बायो-मेडिकल वेस्ट प्लांट के लिए टर्म्स ऑफ रेफरेंस मांगने हेतु पहले से जमीन का आवंटन अनिवार्य शर्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट

पर्यावरण से जुड़े नियामक नियमों पर एक अहम फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे, ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 (ईआईए, 2006) के तहत टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) प्राप्त करने के लिए फॉर्म 1 में आवेदन करते समय पहले से जमीन का आवंटन या अधिग्रहण होना कोई अनिवार्य पूर्व-शर्त नहीं है। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक बायो-मेडिकल वेस्ट प्लांट को दी गई पर्यावरणीय मंजूरियों को रद्द करने वाले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि शुरुआती चरण में केवल संभावित स्थल की पहचान करना ही पर्याप्त है, जबकि जमीन के मालिकाना या आवंटन की स्थिति का प्रमाण केवल अंतिम मूल्यांकन (अप्रैजल) के चरण में आवश्यक होता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एनजीटी की प्रधान पीठ द्वारा 5 जुलाई 2024 को दिए गए उस आदेश के बाद शुरू हुआ, जिसमें उसने संभल जिले के बबराला स्थित यूपीएसआईडीसी औद्योगिक क्षेत्र में कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (सीबीडब्ल्यूटीएफ) स्थापित करने के लिए मेसर्स पुनःचक्रन प्राइवेट लिमिटेड को 20 दिसंबर 2023 को जारी नई पर्यावरणीय मंजूरी (EC) और स्थापना सहमति आदेश (CTE) को रद्द कर दिया था। अपीलकर्ता कंपनी ने बबराला औद्योगिक क्षेत्र में प्लॉट संख्या ई-25 और ई-26 (कुल 0.89 एकड़) के आवंटन के लिए उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) में आवेदन किया था और 11 अगस्त 2021 को उत्तर प्रदेश राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (यूपी सीआ) के समक्ष फॉर्म 1 दाखिल कर ईआईए अध्ययन शुरू करने के लिए टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) की मांग की थी।

शुरुआत में यूपीसीडा ने सीबीडब्ल्यूटीएफ के लिए जमीन का आवंटन खारिज कर दिया था और बाद में अपीलकर्ता को इन्हीं प्लॉट्स को ‘औद्योगिक उपकरणों के निर्माण’ के उद्देश्य से आवंटित किया। इसके बाद अपीलकर्ता ने 2022 में पहली ईसी और सीटीई हासिल कर ली। हालांकि, अनिरुद्ध पंवार बनाम पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मामले में एनजीटी ने 31 जुलाई 2023 को इन प्राथमिक मंजूरियों को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि ईसी व सीटीई मांगने से पहले जमीन का अधिग्रहण होना अनिवार्य शर्त थी और यह जमीन संशोधित दिशानिर्देश 2016 (आरजी, 2016) के क्लॉज 7 के तहत आवश्यक एक एकड़ के मानक को पूरा नहीं करती थी। हालांकि, एनजीटी ने अपीलकर्ता को अतिरिक्त जमीन जुटाकर या कानून के तहत जमीन मानक में छूट लेकर दोबारा आवेदन करने की छूट दी थी।

