अस्पताल पहुंचाने के तरीके में मामूली विरोधाभास से मृत्यु पूर्व बयान अविश्वसनीय नहीं हो जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा बरकरार रखी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में भूमि विवाद के चलते हुई हत्या के मामले में 1989 से लंबित आपराधिक अपील खारिज करते हुए आरोपी की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर और मृत्यु पूर्व बयान (Dying Declaration) में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाए जाने के तरीके को लेकर मामूली अंतर होने से मृत्यु पूर्व बयान की विश्वसनीयता प्रभावित नहीं होती, जब सभी बयानों में हमलावर की पहचान एक जैसी हो।

जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की डिवीजन बेंच ने 16 अक्टूबर 2026 को कृष्ण कुमार उर्फ कुंभ करण की अपील खारिज करते हुए बरेली के नौवें अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा 31 जुलाई 1989 को आईपीसी की धारा 302 के तहत सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।

भूमि विवाद में गुप्ती से हमला करने का मामला

अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक भीम सिंह और आरोपी के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा था।

24 फरवरी 1987 की रात करीब 11:15 बजे जब भीम सिंह बरेली के नेकपुर, मढ़ीनाथ स्थित अपने घर पहुंचे, तो सह-आरोपियों ने उन्हें पकड़ लिया और कृष्ण कुमार को हमला करने के लिए उकसाया। इसके बाद आरोपी ने भीम सिंह के पेट में गुप्ती से वार किया।

घायल भीम सिंह पुलिस स्टेशन पहुंचे और एफआईआर दर्ज कराई। बाद में बरेली के जिला अस्पताल में कार्यकारी मजिस्ट्रेट लीलाधर नैनवाल ने उनका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किया। इससे पहले डॉक्टर ने उन्हें बयान देने के लिए सक्षम प्रमाणित किया था।

25 फरवरी 1987 की सुबह 7:45 बजे भीम सिंह की मृत्यु हो गई।

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ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और ₹100 जुर्माने की सजा सुनाई थी।

बचाव पक्ष ने मृत्यु पूर्व बयान में विरोधाभास का मुद्दा उठाया

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से न्यायमित्र (Amicus Curiae) एडवोकेट सिकंदर बी. कोचर ने दलील दी कि एफआईआर के अनुसार घायल व्यक्ति रिक्शे से पुलिस स्टेशन पहुंचा था, जबकि मृत्यु पूर्व बयान में कहा गया कि एक ट्रैफिक कांस्टेबल उसे अस्पताल लेकर आया था।

वहीं, अस्पताल के बेड-हेड टिकट में एक नामित कांस्टेबल द्वारा घायल को अस्पताल लाए जाने का उल्लेख था।

बचाव पक्ष ने कहा कि इन विरोधाभासों के कारण मृत्यु पूर्व बयान विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

यह भी दलील दी गई कि दूसरा प्रत्यक्षदर्शी गवाह अपने बयान से मुकर गया था, जबकि शेष एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी का बयान तीन दिन की देरी से दर्ज हुआ। इसके अलावा हत्या में इस्तेमाल हथियार बरामद नहीं किया गया था।

आरोपी ने यह भी दावा किया कि अपने पिता का बचाव करने के दौरान हुई हाथापाई में दुर्घटनावश चोट लगी थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इस दलील की अनदेखी की।

राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने कहा कि सभी बयानों में जानलेवा वार करने वाले व्यक्ति के रूप में आरोपी का नाम लगातार सामने आया है। घायल व्यक्ति को लाने-ले जाने के साधन में अंतर घटना का मामूली विवरण है।

मृत्यु पूर्व बयान के मुख्य तथ्यों में कोई विरोधाभास नहीं: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अभिषेक शर्मा बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) मामले में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक से अधिक मृत्यु पूर्व बयानों में केवल महत्वपूर्ण विरोधाभास ही उनकी विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं।

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बेंच ने कहा,

“सभी बयानों में अभियोजन पक्ष के मामले का मूल आधार, अर्थात अपीलकर्ता कृष्ण कुमार उर्फ कुंभ करण द्वारा मृतक भीम सिंह के पेट में खंजर/गुप्ती से घातक वार करना, अपरिवर्तित बना हुआ है।”

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की,

“लाने-ले जाने के साधन के संबंध में मामूली अंतर से इस लगातार एक समान कथन की विश्वसनीयता समाप्त नहीं होती कि घातक हमला अपीलकर्ता ने किया था।”

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि मृत्यु पूर्व बयान दर्ज करने से पहले और बाद में डॉक्टर ने घायल व्यक्ति के बयान देने के लिए सक्षम होने की पुष्टि की थी।

बेंच ने कहा,

“अभियोजन पक्ष के गवाह संख्या 3 और 7 के बयानों को एक साथ और सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ने से स्पष्ट होता है कि मृत्यु पूर्व बयान कड़ी चिकित्सकीय निगरानी में दर्ज किया गया था और उसमें किसी प्रकार की सिखाई-पढ़ाई या मनगढ़ंत बात नहीं थी।”

प्रत्यक्षदर्शी और मेडिकल साक्ष्यों से हुई पुष्टि

हाईकोर्ट ने पाया कि प्रत्यक्षदर्शी सोहन लाल की गवाही से भी मृत्यु पूर्व बयान की पुष्टि होती है। उसने बिजली की रोशनी में आरोपी की पहचान की थी।

कोर्ट ने मृतक के बाएं हाथ पर धारदार हथियार से लगे चार घावों का भी उल्लेख किया और उन्हें हमले से बचने के प्रयास में लगी चोटें माना।

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बेंच ने कहा,

“यह भौतिक साक्ष्य दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत बचाव पक्ष की इस दलील को गलत साबित करता है कि हथियार को लेकर हुई हाथापाई के दौरान दुर्घटनावश चोट लगी थी।”

प्रत्यक्षदर्शी का बयान तीन दिन बाद दर्ज होने के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी बदले जाने के कारण हुई इस देरी का स्पष्टीकरण मौजूद था।

इस मुद्दे पर कोर्ट ने गौतम जोरदार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, सुनील कुमार बनाम राजस्थान राज्य और वी.के. मिश्रा बनाम उत्तराखंड राज्य के फैसलों का उल्लेख किया।

आपराधिक अपील खारिज, आत्मसमर्पण करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए हत्या के मामले में दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी। कोर्ट ने आरोपी को शेष सजा काटने के लिए आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

बेंच ने गलत तरीके से इस मामले के साथ जोड़ी गई सरकारी अपील संख्या 1392/1989 को अलग करके उचित बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने का भी निर्देश दिया।

इसके अलावा कोर्ट ने न्यायमित्र एडवोकेट सिकंदर बी. कोचर की सहायता की सराहना करते हुए विधिक सेवा प्राधिकरण को उन्हें ₹30,000 का कानूनी सहायता शुल्क देने का निर्देश दिया।

केस डिटेल्स

  • केस टाइटल: कृष्ण कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या 1697/1989
  • बेंच: जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
  • फैसले की तारीख: 16 अक्टूबर 2026

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