रिश्तेदार गवाहों के बयानों में झूठ और जांच की खामियों पर संदेह का लाभ: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोपियों को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में दो दोषियों की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चश्मदीद गवाहों की गवाही में भारी विरोधाभास, मेडिकल साक्ष्यों से असंगति और पुलिस जांच की गंभीर खामियों के चलते आरोपियों के निर्दोष होने की वाजिब संभावना पैदा होती है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील स्वीकार कर ली, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 सपठित धारा 34 और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दी गई सजा को बरकरार रखा गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, नाली बंद होने से मृतक के घर के सामने जलभराव हो गया था, जिसको लेकर दो परिवारों के बीच झगड़ा शुरू हुआ। घटना वाले दिन जब मृतक अपनी भैंस नहला रहा था, तभी पांच आरोपी वहां पहुंचे। एक आरोपी के उकसाने पर दूसरे आरोपी (ए2) ने कथित तौर पर मृतक के सीने के बाईं तरफ गोली मार दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। वहीं पहले आरोपी (ए1) पर महिलाओं और बच्चों पर गोली चलाने का आरोप लगा, जबकि बाकी आरोपियों पर अन्य परिजनों के साथ लाठियों से मारपीट करने का आरोप लगाया गया।

इस मामले में प्रथम सूचना बयान (एफआईएस) मृतक के बेटे (पीडब्ल्यू10) ने दर्ज कराया था। कुल पांच आरोपियों पर मुकदमा चला, जिसमें से ट्रायल कोर्ट ने तीन को बरी कर दिया और दो (ए1 और ए2) को दोषी ठहराया। हाईकोर्ट ने भी दोनों की दोषसिद्धि और सजा को यथावत रखा, जिसके बाद दोनों दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

दोनों पक्षों के तर्क और गवाहों के बयान

अभियोजन पक्ष का पूरा मामला मुख्य रूप से मृतक के करीबी परिजनों की गवाही पर आधारित था। गवाही देने वालों में मृतक के बेटे (पीडब्ल्यू2, पीडब्ल्यू3, पीडब्ल्यू10), बेटी (पीडब्ल्यू5), बहू (पीडब्ल्यू6) और पास के गांव का एक निवासी (पीडब्ल्यू8) शामिल थे। अभियोजन ने नाली के विवाद में गोली मारकर हत्या साबित करने के लिए कुल 12 गवाह पेश किए।

दूसरी ओर, बचाव पक्ष की ओर से तीन गवाह पेश किए गए। बचाव पक्ष के पहले गवाह (डीडब्ल्यू1) ने गवाही दी कि घटना की रात जब वह अपनी बीमार बहन से मिलने जा रहा था, तो उसने शोर और गोलियों की आवाज सुनी। टॉर्च जलाकर देखने पर उसे जमीन पर एक व्यक्ति पड़ा दिखा और कुछ हथियारबंद लोग “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगा रहे थे। जब उन लोगों ने उसे धमकाया, तो वह डरकर भाग गया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उस इलाके में नक्सली गतिविधियां सक्रिय थीं और पुलिस की कहानी पूरी तरह मनगढ़ंत है, क्योंकि परिजनों का शव को अस्पताल ले जाने के बजाय सीधे थाने ले जाना बिल्कुल अस्वाभाविक आचरण था।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की पड़ताल करते हुए चश्मदीदों की गवाही, मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस जांच के बीच कई गंभीर विसंगतियों को रेखांकित किया:

  • चश्मदीदों के बयानों में विरोधाभास: पीठ ने पाया कि एफआईएस में पीडब्ल्यू5, पीडब्ल्यू6 या पीडब्ल्यू8 की मौजूदगी का कोई जिक्र नहीं था। जिरह के दौरान पीडब्ल्यू5 और पीडब्ल्यू6 के बयानों में सीआरपीसी की धारा 161 के तहत पुलिस को दिए गए बयानों से भारी फेरबदल और विसंगतियां पाई गईं। इसके अलावा, पीडब्ल्यू8 ने दावा किया कि वह पीडब्ल्यू2 के साथ आ रहा था, जबकि पीडब्ल्यू2 ने अपनी गवाही में इस बात का कोई समर्थन नहीं किया।
  • मेडिकल रिपोर्ट बनाम चश्मदीदों की कहानी: चश्मदीदों का दावा था कि गोली लगते ही मृतक की मौके पर ही मौत हो गई थी। इसके उलट, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर (पीडब्ल्यू11) ने स्पष्ट किया कि इस तरह की चोट लगने के बाद भी व्यक्ति 3 से 6 घंटे तक जीवित रह सकता है। वहीं पीडब्ल्यू6 ने कहा कि जब ससुर को घटनास्थल से ले जाया जा रहा था, तब उनकी नब्ज चल रही थी। कोर्ट ने माना कि यह बेहद अस्वाभाविक है कि नब्ज चलने के बावजूद परिजन घायल को अस्पताल ले जाने के बजाय सीधे पुलिस स्टेशन ले गए। इसके अलावा पीडब्ल्यू5, पीडब्ल्यू6 और उसके बच्चे को आई कथित चोटें भी मेडिकल साक्ष्यों से मेल नहीं खाती थीं।
  • पुलिस जांच की लापरवाही: जांच अधिकारी (पीडब्ल्यू12) ने माना कि घटनास्थल का न तो कोई नक्शा बनाया गया और न ही वहां कोई जांच-पड़ताल की गई। भारी बारिश का हवाला देकर खून से सनी मिट्टी या कोई अन्य सबूत जुटाने की कोशिश नहीं की गई। परिजनों के खून से सने कपड़े भी न तो जब्त किए गए और न ही उनकी फोरेंसिक जांच कराई गई।
  • हथियार और लाइसेंस का अभाव: वारदात में इस्तेमाल हथियार कभी बरामद नहीं हुए और न ही रिकॉर्ड पर यह साबित किया गया कि ए1 के पास कोई लाइसेंसी बंदूक थी। गवाहों के इस दावे पर कि ए1 लाइसेंसी हथियार लिए हुए था, कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की: “सिर्फ हथियार देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि वह लाइसेंसी है। हम साफ तौर पर यह देख सकते हैं कि यह आरोपी को फंसाने की सोची-समझी साजिश जैसा लगता है, जिसके पास लाइसेंसी हथियार होने की जानकारी थी। लेकिन दुर्भाग्य से, आईओ ने इस बात का कोई लाइसेंस पेश नहीं किया और न ही यह साबित करने की कोशिश की कि आरोपी के पास ऐसे हथियार की पहुंच थी।”
  • रिश्तेदार गवाहों की गवाही की पड़ताल: रिश्तेदार गवाहों की विश्वसनीयता पर कोर्ट ने कहा: “मृतक के रिश्तेदार होने भर से किसी गवाह को स्वार्थी (इंटरेस्टेड) गवाह नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब परिस्थितियों से, जैसा कि वर्तमान मामले में है, उनकी गवाही में झूठ का दायरा नजर आता है, तो वहां बहुत बारीकी से जांच-पड़ताल की जरूरत होती है।”

पीठ ने शरद विरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि हालांकि निर्दोष होने की परिकल्पना का सिद्धांत मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों में लागू होता है, लेकिन जब प्रत्यक्ष गवाही ही संदेहास्पद हो जाए, तब भी यह सिद्धांत उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है: “इन विसंगतियों और विरोधाभासों के कारण, हम चश्मदीद गवाहों की मौखिक गवाही पर भरोसा करने में असमर्थ हैं। ऐसी परिस्थिति में, निर्दोष होने की संभावना को लेकर उठने वाला वाजिब संदेह प्रासंगिक हो जाता है।”

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए हालात केवल और केवल आरोपियों के अपराध की ओर इशारा नहीं करते हैं, इसलिए दोनों अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ दिया जाना न्यायोचित है।

अदालत ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए दोनों आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत हिरासत से रिहा किया जाए और यदि वे जमानत पर हैं, तो उनके बेल बॉन्ड निरस्त माने जाएं।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अशोक उपाध्याय और अन्य बनाम बिहार राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1223/2022
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 08 सितंबर 2026

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