भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 34 और धारा 149 के तहत संयुक्त आपराधिक दायित्व और चश्मदीद गवाहों के बयानों के कानूनी मूल्यांकन से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने दो अभियुक्तों को बरी करने का हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि हमले के दौरान पीड़ित को पकड़कर रखने और गोली चलाने के लिए ललकारने वाले आरोपियों की भूमिका स्पष्ट रूप से साबित होती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नागेंद्र सिंह (ए6) और दलप्रताप सिंह (ए12) को दोषी ठहराते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को बहाल कर दिया, जबकि ठोस सबूतों की कमी के चलते राजीव लोचन सिंह (ए13) और दस अन्य आरोपियों को बरी रखने का आदेश बरकरार रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन के अनुसार, यह घटना 9 मार्च 2004 की रात करीब 8:00 बजे की है। सत्रह लोगों पर एक ही परिवार के तीन भाइयों पर घात लगाकर हमला करने और उनमें से एक वीरेंद्र सिंह की हत्या करने का आरोप लगा था। घटना के वक्त मृतक अपने भाई संतोष सिंह (पीडब्ल्यू1), पीडब्ल्यू8, पीडब्ल्यू10, पीडब्ल्यू11, पीडब्ल्यू12 और पीडब्ल्यू18 के साथ अपने खलिहान के पास बैठे थे। तभी अजीत सिंह उर्फ बब्बे सिंह (ए1) अपने दो साथियों (ए8 और ए9) के साथ वहां पहुंचा और गाली-गलौज करते हुए धमकियां देने लगा। जब वे लोग चले गए, तो पीड़ित अपने साथियों के साथ घर की ओर लौटने लगे। घर के पास पहुंचते ही सत्रह लोगों ने उन्हें घेर लिया।
इस हमले के दौरान पीडब्ल्यू1 पर लाठी से वार किया गया, जिससे उनके सिर और बाईं आंख पर चोटें आईं। झगड़े की आवाज सुनकर 15 वर्षीय भतीजे ने घर जाकर शोर मचाया, जिसके बाद पीडब्ल्यू1 की पत्नी (पीडब्ल्यू2), पीडब्ल्यू8 की पत्नी (पीडब्ल्यू6) और मृतक की मां घटनास्थल पर पहुंचे। मां द्वारा रहम की गुहार लगाने के बावजूद ए1 ने वीरेंद्र सिंह को बेहद करीब से सीने पर गोली मार दी। बेटे की हत्या के तुरंत बाद गहरे सदमे या आत्महत्या के कारण मां की भी मौत हो गई।
कुल सत्रह आरोपियों में से तीन फरार थे, इसलिए उनका ट्रायल अलग कर दिया गया। ट्रायल कोर्ट ने चौदह आरोपियों पर मुकदमा चलाया और चार आरोपियों—ए1, ए6, ए12 और ए13 को आईपीसी की धारा 302 और 148 के तहत दोषी ठहराते हुए बाकी दस आरोपियों को बरी कर दिया। ए13 को ट्रायल के दौरान सीआरपीसी की धारा 319 के तहत तलब किया गया था।
इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने केवल गोली चलाने वाले मुख्य आरोपी ए1 की सजा बरकरार रखी और बाकी तीनों को बरी कर दिया। हाईकोर्ट का तर्क था कि बेहद करीब से गोली चलाए जाने की स्थिति में पीड़ित को पकड़ने वाले व्यक्ति को भी चोट लगनी चाहिए थी, इसलिए ए6 को संदेह का लाभ मिला। वहीं, रात के अंधेरे में ए12 की ललकार की पहचान पर संदेह जताया गया। ए13 के मामले में हाईकोर्ट ने माना कि सिर्फ दोनाली बंदूक लेकर मौजूद रहने और गोली न चलाने से धारा 34 या 149 के तहत साझा इरादा साबित नहीं होता। हाईकोर्ट के इस फैसले और अन्य आरोपियों के बरी होने के खिलाफ घायल शिकायतकर्ता (पीडब्ल्यू1) ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (घायल शिकायतकर्ता) की ओर से पेश सीनियर वकील ने दलील दी कि चश्मदीद गवाहों के बयान पूरी तरह सुसंगत और एक समान हैं। उन्होंने गैरकानूनी जमावड़े में ए6, ए12 और ए13 की मौजूदगी और उनकी विशिष्ट भूमिकाओं को साफ तौर पर साबित किया है। यह भी कहा गया कि मेडिकल साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान पूरी तरह मेल खाते हैं। वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 149 की व्याख्या में चूक की और गैरकानूनी जमावड़े का हिस्सा होने के बावजूद केवल किसी खास सक्रिय भूमिका के अभाव के आधार पर कई आरोपियों को गलत तरीके से बरी कर दिया।
