अनुच्छेद 226 और 227 के तहत व्यक्तिगत लाभ मांगने वाली संयुक्त याचिकाओं में ‘प्रति याचिका’ नहीं, बल्कि ‘प्रति याचिकाकर्ता’ कोर्ट फीस देनी होगी: बॉम्बे हाईकोर्ट

संयुक्त याचिकाओं पर कोर्ट फीस तय करने के महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब किसी याचिका में अलग-अलग व्यक्तियों के व्यक्तिगत वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) शामिल हों या उनसे व्यक्तिगत लाभ मिलने हों, तो महाराष्ट्र कोर्ट फीस अधिनियम, 1959 की अनुसूची-II की प्रविष्टि 1(f)(ii) के तहत कोर्ट फीस ‘प्रति याचिका’ के बजाय ‘प्रति याचिकाकर्ता’ के आधार पर देनी होगी। हाईकोर्ट की एकल पीठ के जस्टिस संदीप वी. मरने ने कहा कि वादी संयुक्त याचिका दायर करने की अदालती सुविधा का सहारा लेकर सरकारी खजाने को देय वैधानिक कोर्ट फीस से बच नहीं सकते। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां कई याचिकाकर्ताओं का वाद-कारण वास्तविक रूप से एक समान (कॉमन कॉज ऑफ एक्शन) हो और फैसले से किसी को अलग-अलग व्यक्तिगत लाभ न मिलने हों, वहां एक ही कोर्ट फीस पर्याप्त होगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अधिवक्ता सत्यम ए. सुराणा द्वारा दायर एक अंतरिम आवेदन से सामने आया। उन्होंने एक पूर्व में निस्तारित रिट याचिका (रिट याचिका संख्या 9463/2026) में याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी की थी। उस मुख्य याचिका में 11 याचिकाकर्ताओं ने एक साथ मिलकर एक आदेश को चुनौती दी थी और उच्च पेंशन, पेंशन लाभ तथा एरियर के भुगतान की मांग की थी।

हाईकोर्ट रजिस्ट्री ने इन सभी 11 याचिकाकर्ताओं में से प्रत्येक से 250 रुपये के हिसाब से कुल 2,750 रुपये कोर्ट फीस जमा करवाई थी। इससे व्यथित होकर आवेदक ने अंतरिम आवेदन दायर किया। आवेदन में मांग की गई कि महाराष्ट्र कोर्ट फीस अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 1(f) के तहत संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत दायर याचिकाओं पर फीस ‘प्रति याचिकाकर्ता’ नहीं, बल्कि ‘प्रति याचिका’ के आधार पर ली जानी चाहिए। आवेदक ने अतिरिक्त वसूली गई कोर्ट फीस वापस करने की गुहार लगाई और रजिस्ट्री में एक समान प्रक्रिया अपनाने के निर्देश देने की मांग की। आवेदक का कहना था कि रजिस्ट्री की अलग-अलग आपत्तियों के कारण वादकारियों पर वित्तीय बोझ पड़ता है और कई याचिकाएं आपत्तियों में ही लंबित रह जाती हैं।

पक्षों की दलीलें

स्वयं उपस्थित होकर आवेदक सत्यम ए. सुराणा ने दलील दी कि अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 1(f)(ii) में हाईकोर्ट में प्रस्तुत किसी “आवेदन या याचिका” पर एक निश्चित कोर्ट फीस का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि वैधानिक प्रविष्टि में “प्रति याचिकाकर्ता” या “प्रत्येक याचिकाकर्ता के लिए” जैसे शब्द नहीं हैं। चूंकि अनुसूची-II का शीर्षक ही “निश्चित फीस” (फिक्स्ड फीस) है, इसलिए फीस का निर्धारण कार्यवाही (प्रोसीडिंग) के आधार पर होना चाहिए, न कि याचिका में शामिल व्यक्तियों की संख्या के आधार पर।

