कर्नाटक हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के विरोध में पोस्टर लगाने वाले 13 लोगों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक फैसले से असहमति जताना और न्याय की मांग करना संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने या धार्मिक भावनाएं आहत करने का आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता।
जस्टिस एच.पी. संदेश ने 15 अक्टूबर 2026 को दिए आदेश में कहा कि संबंधित पोस्टरों में केवल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर असंतोष जताया गया था और न्याय की मांग की गई थी। इनमें ऐसी कोई बात नहीं थी जिससे यह साबित हो कि आरोपियों का उद्देश्य समाज में वैमनस्य या अशांति फैलाना था।
हाईकोर्ट ने माना कि इस तरह की असहमति संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संरक्षित है। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153ए और 295ए के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई औचित्य नहीं पाया।
केवल असहमति जताने से नहीं बनता आपराधिक मामला
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पोस्टरों में लिखे नारों और पुलिस की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच की।
कोर्ट ने पाया कि पोस्टरों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को न्याय से वंचित करने वाला बताया गया था और न्याय के लिए आवाज उठाने की अपील की गई थी। हालांकि, इन शब्दों से आईपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत अपराध के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते।
जस्टिस संदेश ने स्पष्ट किया कि किसी फैसले से असंतोष व्यक्त करने को अपने आप में समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास नहीं माना जा सकता।
धारा 153ए के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत अपराध साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद होने चाहिए। केवल यह संभावना कि किसी बयान से कुछ लोगों के मन में नफरत या दुर्भावना पैदा हो सकती है, धारा 153ए(1)(ए) लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि संबंधित पोस्टर न्याय की मांग और फैसले से असहमति व्यक्त करने तक सीमित थे। इसलिए इनके आधार पर आपराधिक मुकदमा जारी रखना उचित नहीं होगा।
अयोध्या फैसले के बाद दर्ज हुआ था मामला
यह मामला 16 नवंबर 2019 का है, जब मंगलुरु साउथ पुलिस ने मोहम्मद हनीफ सहित 13 लोगों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर आपराधिक मामला दर्ज किया था।
पुलिस का आरोप था कि इन लोगों ने मंगलुरु में ऐसे पोस्टर लगाए थे, जिनमें बाबरी मस्जिद-अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को न्याय से वंचित करने वाला बताया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इन पोस्टरों से देश में सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द प्रभावित हुआ। इसी आधार पर आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत मामला दर्ज किया गया था।
गौरतलब है कि नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पूरी विवादित भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए गठित किए जाने वाले ट्रस्ट को सौंपने का निर्देश दिया था। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में उपयुक्त स्थान पर पांच एकड़ जमीन देने का भी निर्देश दिया था।
याचिकाकर्ताओं ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दिया हवाला
आरोपियों की ओर से पेश एडवोकेट इस्माइल मुनीब मुस्बा ने हाईकोर्ट में दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है।
उन्होंने कहा कि किसी न्यायिक फैसले से असहमति जताना या उसके खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना राजद्रोह नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले जावेद अहमद हाजम बनाम महाराष्ट्र राज्य का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार पर विचार किया था।
एडवोकेट मुस्बा ने दलील दी कि किसी बयान या नारे को आपराधिक श्रेणी में रखने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसका बड़ी संख्या में सामान्य और विवेकशील लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि केवल कुछ व्यक्तियों की नकारात्मक प्रतिक्रिया के आधार पर किसी अभिव्यक्ति को अपराध नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि लोकतंत्र में नागरिकों को सरकारी फैसलों से असहमति जताने और कानूनी तरीके से विरोध करने का अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 21 के तहत संरक्षित है।
हाईकोर्ट ने सभी 13 आरोपियों को राहत दी
दोनों पक्षों की दलीलों और मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पोस्टरों में इस्तेमाल किए गए शब्द केवल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर असहमति और न्याय की मांग को दर्शाते हैं।
जस्टिस संदेश ने कहा कि इन नारों में ऐसा कोई तत्व नहीं है जिससे आईपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत अपराध बनता हो।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल न्यायिक फैसले की आलोचना करने या उससे असंतोष जताने के कारण किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जब तक उसके खिलाफ संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद न हों।
कोर्ट ने माना कि यह मामला आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए उपयुक्त है।
इसके साथ ही कर्नाटक हाईकोर्ट ने मोहम्मद हनीफ सहित सभी 13 आरोपियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
