पांच बच्चों के कथित यौन उत्पीड़न मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने फांसी की सजा रद्द की, आरोपी को किया बरी

मद्रास हाईकोर्ट ने पांच बच्चों के कथित यौन उत्पीड़न के मामले में एक व्यक्ति को दी गई मौत की सजा को पूरी तरह से रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि निचली अदालत में हुई सुनवाई के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन हुआ और अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध के बुनियादी तथ्य साबित करने में भी नाकाम रहा।

जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस केके रामकृष्णन की खंडपीठ ने पिछले दो महीनों के दौरान केस से जुड़े मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की बीस से अधिक बार बारीकी से पड़ताल की। इस विस्तृत समीक्षा के बाद खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह मामला इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि किस तरह कठोर वैधानिक प्रावधानों का गलत इस्तेमाल कर एक निर्दोष व्यक्ति के सिर पर मौत की सजा की तलवार लटका दी गई।

अदालत ने अपनी अहम टिप्पणी में कहा कि किसी एक कमजोर व्यक्ति को न्याय दिलाने के नाम पर दूसरे कमजोर व्यक्ति की बलि नहीं दी जा सकती। अदालत के अनुसार, कानून का दायित्व बच्चों की रक्षा करना है, लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि बिना किसी ठोस सबूत के किसी आरोपी को सजा के हवाले कर दिया जाए।

मुकदमे की निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों का हनन

हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा संचालित सुनवाई पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष सुनवाई की संवैधानिक गारंटी का मजाक बनकर रह गई, जिससे न्याय का भारी हनन हुआ। खंडपीठ ने दर्ज किया कि निचली अदालत के जज ने मृत्युदंड से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सुरक्षा उपायों और अनिवार्य दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन नहीं किया।

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अदालत ने रेखांकित किया कि सुनवाई के दौरान आरोपी को न तो कानूनी सलाह लेने का समुचित अवसर मिला और न ही कई महत्वपूर्ण चरणों में उसकी ओर से कोई वकील मौजूद था। अपीलीय कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार ने अपराध की गंभीरता का हवाला देते हुए मृत्युदंड को बरकरार रखने का तर्क दिया था, जबकि बचाव पक्ष ने यह साबित किया कि अभियोजन पक्ष अपराध से जुड़े बुनियादी साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह विफल रहा।

सिखाई गई गवाही और मेडिकल साक्ष्यों का अभाव

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इस मामले की शुरुआत तब हुई थी जब पांच बच्चों ने अपने स्कूल में ‘गुड टच और बैड टच’ विषय पर आयोजित जागरूकता सत्र के बाद अपने परिजनों को कथित उत्पीड़न की बात बताई थी। इसके बाद निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने जब बच्चों के बयानों का विश्लेषण किया, तो उनमें काफी विरोधाभास, तथ्य बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की प्रवृत्ति और पहले से सिखाए-पढ़ाए जाने के स्पष्ट संकेत मिले। अदालत ने पाया कि सभी बच्चों ने कथित उत्पीड़न, घटना के बाद चुप रहने के कारणों, शारीरिक स्पर्श की समझ और मिली धमकियों को लेकर बिल्कुल एक जैसे और अपरिवर्तित बयान दिए। इसके अतिरिक्त, गवाही के दौरान आरोपी की वास्तविक पहचान भी कानूनी रूप से स्थापित नहीं की जा सकी।

अदालत ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने में हुई अकारण देरी को भी संदिग्ध माना। इसके साथ ही, कथित घटना की तारीख को लेकर बयानों में भारी अंतर था और अभियोजन के दावों की पुष्टि के लिए कोई मेडिकल साक्ष्य भी रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था।

मुआवजे की मंशा और अदालत का मानवीय रुख

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हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के इस तर्क को भी स्वीकार किया कि यह मामला दुर्भावनापूर्ण इरादे से प्रेरित था, जिसमें बच्चों के परिजनों द्वारा सरकारी योजना के तहत मिलने वाले भारी मुआवजे की उम्मीद भी शामिल थी।

खंडपीठ ने कहा कि सामान्य तौर पर झूठे आरोप लगाने की स्थिति में परिजनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और उनसे मुआवजा भी वसूला जाना चाहिए। इसके बावजूद, अदालत ने इस मामले में परिजनों से मुआवजा वसूलने का आदेश देने से परहेज किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि झूठी कानूनी कार्रवाई शुरू करने वाले माता-पिता के आचरण के कारण स्वयं बच्चे पहले ही काफी प्रताड़ना झेल चुके हैं।

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