दूसरी तरफ, आरोपियों की ओर से पेश बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि घटना के दिन पीडब्ल्यू1 की मौजूदगी ही संदिग्ध है क्योंकि उसकी हाजिरी रजिस्टर में उसे 8, 9 और 10 मार्च को ड्यूटी पर दर्ज दिखाया गया था। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि सभी मुख्य गवाह आपस में रिश्तेदार और हितबद्ध गवाह हैं, जबकि स्वतंत्र स्थानीय गवाह मुकर चुके हैं। इसके अलावा कोई हथियार बरामद नहीं हुआ और न ही कोई बैलिस्टिक या फॉरेंसिक जांच कराई गई। ए13 के संबंध में कहा गया कि शुरुआती गवाहियों में उसका नाम नहीं था और बाद में सीआरपीसी की धारा 319 के तहत उसे फंसाया गया, जबकि वह अपनी बेटी को परीक्षा दिलाने पिपरझर गया हुआ था। ए12 के लिए तर्क दिया गया कि रात के अंधेरे और अफरा-तफरी में किसी की आवाज पहचानना मुमकिन नहीं था।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने फैसले का विश्लेषण करते हुए मेडिकल और प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्यों पर विस्तार से विचार किया। कोर्ट ने पाया कि डॉक्टर (पीडब्ल्यू3) की गवाही से साफ साबित होता है कि मौत गोली लगने से ही हुई थी। पोस्टमार्टम में सीने के बाएं हिस्से में 20 सेमी गहरा घाव मिला, जो ऊपर से नीचे की दिशा में था। शरीर के भीतर से चौंतीस छर्रे, प्लास्टिक की डाट और पैकेजिंग सामग्री बरामद हुई थी। साथ ही, पीडब्ल्यू1 के शरीर पर लगी लाठी की चोटों की पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट (प्रदर्शित पी5) से हुई, जिससे घटना स्थल पर उनकी मौजूदगी निर्विवाद साबित हुई। पीडब्ल्यू1 की ड्यूटी हाजिरी पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की गैरहाजिरी में भी हाजिरी दर्ज करने की प्रथा भले ही अनुचित हो, लेकिन इससे पीडब्ल्यू1 की मौके पर मौजूदगी और चोटों को नकारा नहीं जा सकता।
देहाती मर्ग सूचना (प्रदर्शित पी1) और प्रथम सूचना बयान (प्रदर्शित पी2) में विसंगति के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घटना रात 8:00 बजे हुई थी और उसी रात 11:00 बजे नौडिहवा पुलिस चौकी पर पीडब्ल्यू1 ने सत्रह आरोपियों के नामों का विस्तृत विवरण दर्ज करा दिया था। इसलिए इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।
गवाहों की विश्वसनीयता पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यद्यपि पीडब्ल्यू2, पीडब्ल्यू6 और पीडब्ल्यू8 के बयानों में पूर्व में दिए गए बयानों की तुलना में कुछ सुधार थे, लेकिन पीडब्ल्यू1, पीडब्ल्यू10 और पीडब्ल्यू11 की गवाहियां पूरी तरह स्वाभाविक और विश्वसनीय थीं।
आरोपियों की व्यक्तिगत भूमिकाओं पर कोर्ट का निष्कर्ष:
- राजीव लोचन सिंह (ए13): सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क से असहमति जताई कि यदि कोई व्यक्ति हथियार लेकर मौजूद है और उसने गोली नहीं चलाई, तो उस पर धारा 34 या 149 लागू नहीं हो सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गैरकानूनी जमावड़े में हथियार सहित मौजूदगी ही संयुक्त दायित्व तय करने के लिए पर्याप्त हो सकती है। हालांकि, रिकॉर्ड देखने पर कोर्ट ने पाया कि चश्मदीद पीडब्ल्यू10 और पीडब्ल्यू11 ने घटना स्थल पर ए13 की मौजूदगी से साफ इनकार किया था। इसके अलावा प्राथमिक सूचना बयान में भी उसके बंदूक लेकर आने या धमकी देने का जिक्र नहीं था। गवाहों ने उसका नाम केवल धारा 319 के तहत तलब किए जाने के बाद लिया। इसलिए ठोस और पुख्ता सबूतों के अभाव में उसे बरी रखने का फैसला सही माना गया।
