मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने राज्य सरकार की ओर से रिट अपील दाखिल करने में हुई 213 दिन की देरी माफ करने से इनकार करते हुए कहा है कि राज्य को विशेषाधिकार प्राप्त वादी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले की फाइल विभिन्न अधिकारियों और विभागों के बीच भेजने, कानूनी राय लेने और आवश्यक अनुमति प्राप्त करने में समय लगना अपने आप में देरी माफ करने का पर्याप्त कारण नहीं हो सकता।
जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने 13 अक्टूबर 2026 को राज्य सरकार की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि अपील दाखिल करने में हुई देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निर्धारित समयसीमा के बाद दाखिल राज्य की रिट अपील भी खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए था कि संबंधित अधिकारियों ने मामले में समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की और निर्धारित अवधि के भीतर अपील दाखिल क्यों नहीं की जा सकी।
क्या था मामला?
मध्य प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के सिंगल जज द्वारा रिट याचिका संख्या 11309/2019 में पारित आदेश को चुनौती देते हुए रिट अपील दाखिल की थी।
यह अपील मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (खंड न्यायपीठ को अपील) अधिनियम, 2005 की धारा 2(1) के तहत दाखिल की गई थी।
हालांकि, अपील दाखिल करने में 213 दिन की देरी हो गई थी। इसलिए राज्य सरकार ने सीमा अधिनियम (Limitation Act) की धारा 5 के तहत अंतरिम आवेदन संख्या 14624/2026 दाखिल कर देरी माफ करने की मांग की।
इस आवेदन में सरकार ने अपील दाखिल करने से पहले विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर हुई कार्रवाई का विवरण प्रस्तुत किया।
अपील दाखिल करने की अनुमति मिलने में लगा कई महीने का समय
राज्य सरकार के आवेदन के अनुसार, 1 जनवरी 2026 को ग्वालियर जोन के पुलिस महानिरीक्षक ने ग्वालियर के पुलिस अधीक्षक को मामले में आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
इसके बाद 9 जनवरी 2026 को प्रभारी अधिकारी ने अतिरिक्त महाधिवक्ता के कार्यालय से कानूनी राय मांगी, जो 13 फरवरी 2026 को प्राप्त हुई।
अपील दाखिल करने का प्रस्ताव 9 मार्च 2026 को भोपाल स्थित पुलिस मुख्यालय भेजा गया। इसके बाद पुलिस मुख्यालय ने 27 अप्रैल 2026 को यह प्रस्ताव गृह विभाग को भेज दिया।
राज्य सरकार ने 3 अगस्त 2026 को अपील दाखिल करने की अनुमति प्रदान की, लेकिन इसकी सूचना संबंधित पुलिस अधीक्षक को 20 अगस्त 2026 को दी गई।
इसके बाद 7 सितंबर 2026 को मामले से संबंधित दस्तावेज अतिरिक्त महाधिवक्ता के कार्यालय पहुंचे।
कर्मचारी से संबंधित रिकॉर्ड 29 सितंबर 2026 को सरकारी अधिवक्ता को उपलब्ध कराया गया और अंततः 8 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई।
सरकार ने प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला देकर मांगी राहत
राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता सोहित मिश्रा ने दलील दी कि अपील दाखिल करने में हुई देरी जानबूझकर नहीं की गई थी, बल्कि विभिन्न प्रशासनिक और प्रक्रियागत औपचारिकताओं को पूरा करने में समय लगा।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को अलग-अलग अधिकारियों और विभागों के माध्यम से काम करना पड़ता है। किसी फैसले के खिलाफ अपील दाखिल करने से पहले कानूनी राय और सक्षम अधिकारियों की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है।
इसी आधार पर राज्य सरकार ने कोर्ट से अनुरोध किया कि देरी माफ करने की अर्जी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना।
फाइल समय पर आगे क्यों नहीं बढ़ाई गई, इसका जवाब नहीं: हाईकोर्ट
डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार के आवेदन में दी गई तारीखों और प्रशासनिक कार्रवाई के विवरण का परीक्षण किया।
