बायबैक एस्क्रो राशि जारी होने से पीएफयूटीपी नियमों के तहत कंपनी पर धोखाधड़ी की कार्रवाई करने से सेबी को नहीं रोका जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेबी (प्रतिभूतियों का बायबैक) विनियम, 1998 के नियम 15B(8) के तहत एस्क्रो जमा राशि जारी किए जाने से सेबी (प्रतिभूति बाजार से संबंधित धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार प्रथाओं का निषेध) विनियम, 2003 (पीएफयूटीपी विनियम) के तहत बाजार धोखाधड़ी की स्वतंत्र जांच या निष्कर्ष पर कोई रोक नहीं लगती। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने निर्णय दिया कि एस्क्रो जब्ती से जुड़ी जांच और धोखाधड़ी के निर्धारण का दायरा बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों में काम करता है। शीर्ष अदालत ने प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट) के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसने वेदांता लिमिटेड और उसके निदेशकों को आरोपमुक्त कर दिया था। इसके साथ ही कोर्ट ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए धोखाधड़ी के आरोपों पर नए सिरे से छह महीने के भीतर विचार करने के लिए मामला वापस सैट को भेज दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

26 नवंबर 2013 को प्रतिवादी कंपनी वेदांता लिमिटेड (पूर्व में केयर्न इंडिया लिमिटेड) ने 335 रुपये प्रति शेयर की अधिकतम सीमा (प्राइस कैप) पर 17.09 करोड़ इक्विटी शेयरों के ओपन मार्केट बायबैक के लिए एक विशेष प्रस्ताव पारित किया था। इसके लिए कंपनी ने कुल 5,725 करोड़ रुपये का बजट तय किया। इसके बाद कंपनी ने 14 जनवरी 2014 को बायबैक की सार्वजनिक घोषणा की। बायबैक ऑफर 23 जनवरी 2014 को खुला और 22 जुलाई 2014 को समाप्त हुआ। बायबैक नियमों के विनियमन 15B(5) का पालन करते हुए कंपनी ने अधिकतम बायबैक आकार का 2.5 प्रतिशत यानी 143.124 करोड़ रुपये एक्सिस बैंक में खोले गए एस्क्रो खाते में जमा कराया।

छह महीने की निर्धारित अवधि में से जब पांच महीने बीत गए, तो कंपनी ने 30 जून 2014 को सेबी को पत्र लिखकर बायबैक अवधि बढ़ाने की मांग की। कंपनी ने बताया कि वह 1,225 करोड़ रुपये खर्च करके केवल 3.6 करोड़ शेयर (लक्ष्य का 21.48 प्रतिशत) ही खरीद सकी है, जो कुल आवंटित राशि का 28.59 प्रतिशत था। सेबी ने इस अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि नियमों में बायबैक अवधि बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं है। बायबैक अवधि समाप्त होने के बाद, कंपनी ने सेबी को सूचित किया कि वह विनियमन 14(3) के तहत आवश्यक 50 प्रतिशत न्यूनतम राशि खर्च करने का लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी है। साथ ही, कंपनी ने नियम 15B(8) के तहत अपनी एस्क्रो राशि वापस जारी करने का आवेदन किया।

सेबी के जांच विभाग (आईवीडी) ने शुरुआत में पाया कि कंपनी एस्क्रो जब्ती से छूट की पात्र है और उसने राशि जारी करने की सिफारिश कर दी। हालांकि, पीएफयूटीपी नियमों के संदिग्ध उल्लंघन की समानांतर जांच जारी रही। इसके बाद सेबी के एडजुडिकेटिंग ऑफिसर (एओ) ने 19 मई 2021 को आदेश पारित करते हुए कंपनी और उसके निदेशकों को बिना वास्तविक मंशा के भ्रामक बायबैक घोषणा करने का दोषी पाया। एओ ने वेदांता लिमिटेड पर 5.25 करोड़ रुपये और तीन निदेशकों पर 15-15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

प्रतिवादियों की अपील पर सैट ने 5 अक्टूबर 2023 को एओ के जुर्माने के आदेश को रद्द कर दिया। सैट का मानना था कि शेयर बाजार में तेजी के रुख के कारण शेयर का भाव अधिकतर समय 335 रुपये से ऊपर रहा, 1,225 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च करना कोई दिखावा नहीं था और सेबी द्वारा एस्क्रो राशि जारी करना यह साबित करता है कि कंपनी की कोई कपटपूर्ण मंशा नहीं थी। इसके खिलाफ सेबी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

