सुप्रीम कोर्ट ने असम के स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रांतिकरण (प्रोविंशियलाइजेशन) नीति के तहत शिक्षकों की किसी भी नई नियुक्ति या उनके समायोजन पर अंतरिम रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार, असम सरकार, संबंधित विभाग के आयुक्त एवं सचिव तथा राज्य के प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा निदेशकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यह अंतरिम आदेश चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने दिया। अदालत ने साफ किया कि मामले की अगली सुनवाई तक राइट टू एजुकेशन (आरटीई) एक्ट, नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) एक्ट 1993 और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) एक्ट 1956 से जुड़े कानूनी दायरे के तहत किसी भी शिक्षक की भर्ती या समायोजन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
पारदर्शी चयन प्रक्रिया के अभाव पर संवैधानिक चुनौती
यह मामला राजेश चौहान और माधव मुकुंद पुजारी द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिनकी ओर से वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार ने पीठ के समक्ष दलीलें पेश कीं। याचिका में वेंचर शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षकों और कर्मचारियों के प्रांतिकरण की वैधानिक योजना की वैधता को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मौजूदा तंत्र के जरिए बिना किसी खुली, निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया के लोगों को सीधे सरकारी सेवा में प्रवेश दिया जा रहा है। याचिका के अनुसार, खुली भर्ती के बिना नियमित सेवा का दर्जा देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का खुला उल्लंघन है।
असम शिक्षा अधिनियम 2017 और ट्यूटरों की भूमिका पर सवाल
याचिका में विशेष रूप से असम शिक्षा अधिनियम 2017 के उन प्रावधानों पर आपत्ति जताई गई है, जो कथित तौर पर उन लोगों के प्रांतिकरण की छूट देते हैं जिनके पास केंद्रीय कानूनों और नियमों द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यता भी नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि बिना अनिवार्य योग्यता वाले कर्मियों को प्रांतीयकृत या सरकारी संस्थानों में शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 14, 21ए और 254 के विपरीत है।
इसके अलावा, ट्यूटरों के प्रांतिकरण से जुड़े नियमों को भी अदालत में चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि जो व्यक्ति वैधानिक तौर पर तय योग्यताएं पूरी नहीं करते, उन्हें सरकारी या प्रांतीयकृत संस्थानों में छात्रों को कक्षा में पढ़ाने की अनुमति कतई नहीं दी जानी चाहिए।
पूर्व नियुक्तियों की जांच और भविष्य में खुली भर्ती की मांग
याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत से असम सरकार को एक व्यापक समीक्षा का आदेश देने की मांग की है। इसके तहत असम वेंचर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एक्ट 2011 और 2017 के अधिनियम के तहत अब तक प्रांतीयकृत किए गए सभी कर्मचारियों की योग्यताओं की पुष्टि की जाए। याचिका में आग्रह किया गया है कि यह जांच केवल इस बिंदु तक सीमित रहे कि संबंधित कर्मियों के पास संसद द्वारा पारित कानूनों और नियामक संस्थाओं द्वारा तय योग्यताएं हैं या नहीं।
इसके साथ ही अदालत से यह भी अपील की गई है कि अयोग्य कर्मियों के अध्यापन पर स्थायी रोक लगाई जाए, प्रांतिकरण के माध्यम से होने वाली सभी भविष्य की भर्तियों को तुरंत रोका जाए, और आगे सभी सरकारी शिक्षण पदों पर केवल पारदर्शी, योग्यता आधारित और खुली प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से ही नियुक्तियां की जाएं।
राजकोषीय भार और प्रांतिकरण का ढांचा
असम में वेंचर शैक्षणिक संस्थानों के प्रांतिकरण की कानूनी व्यवस्था के तहत संबंधित संस्थानों का वित्तीय दायित्व सीधे राज्य सरकार अपने ऊपर लेती है। इस प्रक्रिया के पूरा होने पर कर्मियों को नियमित राज्य कर्मचारियों की नियमावली के अनुरूप निर्धारित वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी और अवकाश नकदीकरण (लीव इनकैशमेंट) जैसी सभी सुविधाएं सरकारी खजाने से प्रदान की जाती हैं।

