एनसीईआरटी कक्षा 8 विवाद: न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाले अध्याय के हटने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बंद की सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े विवादित अध्याय को हटाने के बाद इस मामले में स्वतः संज्ञान से शुरू की गई कार्यवाही को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की पीठ ने 1 सितंबर को यह आदेश दिया, जिसे बाद में सार्वजनिक किया गया। पीठ ने दर्ज किया कि केंद्र सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के अनुरूप आपत्तिजनक सामग्री को हटाकर उसकी जगह नया पाठ शामिल कर दिया गया है।

आलोचना से ऐतराज नहीं, लेकिन बिना सत्यापन पाठ्यक्रम में जगह स्वीकार्य नहीं

अदालत ने संस्थागत आलोचना की सीमा और उसकी आवश्यकता पर विस्तृत रुख स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि न्यायपालिका एक संस्था के तौर पर आलोचना के खिलाफ न तो है और न ही हो सकती है। अदालत के अनुसार, न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, तथ्यपरक और रचनात्मक आलोचना एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र का वैध और अनिवार्य अंग है, जिससे संस्थागत जवाबदेही तय होती है और आत्म-सुधार को गति मिलती है।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि असली फर्क आलोचना और चुप्पी के बीच नहीं, बल्कि जिम्मेदार विमर्श और बिना सोचे-समझे किए गए दावों के बीच है। अदालत ने रेखांकित किया कि आलोचना को हमेशा उचित मंच और तार्किक प्रक्रिया के जरिए ही उठाया जाना चाहिए। ऐसी सामग्री बिना किसी ठोस सत्यापन के स्कूली पाठ्यक्रम में नहीं पहुंचाई जा सकती, क्योंकि इसका सीधा असर कोमल और सीखने की उम्र वाले बच्चों के मस्तिष्क पर पड़ता है।

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तीन शिक्षाविदों को राहत, पुरानी प्रतिकूल टिप्पणियां वापस

शीर्ष अदालत ने विवादित सामग्री तैयार करने वाले तीन शिक्षाविदों—प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार—को लेकर अपने पहले के कड़े रुख में भी ढील दी।

इससे पहले 11 मार्च को अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को इन तीनों विशेषज्ञों से अपने संबंध समाप्त करने का निर्देश दिया था। उस आदेश में पीठ ने दर्ज किया था कि इन शिक्षाविदों ने कक्षा 8 के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की छवि खराब करने के इरादे से जानबूझकर तथ्यों को गलत ढंग से पेश किया।

इसके बाद तीनों शिक्षाविदों ने एक साझा अर्जी दाखिल कर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने अदालत को बताया कि पाठ्यक्रम तैयार करने का काम किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं था, बल्कि यह एक सामूहिक प्रक्रिया थी।

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अदालत ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार करते हुए “जानबूझकर भ्रामक तथ्य पेश करने” संबंधी अपनी प्रतिकूल टिप्पणी वापस ले ली। पीठ ने साफ किया कि उसकी पहले की टिप्पणियां पाठ्यपुस्तक की सामग्री को लेकर थीं, न कि उन व्यक्तियों के संदर्भ में। अदालत ने 11 मार्च के आदेश को संशोधित करते हुए केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सरकारी विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक वित्तपोषित संस्थानों को छूट दी कि वे अदालत की पुरानी टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना इन तीनों शिक्षाविदों के साथ भविष्य के सहयोग पर स्वतंत्र रूप से फैसला ले सकते हैं।

किताब पर पूर्ण प्रतिबंध से पाठ्यक्रम समीक्षा तक का घटनाक्रम

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इस पूरे विवाद पर न्यायिक हस्तक्षेप की शुरुआत 26 फरवरी को हुई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की इस सामाजिक विज्ञान पुस्तक के मुद्रण, पुनर्मुद्रण और डिजिटल वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय पीठ ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा था कि इस सामग्री के जरिए न्यायपालिका पर गोली चलाई गई है और संस्था लहूलुहान हो रही है।

इसके बाद 11 मार्च की सुनवाई में अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह एक सप्ताह के भीतर विषय विशेषज्ञों की एक समिति का गठन करे। इस समिति को न केवल कक्षा 8 बल्कि उच्चतर कक्षाओं के लिए भी एनसीईआरटी के लीगल स्टडीज के पाठ्यक्रम की समीक्षा करने और उसे अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

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