बच्ची के निजी अंग पर लिंग रखना केवल छूना नहीं, POCSO के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न का अपराध: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने तीन साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बच्ची का अंतःवस्त्र हटाकर उसके योनि क्षेत्र पर लिंग रखना, जिससे उसे दर्द हुआ और वह रोने लगी, केवल छूने की घटना नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा कृत्य पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 3 के तहत प्रवेश सहित यौन हमला (Penetrative Sexual Assault) की श्रेणी में आता है, न कि धारा 7 के तहत केवल यौन उत्पीड़न की।

जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने 13 अक्टूबर 2026 को आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी अपील आंशिक रूप से स्वीकार की। हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत सुनाई गई सजा को बरकरार रखा, लेकिन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376AB के तहत दी गई अलग सजा को पॉक्सो एक्ट की धारा 42 के आधार पर रद्द कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के बयान, घटना के दौरान उसे हुए दर्द और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी के कृत्य को केवल छूने तक सीमित नहीं माना जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 2 सितंबर 2021 को दोपहर करीब दो बजे आरोपी ने अपने पड़ोस में रहने वाली तीन साल की बच्ची के साथ गंभीर यौन उत्पीड़न किया।

मामले की सुनवाई के बाद नॉर्थ परावुर की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 376AB और पॉक्सो एक्ट की धारा 3(a) के साथ धारा 4(2) तथा धारा 5(m) के साथ धारा 6 के तहत दोषी ठहराया।

स्पेशल कोर्ट ने आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 4(2), धारा 6 और आईपीसी की धारा 376AB के तहत प्रत्येक अपराध के लिए 20 साल के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी।

सभी सजाएं एक साथ चलनी थीं।

आरोपी ने इस दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए केरल हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।

आरोपी की दलील: केवल छूने से प्रवेश सहित यौन हमला साबित नहीं होता

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से एडवोकेट सफना पी.एस. ने दलील दी कि मामले में एकमात्र प्रत्यक्ष साक्ष्य पीड़िता का बयान था।

उन्होंने कहा कि बच्ची ने अपने बयान में केवल इतना बताया था कि आरोपी ने अपना लिंग उसके निजी अंग पर रखा था।

बचाव पक्ष के अनुसार, केवल लिंग रखने को शरीर के भीतर प्रवेश करना नहीं माना जा सकता। इसलिए यह कृत्य अधिक से अधिक पॉक्सो एक्ट की धारा 7 के तहत यौन उत्पीड़न का अपराध हो सकता है।

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बचाव पक्ष ने कहा कि धारा 7 के अपराध के लिए धारा 8 के तहत अधिकतम पांच साल की सजा का प्रावधान है।

यह दलील भी दी गई कि मेडिकल जांच में बच्ची के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं मिली थी।

आरोपी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के लक्ष्मण जांगड़े बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के कुट्टप्पन उर्फ बाबुकुट्टन बनाम केरल राज्य मामलों के फैसलों का हवाला दिया गया।

अभियोजन पक्ष ने कहा: बच्ची को दर्द हुआ और वह रोने लगी

राज्य की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एम.ए. शिहाब ने आरोपी की दलीलों का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि पीड़िता ने स्पष्ट रूप से बताया था कि आरोपी के कृत्य से उसे दर्द हुआ और वह रोने लगी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, योनि के बाहरी हिस्से पर मामूली स्तर का प्रवेश भी कानून के तहत प्रवेश सहित यौन हमला माना जा सकता है।

उन्होंने कहा कि योनि के बाहरी होंठों (Labia Majora) या बाहरी जननांग क्षेत्र (Vulva) में मामूली स्तर का प्रवेश भी पॉक्सो एक्ट के तहत आवश्यक कानूनी शर्त को पूरा करता है।

अपने पक्ष में उन्होंने रवींद्रन वी.एस. बनाम पुलिस उपाधीक्षक और सुप्रीम कोर्ट के नवाबुद्दीन बनाम उत्तराखंड राज्य मामलों के फैसलों का उल्लेख किया।

बच्ची के बयान और मेडिकल साक्ष्य पर हाईकोर्ट ने किया विचार

हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता का बयान उस समय दर्ज किया गया था, जब उसकी उम्र पांच साल थी।

बयान दर्ज करने से पहले कोर्ट ने यह जांच की थी कि बच्ची सवालों को समझने और उनके सही जवाब देने में सक्षम है या नहीं।

इस प्रारंभिक जांच के बाद उसका बयान दर्ज किया गया।

पीड़िता ने बताया कि आरोपी ने उसका अंतःवस्त्र हटाया और अपना लिंग उसके निजी अंग पर रखा। इसके बाद उसे दर्द हुआ और वह रोने लगी।

हाईकोर्ट ने पाया कि जिरह के दौरान भी बच्ची अपने बयान पर कायम रही।

घटना वाले दिन शाम को बच्ची की मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर ने पाया था कि उसका योनि क्षेत्र अपेक्षाकृत खुला हुआ था।