उन्होंने तर्क दिया कि कोर्ट फीस कानून एक वित्तीय कानून है और इसका सख्त व्याख्या (स्ट्रिक्ट कंस्ट्रक्शन) के साथ अर्थ निकाला जाना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के गुजरात स्टेट फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन बनाम नटसन मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (पी) लिमिटेड और डायरेक्टर ऑफ इनकम टैक्स बनाम मेसर्स अमेरिकन एक्सप्रेस बैंक लिमिटेड के फैसलों का हवाला दिया। इसके अलावा, उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के मछिंद्र रामभाऊ चव्हाण बनाम मेसर्स अहमदनगर फोर्जिंग लिमिटेड, इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के उमेश चंद विनोद कुमार बनाम कृषि उत्पादन मंडी समिति और कलकत्ता हाईकोर्ट के पारुल देबनाथ बनाम भारत संघ के निर्णयों पर भरोसा जताया।

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दूसरी ओर, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से पेश अधिवक्ता लीना पाटिल ने दलील दी कि रजिस्ट्री एक समान प्रक्रिया का पालन करती है, जिसके तहत जब कई व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए संयुक्त रूप से आते हैं, तो प्रति याचिकाकर्ता के आधार पर फीस ली जाती है। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ के संतोष नारायण गायकवाड़ बनाम रजिस्ट्रार, बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि जहां याचिकाकर्ता संयुक्त रूप से आते हैं, वहां प्रत्येक याचिकाकर्ता के लिए अलग कोर्ट फीस जमा करना अनिवार्य है।

अदालत द्वारा पूर्व उदाहरणों का विश्लेषण

जस्टिस मरने ने टिप्पणी की कि यह कोई पारंपरिक विरोधी मुकदमा नहीं है, बल्कि वादकारियों से जुड़ा एक प्रक्रियात्मक विषय है। अदालत ने पाया कि मौजूदा समय में अनुच्छेद 226 और 227 के तहत दायर याचिकाओं पर प्रविष्टि 1(f)(ii) के अनुसार 250 रुपये की निश्चित फीस लागू है (हालांकि 2018 के संशोधन द्वारा इसे बढ़ाकर 1,250 रुपये करने का प्रस्ताव था, लेकिन वह अधिसूचना अभी लागू नहीं हुई है)।

अदालत ने विभिन्न अदालतों के पूर्व फैसलों का विस्तार से विश्लेषण किया:

  • सुप्रीम कोर्ट के मोता सिंह बनाम हरियाणा राज्य मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि जब अलग-अलग ट्रक मालिकों ने टैक्स को चुनौती दी, तो प्रत्येक का अपना स्वतंत्र वाद-कारण था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था: “चूंकि सामान ढोने के लिए ट्रक चलाने वाले प्रत्येक मालिक पर विवादित टैक्स चुकाने की व्यक्तिगत देयता है, इसलिए प्रत्येक का अपना स्वतंत्र वाद-कारण है… यह उम्मीद करना अनुचित होगा कि अलग-अलग ट्रक मालिक, जिनका आपस में न तो साझेदारी का कोई संबंध है और न ही व्यक्तियों के संघ का कोई कानूनी संबंध, केवल इसलिए एक ही सेट में कोर्ट फीस का भुगतान करेंगे क्योंकि वे एक याचिका में शामिल हो गए हैं। टैक्स चुकाने की व्यक्तिगत देयता से प्रत्येक का अपना अलग वाद-कारण उत्पन्न होता है और प्रत्येक की याचिका एक अलग व स्वतंत्र याचिका मानी जाएगी, जिस पर कानूनी रूप से देय कोर्ट फीस चुकानी होगी। यह कानून का उपहास होगा यदि कोई यह माने कि चूंकि प्रत्येक व्यक्ति राजमार्ग का उपयोग करता है, इसलिए उसका अन्य ट्रक चालकों के साथ समान वाद-कारण है।”
  • गोविंदराव आत्मारामजी वारजुरकर बनाम महाराष्ट्र राज्य में बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना था कि यदि दो याचिकाकर्ता अपने अलग-अलग कारोबार के संबंध में व्यथित हैं, तो वह याचिका दो व्यक्तियों द्वारा दायर संयुक्त याचिका नहीं, बल्कि एक में मिलाई गई दो याचिकाएं मानी जाएंगी और अलग-अलग फीस देनी होगी।
  • द प्रमोटर्स एंड बिल्डर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य और मोहम्मद उस्मान अब्दुल जब्बार बनाम भारत संघ में खंडपीठ ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि जब कोई संस्था अपने सदस्यों के अधिकारों के लिए याचिका दायर करे, तो सदस्यों की सूची मांगी जाए और प्रत्येक सदस्य के अनुसार फीस प्रमाणित की जाए।
  • संतोष नारायण गायकवाड़ मामले में खंडपीठ ने स्पष्ट किया था कि यद्यपि कानूनी संस्थाओं (ज्यूरिस्टिक पर्सन्स) से प्रति सदस्य फीस नहीं ली जा सकती, लेकिन यदि कोई संघ या व्यक्तियों का समूह ऐसी राहत मांगता है जिससे प्रत्येक सदस्य को व्यक्तिगत लाभ मिलता है (जैसे 50 दुकानदारों द्वारा ध्वस्तीकरण रोकना या 50 कर्मचारियों द्वारा नियोक्ता के खिलाफ राहत मांगना), तो रजिस्ट्री प्रति सदस्य कोर्ट फीस की मांग कर सकती है।
  • मछिंद्र रामभाऊ चव्हाण मामले को अलग बताते हुए अदालत ने कहा कि उस मामले में 227 शिकायतकर्ताओं ने औद्योगिक अदालत के एक ही आदेश के खिलाफ शिकायत की थी, जहां उनका वाद-कारण साझा था और वे अलग याचिकाएं दायर करने के हकदार नहीं थे।
  • इसके अलावा अदालत ने पटना हाईकोर्ट के शिवशंकर पांडे बनाम भारत संघ, झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ के बिनोद कुमार बनाम झारखंड राज्य, कर्नाटक हाईकोर्ट के मेसर्स गेर्ब वाइब्रेशन कंट्रोल सिस्टम बनाम असिस्टेंट लेबर कमिश्नर, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के अमरावती राजधानी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और इलाहाबाद हाईकोर्ट के उमेश चंद विनोद कुमार के फैसलों का भी संज्ञान लिया, जिनमें यह स्थापित किया गया है कि व्यक्तिगत अधिकारों के मामलों में अलग-अलग फीस देनी होती है।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

आवेदक के वैधानिक व्याख्या संबंधी तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि प्रविष्टि 1(f)(ii) में “प्रति याचिकाकर्ता” शब्द न होने का अर्थ यह नहीं है कि कई लोग मिलकर एक ही फीस पर याचिका दायर कर सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम सामान्यतः एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका की कल्पना करता है, जबकि कई लोगों को एक साथ याचिका दायर करने की अनुमति देना अदालतों द्वारा दी गई एक व्यावहारिक सुविधा मात्र है:

“संयुक्त याचिका दायर करने से समान स्थिति वाले याचिकाकर्ताओं द्वारा कई अलग-अलग याचिकाएं दायर करने में लगने वाला अतिरिक्त खर्च बचता है। इससे कागज, जगह और मेहनत की भी बचत होती है। इस प्रकार, हाईकोर्ट किसी दिए गए मामले में समान स्थिति वाले कई याचिकाकर्ताओं को संयुक्त याचिका दायर करने की अनुमति दे सकता है। वादकारियों को दी गई यह सुविधा कोर्ट फीस के भुगतान से बचने का जरिया नहीं बन सकती।”

वित्तीय कानूनों की सख्त व्याख्या के तर्क पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:

“लागत, स्थान, कागज आदि की बचत के लिए कई व्यक्तियों को एक याचिका में शामिल होने की अनुमति देकर हाईकोर्ट सरकारी खजाने को कोर्ट फीस का नुकसान नहीं पहुंचा सकता। विधायिका की मंशा यह है कि जब किसी याचिकाकर्ता द्वारा याचिका दायर की जाए, तो उसे कोर्ट फीस अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 1(f)(ii) में निर्धारित फीस का भुगतान करना होगा। कई व्यक्तियों द्वारा एकल याचिका दायर करने की अनुमति अदालतों द्वारा दी गई एक रियायत है और ऐसी अनुमति देते समय विधायी उद्देश्य को विफल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।”

जस्टिस मरने ने कोर्ट फीस तय करने के लिए स्पष्ट कानूनी मापदंड तय करते हुए कहा:

“मेरी राय में, कोर्ट फीस अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 1(f)(ii) के तहत संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के अंतर्गत दायर याचिकाओं या आवेदनों पर कोर्ट फीस के भुगतान का मुद्दा ‘व्यक्तिगत वाद-कारण बनाम समान वाद-कारण’ अथवा ‘साझा हित बनाम व्यक्तिगत हित’ के परीक्षण के आधार पर तय किया जाना चाहिए।”

अदालत ने स्थिति स्पष्ट करने के लिए व्यावहारिक उदाहरण भी दिए:

  • जहां केवल एक कोर्ट फीस लगेगी: यदि किसी दीवानी मुकदमे में 10 वादी हैं और वे निचली अदालत के स्थगन आदेश के खिलाफ अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट आते हैं; या सार्वजनिक भूमि पर अवैध निर्माण रोकने के लिए कई नागरिक नगर निगम के खिलाफ जनहित में रिट याचिका दायर करते हैं; अथवा किसी हाउसिंग सोसायटी के कई सदस्य प्रबंध समिति को अयोग्य ठहराने के लिए संयुक्त याचिका दायर करते हैं। ऐसे मामलों में वाद-कारण साझा होता है और किसी याचिकाकर्ता को अलग से कोई व्यक्तिगत वित्तीय लाभ नहीं मिलता, इसलिए एक ही कोर्ट फीस मान्य होगी।
  • जहां प्रति याचिकाकर्ता कोर्ट फीस अनिवार्य होगी: यदि किसी भर्ती परीक्षा के पात्रता नियमों को 10 अभ्यर्थी चुनौती देते हैं जिससे प्रत्येक को व्यक्तिगत रूप से नौकरी का अवसर मिलना हो; कर्मचारी व्यक्तिगत रूप से नियमितीकरण या बकाया वेतन की मांग करते हैं; अथवा कई पेंशनभोगी अपनी व्यक्तिगत पेंशन में बढ़ोतरी और एरियर की मांग करते हुए संयुक्त याचिका लाते हैं।
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अदालत का निर्णय

वर्तमान मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि याचिका में शामिल 11 पेंशनभोगियों ने किसी संगठन के जरिए नहीं, बल्कि सीधे संयुक्त रूप से याचिका दायर की थी। उन सभी की मांग अधिक पेंशन और एरियर के व्यक्तिगत भुगतान की थी। यदि याचिका स्वीकार होती, तो सभी 11 लोगों को अलग-अलग व्यक्तिगत वित्तीय लाभ प्राप्त होता। इसलिए, प्रत्येक याचिकाकर्ता के लिए अलग कोर्ट फीस चुकाना कानूनी रूप से अनिवार्य था।

हाईकोर्ट ने अंतिम निष्कर्ष देते हुए स्पष्ट किया:

“तदनुसार यह स्पष्ट किया जाता है कि जब संयुक्त याचिका में याचिकाकर्ताओं के व्यक्तिगत वाद-कारण को उठाया जाता है, तो संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत दायर याचिका पर कोर्ट फीस अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 1(f)(ii) के तहत कोर्ट फीस ‘प्रति याचिका’ नहीं, बल्कि ‘प्रति याचिकाकर्ता’ देय होगी। जब याचिका के परिणाम से याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से लाभ मिलता हो, तो ‘प्रति याचिकाकर्ता’ अलग कोर्ट फीस चुकानी होगी। केवल उन्हीं मामलों में जहां कई याचिकाकर्ताओं (चाहे व्यक्तिगत रूप से या किसी संघ के माध्यम से) द्वारा दायर याचिका में ‘समान’ या ‘साझा’ कारण उठाया जाता है, कोर्ट फीस का एक सेट पर्याप्त होगा।”

इन निर्देशों और टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अंतरिम आवेदन का निस्तारण कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सत्यम ए. सुराणा बनाम बॉम्बे हाईकोर्ट, रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 9463/2026 में अंतरिम आवेदन (स्टाम्प) संख्या 22879/2026
पीठ: जस्टिस संदीप वी. मरने
निर्णय की तिथि: 25 अगस्त 2026

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