कोर्ट ने पाया कि आवेदन में केवल यह बताया गया था कि मामला विभिन्न अधिकारियों के पास भेजा गया और कानूनी राय तथा अनुमति प्राप्त करने में समय लगा।
लेकिन राज्य सरकार यह नहीं बता सकी कि इन प्रक्रियाओं को समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की,
“इस बात का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि मामले में आवश्यक तत्परता के साथ कार्रवाई क्यों नहीं की गई और निर्धारित समयसीमा के भीतर अपील क्यों दाखिल नहीं की जा सकी।”
कोर्ट ने कहा कि केवल प्रशासनिक औपचारिकताओं में समय लगने का उल्लेख करना देरी माफ करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सरकारी विभागों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी दे चुका है निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश राज्य बनाम रामकुमार चौधरी मामले का उल्लेख किया।
29 नवंबर 2024 को दिए गए इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कानूनी मामलों के निपटारे के लिए अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए और जिन अधिकारियों की वजह से कानूनी कार्यवाही में देरी होती है, उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट ने ओडिशा राज्य एवं अन्य बनाम नमतारा गर्ल्स हाई स्कूल की प्रबंध समिति मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2026 के फैसले का भी हवाला दिया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी,
“एक सीमा ऐसी होती है, जिसके आगे अदालतें भी किसी वादी की सहायता नहीं कर सकतीं, भले ही वह सरकारी पक्ष ही क्यों न हो और नौकरशाही की उदासीनता के कारण कठिनाइयों का सामना कर रहा हो।”
हाईकोर्ट ने इन फैसलों के आधार पर कहा कि सरकारी विभागों की आंतरिक कार्यप्रणाली को कानूनी समयसीमा का पालन नहीं करने का पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता।
राज्य को विशेषाधिकार प्राप्त वादी नहीं माना जा सकता
जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने कहा कि राज्य सरकार भी अदालती कार्यवाही में निर्धारित कानूनी समयसीमा का पालन करने के लिए बाध्य है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया,
“केवल किसी मामले की फाइल विभिन्न अधिकारियों के माध्यम से आगे बढ़ाने और कानूनी राय तथा अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया अपने आप में देरी माफ करने का पर्याप्त कारण नहीं हो सकती।”
हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने ऐसा कोई ठोस कारण नहीं बताया, जिसके आधार पर 213 दिन की देरी को उचित ठहराया जा सके।
इस संबंध में बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की,
“राज्य को विशेषाधिकार प्राप्त वादी नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अपील को निर्धारित समयसीमा के बाद स्वीकार कराने के लिए पर्याप्त कारण बताना आवश्यक है। केवल सरकारी पक्ष होने के कारण इस कानूनी आवश्यकता से छूट नहीं दी जा सकती।
213 दिन की देरी माफ करने की अर्जी और रिट अपील खारिज
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत प्रशासनिक प्रक्रिया के विवरण को देरी माफ करने के लिए अपर्याप्त पाया।
बेंच ने कहा कि आवेदन में ऐसा कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट हो कि अपील निर्धारित अवधि के भीतर क्यों दाखिल नहीं की जा सकी।
इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने सीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत दाखिल अंतरिम आवेदन संख्या 14624/2026 खारिज कर दिया।
इसके परिणामस्वरूप राज्य सरकार की रिट अपील संख्या 3733/2026 भी निर्धारित कानूनी समयसीमा समाप्त होने के आधार पर खारिज कर दी गई।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: मध्य प्रदेश राज्य बनाम राकेश सिंह जादौन एवं अन्य
- केस नंबर: रिट अपील संख्या 3733/2026
- बेंच: जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला
- फैसले की तारीख: 13 अक्टूबर 2026