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डॉक्टर ने यह भी राय दी थी कि मेडिकल जांच में मिले निष्कर्ष यौन उत्पीड़न की बताई गई घटना से असंगत नहीं थे।

कोर्ट ने इन साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना।

सिर्फ छूने और लिंग रखे जाने में अंतर: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की ओर से दिए गए फैसलों का परीक्षण करते हुए कहा कि वर्तमान मामले की परिस्थितियां उनसे अलग हैं।

कोर्ट ने पाया कि लक्ष्मण जांगड़े मामले में पीड़िता के बयानों से केवल छूने की घटना सामने आई थी।

इसी तरह कुट्टप्पन मामले में पीड़िता ने बताया था कि आरोपी ने प्रवेश कराने की कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

जस्टिस बदरुद्दीन ने कहा कि वर्तमान मामले में बच्ची ने स्पष्ट रूप से बताया था कि आरोपी ने उसका अंतःवस्त्र हटाकर उसके निजी अंग पर लिंग रखा था, जिससे उसे दर्द हुआ।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“वास्तव में किसी अंग को रखे जाने और केवल छूने का अर्थ एक समान नहीं है। किसी को छूने की क्रिया बहुत कम समय की हो सकती है, जबकि किसी अंग को रखे जाने की क्रिया केवल छूने से अधिक समय तक बनी रह सकती है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि इस अंतर को नजरअंदाज करके आरोपी के कृत्य को केवल छूने की घटना नहीं माना जा सकता।

बेंच ने स्पष्ट किया,

“ऐसी स्थिति में इस कृत्य को इतना हल्का मानकर नहीं देखा जा सकता कि इसे पॉक्सो एक्ट की धारा 7 के तहत परिभाषित केवल ‘छूने’ का मामला मान लिया जाए।”

मामूली प्रवेश भी पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत अपराध

हाईकोर्ट ने कहा कि मामले के साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि आरोपी के कृत्य में या तो मामूली स्तर का प्रवेश हुआ था या योनि क्षेत्र में प्रवेश कराने के उद्देश्य से ऐसी क्रिया की गई थी, जो बच्ची को दर्द होने या उसकी बहुत कम उम्र के कारण पूरी नहीं हो सकी।

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की उम्र, उसका बयान और घटना के दौरान उसे हुआ दर्द महत्वपूर्ण परिस्थितियां हैं।

जस्टिस बदरुद्दीन ने निष्कर्ष दिया,

“तीन साल की नाबालिग पीड़िता का अंतःवस्त्र हटाकर उसके योनि क्षेत्र पर लिंग रखना, जिससे उसे दर्द हुआ और वह रोने लगी, मामूली स्तर के प्रवेश अथवा प्रवेश कराने के उद्देश्य से योनि क्षेत्र में की गई क्रिया के अलावा कुछ नहीं है। यह पॉक्सो एक्ट की धारा 3(a) से 3(d) के तहत परिभाषित अपराध की श्रेणी में आता है।”

इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी की उस दलील को खारिज कर दिया कि उसका कृत्य केवल पॉक्सो एक्ट की धारा 7 के तहत दंडनीय था।

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एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सजा देने पर हाईकोर्ट ने उठाया सवाल

दोषसिद्धि बरकरार रखने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी को सुनाई गई सजा के कानूनी पहलू पर विचार किया।

कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत न्यूनतम 20 साल के कारावास का प्रावधान है।

हाईकोर्ट ने पाया कि स्पेशल कोर्ट ने सजा सुनाते समय पॉक्सो एक्ट की धारा 42 के प्रावधान पर उचित ध्यान नहीं दिया था।

धारा 42 के अनुसार, जब कोई कृत्य पॉक्सो एक्ट और किसी अन्य कानून के तहत भी दंडनीय हो, तो उस कानून के तहत सजा दी जानी चाहिए जिसमें अधिक कठोर दंड का प्रावधान है।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत सजा सुनाए जाने के बाद आईपीसी की धारा 376AB के तहत अलग से सजा देने का कोई कारण नहीं था।

इसलिए हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 376AB के तहत सुनाई गई अलग सजा को रद्द कर दिया।

दोषसिद्धि बरकरार, आरोपी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार

केरल हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

हालांकि, आईपीसी की धारा 376AB के तहत सुनाई गई अलग सजा रद्द कर दी गई, जबकि अन्य अपराधों के लिए सुनाई गई सजाएं बरकरार रखी गईं।

हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी पहले से अपनी सजा काट रहा है। इसलिए इस संबंध में कोई अतिरिक्त आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं है।

केस डिटेल्स

  • केस टाइटल: शाजी बनाम केरल राज्य
  • केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या 1265/2023
  • बेंच: जस्टिस ए. बदरुद्दीन
  • फैसले की तारीख: 13 अक्टूबर 2026

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