नाबालिग छात्रा का यौन उत्पीड़न: 62 वर्षीय ट्यूटर को राहत देने से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का इनकार, सजा निलंबन और जमानत की अर्जी खारिज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नौवीं कक्षा की छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी 62 वर्षीय होम ट्यूशन शिक्षक की पांच साल की जेल की सजा निलंबित करने और उसे अंतरिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि आरोपी एक शिक्षक के रूप में विश्वास के पद पर था और उसने नाबालिग छात्रा के घर में अकेले होने का अनुचित लाभ उठाकर इस भरोसे का गंभीर हनन किया।

जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने शिक्षक द्वारा अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील के लंबित रहने के दौरान जेल की सजा पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर 1 सितंबर को यह आदेश जारी किया। अदालत ने रेखांकित किया कि यह आचरण यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 के कड़े प्रावधानों के दायरे में पूरी तरह आता है, जो अपराध की गंभीरता को कई गुना बढ़ा देता है।

भरोसे के रिश्ते का दुरुपयोग अक्षम्य: हाईकोर्ट

याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 62 वर्षीय दोषी और स्कूल जाने वाली नाबालिग पीड़िता के बीच उम्र के भारी अंतर तथा अपराध की संगीन प्रकृति को प्रमुखता से दर्ज किया। पीठ ने कहा कि ट्यूशन शिक्षक और छात्रा के बीच एक विश्वासपात्र रिश्ता (फिड्यूशियरी रिलेशनशिप) था। ऐसे में जब बच्ची घर पर अकेली थी, तब उसके साथ की गई इस हरकत ने उस भरोसे को तोड़ा है जो एक शिक्षक को समाज और परिवार द्वारा सौंपा जाता है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपराध की प्रकृति, क्रूरता, गंभीरता और रिकॉर्ड पर दर्ज गवाहियों को देखते हुए सजा निलंबित करने की अर्जी खारिज कर रहा है, लेकिन इसका लंबित मुख्य अपील के अंतिम गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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झूठे केस में फंसाने की दलील खारिज

अपीलकर्ता शिक्षक की ओर से यह तर्क दिया गया था कि उसे रंजिशन झूठे मामले में फंसाया गया है। इस पर अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि घटना से पहले दोषी और पीड़िता के परिवार के बीच कोई पुरानी दुश्मनी या विवाद था।

अदालत ने कहा कि जब दोनों पक्षों के बीच पूर्व में किसी तरह के मतभेद या रंजिश का कोई इतिहास ही मौजूद नहीं है, तो इस स्तर पर शिक्षक को साजिशन फंसाए जाने का बचाव तर्क भरोसेमंद नहीं लगता। इसलिए इस आधार पर सजा पर रोक लगाकर उसे रिहा नहीं किया जा सकता।

बचाव पक्ष ने रखी थी जेल में लंबा समय बीतने की आशंका

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याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता निमित शाह ने दलील दी कि अपील के स्तर पर उनके मुवक्किल के पास मजबूत आधार मौजूद हैं। उन्होंने चिंता जताई कि नियमित सुनवाई की प्रक्रिया में लंबा समय लग सकता है, जिसके चलते मुख्य अपील पर फैसला आने से पहले ही उनका मुवक्किल अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा जेल में काट चुका होगा।

अधिवक्ता ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में परस्पर विरोधाभास होने की बात भी उठाई और दावा किया कि परिस्थितियों से प्रतीत होता है कि शिक्षक को फंसाने के लिए जानबूझकर अवसर गढ़ा गया था। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को अंतरिम राहत के लिए नाकाफी माना।

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2022 का है मामला, निचली अदालत ने सुनाई थी पांच साल की कैद

यह पूरा मामला वर्ष 2022 में सामने आया था। अभियोजन के अनुसार, 62 वर्षीय शिक्षक नौवीं कक्षा की छात्रा को पढ़ाने उसके घर पहुंचा था। घर में छात्रा को अकेला पाकर उसने उसका यौन उत्पीड़न किया। किसी तरह खुद को बचाकर छात्रा दूसरे कमरे में भागी और अंदर से कुंडी बंद कर ली। परिजनों के लौटने पर छात्रा ने उन्हें आपबीती बताई, जिसके बाद पुलिस में आपराधिक मामला दर्ज कराया गया था।

मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के बाद ट्रायल कोर्ट ने 11 अगस्त को शिक्षक को दोषी ठहराते हुए पांच साल के सश्रम कारावास और कुल 16,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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