इसके बाद यूपीसीडा ने 19 सितंबर 2022 को जमीन के उपयोग में बदलाव करते हुए इसे सीबीडब्ल्यूटीएफ के लिए मंजूर कर दिया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के परामर्श से 17 नवंबर 2023 को 1 एकड़ की शर्त में ढील देते हुए 0.89 एकड़ क्षेत्र की अनुमति दी। इसके साथ ही जीरो लिक्विड डिस्चार्ज, रियल-टाइम ऑनलाइन एमिशन मॉनिटरिंग और गंध नियंत्रण जैसे कड़े सुरक्षात्मक उपाय भी जोड़े गए। 17 अगस्त 2021 को जारी मूल टीओआर के आधार पर यूपी सीआ ने दूसरी ईसी और यूपीपीसीबी ने दूसरा सीटीई 20 दिसंबर 2023 को जारी कर दिया। अपीलकर्ता की प्रतिस्पर्धी फर्म इंडोटेक वेस्ट सॉल्यूशन ने इन मंजूरियों को एनजीटी में चुनौती दी। एनजीटी ने 5 जुलाई 2024 को इन सभी मंजूरियों को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि पूरी प्रक्रिया कानूनी द्वेष से प्रभावित थी और बबराला एक नगर पंचायत है जिसकी आबादी 25 लाख से कम है, इसलिए वह आरजी, 2016 के क्लॉज 7(बी) के तहत जमीन में छूट पाने का पात्र नहीं है। इसके खिलाफ अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

दोनों पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने दलील दी कि यह औद्योगिक क्षेत्र वास्तव में बबराला नगर पंचायत की सीमा में न होकर नूरपुर ग्राम पंचायत के अधीन नूरपुर गांव में स्थित है, जो कि पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्र है। उन्होंने तर्क दिया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के ऑफिस मेमोरेंडम के अनुसार पहला टीओआर चार साल की अवधि के लिए वैध था और एनजीटी ने अपने पहले फैसले में इस टीओआर को कभी रद्द नहीं किया था। इसके अलावा सभी संबंधित प्राधिकरणों ने नियमों के तहत सोच-समझकर निर्णय लिया था, इसलिए इसमें किसी भी तरह का कानूनी द्वेष नहीं था।

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दूसरी तरफ, प्रतिवादी इंडोटेक वेस्ट सॉल्यूशन की ओर से वरिष्ठ वकील पिनाकी मिश्रा ने दलील दी कि ईआईए, 2006 के क्लॉज 8(vi) और सुप्रीम कोर्ट के हनुमान लक्ष्मण अरोस्कर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले के अनुसार फॉर्म 1 में जमीन के संबंध में गलत जानकारी देना या तथ्यों को छिपाना पूरी प्रक्रिया को शुरू से ही दूषित कर देता है। उन्होंने कहा कि जमीन का आवंटन होना एक अनिवार्य पूर्व-शर्त थी और सीपीसीबी द्वारा जमीन में दी गई छूट बिना सोचे-समझे दी गई थी, लिहाजा एनजीटी का फैसला बिल्कुल सही था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले आरजी, 2016 दिशानिर्देशों की कानूनी स्थिति पर विचार किया। अदालत ने गल्फ गोअन्स होटल्स कंपनी लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देकर दिशानिर्देशों को गैर-बाध्यकारी बताने वाले तर्कों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आरजी, 2016 को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के तहत बनाया गया है। बी.के. श्रीनिवासन बनाम कर्नाटक राज्य फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने माना कि जब मूल कानून में किसी नियम के प्रकाशन का कोई सख्त तरीका तय नहीं हो, तो उसका आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित होना ही पर्याप्त माना जाता है:

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“न तो पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और न ही बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स में आरजी, 2016 के प्रकाशन का कोई सख्त तरीका तय किया गया है। निःसंदेह, यह मामला बी.के. श्रीनिवासन फैसले के अनुसार तीसरे प्रकार की स्थिति के तहत आता है। इसलिए सरकारी गजट में प्रकाशन, हालांकि सामान्य नियम है, लेकिन इसे अनिवार्य शर्त नहीं कहा जा सकता। हमारा मानना है कि सीपीसीबी की आधिकारिक वेबसाइट पर ऐसे तकनीकी दिशानिर्देशों (आरजी, 2016) का प्रकाशन उचित और पर्याप्त था।”