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पक्षों की दलीलें

सेबी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नवीन पाहवा ने दलील दी कि कुल 123 कारोबारी दिनों में से नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) पर 54 ऐसे अनुकूल दिन थे, जब शेयर की कीमत तय सीमा 335 रुपये या उससे कम थी। इन अनुकूल दिनों में बिक्री के लिए 67 करोड़ से अधिक शेयर उपलब्ध थे, लेकिन कंपनी ने उपलब्ध शेयरों का केवल 5 प्रतिशत ही खरीदा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि लिमिट ऑर्डर लगाने की सुविधा होने के बावजूद कंपनी ने 54 अनुकूल दिनों में से 24 दिनों तक एनएसई पर एक भी खरीद ऑर्डर दर्ज नहीं कराया। उन्होंने कहा कि सैट ने एस्क्रो राशि जारी होने को गलत तरीके से पीएफयूटीपी नियमों के तहत क्लीन चिट मान लिया, जबकि कंपनी की भ्रामक घोषणा ने बाजार के निवेशकों को प्रभावित किया और कृत्रिम ट्रेडिंग वॉल्यूम तैयार किया।

इसके विपरीत, प्रतिवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शकधर ने दलील दी कि कंपनी की मंशा पूरी तरह वैध थी क्योंकि उसने 1,225 करोड़ रुपये से अधिक की भारी राशि खर्च की और पंजीकृत मर्चेंट बैंकर्स नियुक्त किए थे। उन्होंने बताया कि 123 में से 65 दिनों तक वॉल्यूम वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस (वीडब्ल्यूएएमपी) 335 रुपये के पार रहा, जिसके चलते खरीद संभव नहीं थी। प्रतिवादियों ने यह भी तर्क दिया कि सेबी के विधिक कार्य प्रभाग (एलएडी) की आंतरिक फाइल नोटिंग में भी माना गया था कि इन्हीं तथ्यों पर पीएफयूटीपी के तहत धोखाधड़ी का मामला चलाना कानूनी रूप से कठिन होगा। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने दलील दी कि एओ ने जिस ट्रेडिंग डेटा के आधार पर निष्कर्ष निकाला, उसमें भारी विसंगतियां मौजूद हैं।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने बायबैक विनियमों के नियम 14(3) और 15B(8) के आपसी संबंध तथा पीएफयूटीपी ढांचे का विस्तार से विश्लेषण किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि नियम 15B(8) केवल एस्क्रो जब्ती से छूट के आधार तय करता है—जैसे औसत बाजार मूल्य अधिक होना, पर्याप्त बिक्री ऑर्डर न होना या कंपनी के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियां—लेकिन यह नियम धोखाधड़ी के अस्तित्व को परिभाषित या निर्धारित नहीं करता।

एस्क्रो जारी होने को धोखाधड़ी के मामलों से वैधानिक छूट मानने के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“केवल इसलिए कि एस्क्रो राशि की जब्ती या उसे जारी करने की शर्तें पूरी हो गई हैं, अपने आप में यह निष्कर्ष नहीं माना जा सकता कि पीएफयूटीपी नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं।”

पीठ ने आगे निर्णय दिया:

“इस प्रकार, केवल एस्क्रो राशि का जारी होना पीएफयूटीपी नियमों के तहत कार्यवाही पर कोई स्वतः वैधानिक रोक नहीं लगाता, क्योंकि एस्क्रो का जारी होना आवश्यक रूप से धोखाधड़ी की अनुपस्थिति के समान नहीं है।”

कोर्ट ने सेबी के लीगल डिवीजन की आंतरिक फाइल नोटिंग पर प्रतिवादियों की निर्भरता को भी खारिज कर दिया। अदालत ने मेसर्स सेठी ऑटो सर्विस स्टेशन बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण के नजीर का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय नोटिंग किसी अधिकारी की आंतरिक राय मात्र होती है और जब तक वह अंतिम आदेश के रूप में संसूचित न हो, उसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं होता।

प्रतिभूति धोखाधड़ी से जुड़े पूर्व निर्णयों की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित मामलों पर चर्चा की:

  • केएसएल इंडस्ट्रीज बनाम द चेयरमैन, सेबी: इसमें माना गया था कि धोखाधड़ी के आरोप केवल अनुमानों और अटकलों पर नहीं टिक सकते; इसके लिए ठोस साक्ष्यों के जरिए वास्तविक संबंध साबित होना जरूरी है।
  • सेबी बनाम एमओएच लिमिटेड: इस मामले में स्पष्ट हुआ था कि बिना पर्याप्त वित्तीय संसाधनों के भ्रामक बायबैक घोषणा करना और फिर प्रमोटरों द्वारा शेयर बेचना धोखाधड़ी की सोची-समझी योजना को दर्शाता है।
  • सेबी बनाम किशोर आर. अजमेरा: कोर्ट ने निर्धारित किया था कि बाजार में हेरफेर जैसे दीवानी आरोपों को परिस्थितियों के समग्र मूल्यांकन और संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर तार्किक निष्कर्ष निकालकर तय किया जा सकता है।
  • सेबी बनाम कन्हैयालाल बलदेवभाई पटेल: इसमें कोर्ट ने माना कि गोपनीय जानकारी के आधार पर फ्रंट-रनिंग करना पीएफयूटीपी के तहत कपटपूर्ण आचरण की श्रेणी में आता है।
  • डेक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स लिमिटेड बनाम सेबी: इसमें पुष्टि की गई कि पर्याप्त फ्री रिजर्व न होने के बावजूद बायबैक की घोषणा करना निवेशकों को गुमराह करना है और यह धोखाधड़ी है।
  • सेबी बनाम टेरास्कोप वेंचर्स लिमिटेड: कोर्ट ने माना था कि जिस उद्देश्य के लिए धन जुटाया गया था, उसके तुरंत बाद उसे किसी अन्य काम में लगाना शुरुआत से ही हेरफेर की मंशा को साबित करता है।
  • रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम सेबी (जस्टिस पारदीवाला द्वारा लिखित): इसमें स्पष्ट किया गया था कि जहां विनियामक प्राधिकरण तीसरे पक्षों को प्रेरित किए जाने का सीधा प्रमाण नहीं दे पाता, वहां अपनाई गई युक्ति ऐसी होनी चाहिए जिसका “धोखाधड़ी के अलावा कोई अन्य स्पष्टीकरण नहीं” हो सके। ऐसे मामलों में साक्ष्य का स्तर और अधिक पुख्ता होना चाहिए।
  • अलुप्रो बिल्डिंग सिस्टम्स (पी) लिमिटेड बनाम सीसीई (जस्टिस पारदीवाला द्वारा लिखित): इसमें पुष्टि की गई कि संभावना की डिग्री विषय वस्तु के अनुपात में होनी चाहिए।
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इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने माना कि सैट ने एस्क्रो जांच के निष्कर्षों पर निर्भर रहकर पीएफयूटीपी के आरोपों को खारिज करने में गंभीर भूल की। हालांकि, इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एओ द्वारा इस्तेमाल किए गए ट्रेडिंग डेटा में गंभीर विरोधाभास हैं। उदाहरण के लिए, 17 फरवरी 2014 को सेबी की जांच रिपोर्ट में एनएसई पर 335 रुपये या उससे कम पर 1.31 करोड़ से अधिक शेयर उपलब्ध बताए गए थे, जबकि खुद एनएसई के आधिकारिक पत्र के अनुसार उस दिन यह संख्या केवल 30 लाख शेयर थी। इसी तरह 14 फरवरी 2014 के डेटा और मई-जुलाई 2014 के बीएसई रिकॉर्ड में भी विरोधाभास पाए गए। इसके अतिरिक्त, सेबी की फरवरी 2016 की रिपोर्ट में घोषणा से बाजार पर कोई असर न पड़ने की बात कही गई थी, जबकि मार्च 2017 की रिपोर्ट में धोखाधड़ी का आरोप लगा दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवादित तथ्यों को सुलझाना अपीलीय अदालत का काम नहीं है:

“हमारे विचार में, यह तथ्य का एक विवादित प्रश्न है जो धोखाधड़ी के निष्कर्ष की मूल जड़ तक जाता है। सेबी अधिनियम की धारा 15Z के तहत क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए यह कोर्ट ऐसे समाधान के लिए उपयुक्त मंच नहीं है।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सेबी की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और धोखाधड़ी के सवाल पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मामला वापस सैट को भेज दिया।

शीर्ष अदालत ने सैट को चार विशिष्ट निर्देश दिए:

  1. सैट 10 दिसंबर 2014 के एनएसई पत्र सहित दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए ऐतिहासिक ट्रेडिंग डेटा की गहन जांच करे और यह तय करे कि बिक्री ऑर्डर और कीमतों की वास्तविक स्थिति क्या थी, तथा विसंगतियों पर स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज करे।
  2. सैट आवश्यकता पड़ने पर सेबी अधिनियम की धारा 15U(2) के तहत दीवानी अदालत की शक्तियों का उपयोग करे; वह कंपनी के अधिकारियों और मर्चेंट बैंकरों को समन भेजकर शपथ पर उनका परीक्षण कर सकता है तथा प्रासंगिक दस्तावेज मंगा सकता है।
  3. सैट यह जांचे कि क्या ऐतिहासिक ट्रेडिंग डेटा के अलावा रिकॉर्ड पर ऐसी कोई अन्य पुष्टिकारक परिस्थितियां मौजूद हैं, जो धोखाधड़ी की मंशा का संकेत देती हों।
  4. सैट इस निर्णय में कानूनी सिद्धांतों के अलावा मामले के गुण-दोष पर की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना पीएफयूटीपी के तहत स्वतंत्र निष्कर्ष दे और इस मामले का छह महीने के भीतर तेजी से निपटारा करे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड बनाम वेदांता लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 25-26/2024
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
निर्णय की तिथि: 9 सितंबर, 2026

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