलिस जांच से जुड़े जरूरी विवरण हलफनामे में दर्ज नहीं किए थे।

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हाईकोर्ट ने विशेष अदालत को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को हलफनामे की त्रुटि सुधारने का मौका दे और फिर बीएनएसएस की धारा 175 में दर्ज नियमों व सुरक्षा उपायों के अनुसार कार्रवाई करे। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद मामले को जांच के लिए भेजा जाए या नहीं, इसका निर्णय संबंधित विशेष अदालत को ही करना है।

10 करोड़ से अधिक की जमीन रियायती दर पर देने का आरोप

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शिकायत में आरोप लगाया गया है कि बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (BDA) ने बीटीएम लेआउट चतुर्थ चरण के दूसरे ब्लॉक में स्थित 8,001 वर्ग मीटर का भूखंड सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट को दिया था। दस करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की इस जमीन को तत्कालीन बी एस येदियुरप्पा नीत भाजपा सरकार के कार्यकाल में 50 प्रतिशत रियायत के साथ मात्र 1 करोड़ रुपये में आवंटित किया गया था।

शिकायतकर्ता के अनुसार, ट्रस्ट ने अनुसूचित जाति वर्ग के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था के रूप में शैक्षणिक संस्थान खोलने के नाम पर जमीन हासिल की, लेकिन बाद में उस भूखंड का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए नहीं किया गया।

जमीन का बदलाव और कानूनी विवाद

प्रारंभ में भाजपा सरकार ने अप्रैल 2010 में बनशंकरी छठे चरण के पांचवें ब्लॉक में 8,125 वर्ग मीटर का सीए भूखंड ट्रस्ट को देने की मंजूरी दी थी। इसके लिए पट्टा राशि पहले 2.03 करोड़ रुपये तय की गई थी, जिसे ट्रस्ट के अनुरोध पर घटाकर 1.10 करोड़ रुपये कर दिया गया।

इसके बाद ट्रस्ट ने वैकल्पिक जमीन की मांग की, जिसके चलते सितंबर 2010 में उन्हें बीटीएम लेआउट का वर्तमान भूखंड दे दिया गया। हालांकि, यह वैकल्पिक भूखंड भी कानूनी पचड़े में फंस गया, क्योंकि बाद में भाजपा सरकार ने निजी व्यक्तियों के पक्ष में बीडीए के अधिग्रहण को रद्द (डिनोटिफाई) कर दिया था। जमीन का उपयोग न होने के आधार पर हाईकोर्ट ने 2021 में बीडीए के मूल अधिग्रहण को रद्द करने का आदेश दिया था, लेकिन सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट ने अपनी जमीन के संबंध में स्थगनादेश (स्टे) हासिल कर लिया था।

पुलिस जांच की मांग

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मराठे का तर्क है कि भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और नियमों को ताक पर रखकर अनुचित लाभ पहुंचाने जैसे गंभीर आरोपों की जांच विशेष अदालत अपनी सीमित inquiry के जरिए नहीं कर सकती। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोक सेवकों से जुड़े मामलों की जांच के लिए विशेष पुलिस एजेंसियां गठित हैं, इसलिए इस प्रकरण की तह तक जाने के लिए पुलिस जांच ही एकमात्र उपयुक्त जरिया है।

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