- नागेंद्र सिंह (ए6): हाईकोर्ट के इस अनुमान को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया कि नजदीक से गोली चलने पर पकड़ने वाले को भी चोट लगती। कोर्ट ने कहा कि यह महज एक अटकलबाजी है जिसका कोई फॉरेंसिक या मेडिकल आधार नहीं है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ था कि गोली और छर्रे सीने के अंदर ही धंस कर रह गए थे और शरीर के पार नहीं निकले थे। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की:
“इसलिए पीड़ित को पकड़कर रखने वाले व्यक्ति के घायल होने की कोई संभावना नहीं बनती।”
कोर्ट ने माना कि ए6 द्वारा पीड़ित को पकड़कर रखना या खींचना उसका साझा आपराधिक इरादा साफ दर्शाता है।
- दलप्रताप सिंह (ए12): कोर्ट ने पाया कि ए12 द्वारा गोली चलाने के लिए उकसाने और ललकारने की बात पहले बयान से लेकर अदालत की गवाही तक लगातार दर्ज है। अंधेरे के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि आसपास के घरों में बिजली थी और आरोपी व गवाह एक ही गांव के होने के कारण एक-दूसरे से भली-भांति परिचित थे, जिससे आवाज और चेहरे की पहचान पर कोई संदेह नहीं रह जाता।
पुरानी रंजिश के चलते अन्य लोगों को सामूहिक रूप से नामजद करने के पहलू पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“‘फाल्सस इन उनो, फाल्सस इन ओम्निबस’ (एक बात झूठी तो सब झूठा) का सिद्धांत भारत में लागू नहीं होता और जैसा कि स्थापित कानून है, यहां साक्ष्यों का विश्लेषण करते समय अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे भूसे में से अनाज को अलग करें।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़ित पक्ष ने पुरानी रंजिश के कारण कुछ ऐसे लोगों के नाम भी शामिल कर दिए जिनकी कोई विशिष्ट भूमिका साबित नहीं हुई, तो केवल इस आधार पर उन आरोपियों के खिलाफ दी गई सच्ची और विश्वसनीय गवाही को नकारा नहीं जा सकता जिनकी सक्रिय भूमिका पूरी तरह साबित है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने नागेंद्र सिंह (ए6) और दलप्रताप सिंह (ए12) को बरी करने का हाईकोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा उन्हें सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को पूर्ण रूप से बहाल कर दिया।
कोर्ट ने राजीव लोचन सिंह (ए13) और अन्य दस आरोपियों को बरी रखने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उनके खिलाफ दायर अपीलें खारिज कर दीं। मुख्य आरोपी ए1 के खिलाफ अपील को अनावश्यक मानते हुए निस्तारित किया गया क्योंकि उसकी सजा पहले ही पुष्ट हो चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने दोषी करार दिए गए नागेंद्र सिंह (ए6) और दलप्रताप सिंह (ए12) को अपनी शेष सजा काटने के लिए संबंधित सेशंस कोर्ट के समक्ष दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। ऐसा न करने पर सेशंस कोर्ट को उन्हें हिरासत में लेने के लिए उचित कानूनी कदम उठाने का आदेश दिया गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: संतोष सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य साथ में क्रिमिनल अपील संख्या 1306/2022
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1303-1305/2022 साथ में क्रिमिनल अपील संख्या 1306/2022
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 08 सितंबर 2026