जमीन में छूट दिए जाने के बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट ने संभल के जिलाधिकारी द्वारा पेश की गई आधिकारिक रिपोर्ट का संज्ञान लिया। इस रिपोर्ट से साबित हुआ कि यह प्लांट नूरपुर गांव में स्थित है, जो बबराला नगर पंचायत की सीमा से करीब 2.6 किलोमीटर दूर है। इस तरह यह स्थल क्लॉज 7(बी) के तहत “ग्रामीण क्षेत्र” की पूर्व-शर्त को पूरी तरह संतुष्ट करता है।

जमीन अधिग्रहण के विभिन्न चरणों की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ईआईए, 2006 के क्लॉज 6, मंत्रालय के 7 अक्टूबर 2014 के ऑफिस मेमोरेंडम और आरजी, 2016 के क्लॉज 2 का समन्वय किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग चरणों में जमीन के संबंध में अलग-अलग आवश्यकताएं होती हैं:

“ईआईए, 2006 का क्लॉज 6 स्पष्ट करता है कि संभावित स्थल या स्थलों की पहचान के बाद फॉर्म 1 में आवेदन किया जा सकता है। इसलिए, फॉर्म 1 के तहत आवेदन करने के लिए जमीन का आवंटन होना कोई पूर्व-शर्त नहीं कहा जा सकता।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि फॉर्म 1 के स्तर पर केवल संभावित स्थल की पहचान पर्याप्त होती है, लेकिन चौथे चरण यानी मूल्यांकन (अप्रैजल) के समय राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC) और राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) के समक्ष जमीन हस्तांतरण या आवंटन से संबंधित विश्वसनीय दस्तावेज पेश करना अनिवार्य होता है। साथ ही जल अधिनियम, वायु अधिनियम और मंत्रालय के 20 सितंबर 2021 के आदेश के तहत सीटीई और ईसी की प्रक्रिया समानांतर चल सकती है और सीटीओ (संचालन सहमति) लेने के लिए ईसी आवश्यक होती है, लेकिन सीटीई के लिए जमीन का पूर्ण आवंटन पूर्व-शर्त नहीं है।

पहले टीओआर के इस्तेमाल पर अदालत ने हनुमान लक्ष्मण अरोस्कर के मामले से इस केस को अलग बताया और कहा कि अपीलकर्ता की कमी अप्रैजल चरण से जुड़ी थी, न कि फॉर्म 1 के आधारभूत आंकड़ों से। अदालत ने कहा कि ईसी रद्द होने पर वैध टीओआर खुद-ब-खुद समाप्त नहीं हो जाता:

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“इसलिए, जब ऐसे मामलों में पर्यावरणीय मंजूरी रद्द की जाती है, तो आवेदक को यांत्रिक तरीके से पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब शुरुआत की रेखा पर वापस जाने से प्रक्रिया में कोई नया तत्व नहीं जुड़ता और यह पूरी तरह निरर्थक होता है। हमें इस तरह की बेमतलब की नई शुरुआत से होने वाले खर्च और देरी के प्रति सचेत रहना चाहिए।”

अदालत ने बेंगलुरु डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम सुधाकर हेगड़े मामले का हवाला देते हुए कहा कि पर्यावरणीय बदलावों को ध्यान में रखते हुए मंत्रालय के परिपत्रों के तहत टीओआर की वैधता चार साल होती है। चूंकि यहां बेसलाइन डेटा न तो पुराना था और न ही विवादित, इसलिए पहले टीओआर के आधार पर दूसरी ईसी जारी करना पूरी तरह वैध था।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि एनजीटी ने तथ्यों और कानूनी स्थिति का आकलन करने में गंभीर चूक की थी। शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए एनजीटी के 5 जुलाई 2024 के फैसले को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता के पक्ष में जारी पर्यावरणीय मंजूरी (EC) और स्थापना सहमति आदेश (CTE) को बहाल कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मेसर्स पुनःचक्रन प्राइवेट लिमिटेड बनाम इंडोटेक वेस्ट सॉल्यूशन एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 7367/2024
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा
निर्णय की तिथि: 7 सितंबर, 2026

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