नाबालिग के सर्वोत्तम हित में बर्थ सर्टिफिकेट में जैविक पिता की जगह सौतेले पिता का नाम दर्ज किया जा सकता है: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में नगर पालिका अधिकारियों को एक नाबालिग बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट में उसके सौतेले पिता का नाम जोड़ने और उपनाम (सरनेम) बदलने के लिए एक ‘ऐडेंडम’ (परिशिष्ट) जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि समाज अब आगे बढ़ चुका है और जब बच्चे का सर्वोत्तम हित जुड़ा हो, तो आधिकारिक रिकॉर्ड में जैविक पिता का नाम बनाए रखने की कोई कानूनी या व्यावहारिक बाध्यता नहीं है। जस्टिस राजा बसु चौधरी ने मौखिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि जैविक पिता ने अपनी सभी जिम्मेदारियों से खुद को अलग कर लिया है, तो बच्चे की मां कानूनी प्रावधानों के तहत अपने नाबालिग बेटे के बर्थ सर्टिफिकेट में संशोधन की मांग करने की पूरी हकदार है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता का पहला विवाह 25 अप्रैल 2012 को हुआ था और इस वैवाहिक रिश्ते से एक बेटे का जन्म हुआ। बाद में दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध समाप्त हो गए और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13बी के तहत हुगली जिला जज की अदालत ने 8 अक्टूबर 2021 को आपसी सहमति से तलाक की डिक्री पारित कर दी।

तलाक के बाद याचिकाकर्ता ने 6 मार्च 2022 को दूसरा विवाह किया, जिसका विधिवत पंजीकरण विवाह पंजीयक कार्यालय में कराया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हुगली के कार्यपालक मजिस्ट्रेट (एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) के समक्ष एक हलफनामा दाखिल किया और 22 जुलाई 2022 को पूर्व बर्धमान नगर पालिका के चेयरमैन के समक्ष आवेदन दिया। इस आवेदन में मांग की गई कि उसके नाबालिग बेटे के बर्थ सर्टिफिकेट में जैविक पिता के नाम की जगह सौतेले पिता का नाम और नया सरनेम दर्ज कर एक नया सर्टिफिकेट जारी किया जाए। नगर पालिका अधिकारियों द्वारा इस पर कोई कार्रवाई न किए जाने पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि बच्चा लगातार अपनी मां के साथ उसके वर्तमान वैवाहिक घर में रह रहा है और वर्तमान पति के बेटे के रूप में ही बड़ा हो रहा है। दोनों मिलकर बच्चे की देखरेख कर रहे हैं।

यह भी कहा गया कि चूंकि बच्चे के जैविक पिता (प्रतिवादी संख्या 6) ने अपनी सभी जिम्मेदारियों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है, इसलिए बर्थ सर्टिफिकेट में उनका नाम लगातार बना रहने से बढ़ते हुए बच्चे पर प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक असर पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में रिकॉर्ड में संशोधन करना बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने मुकेश अंबानी, परिवार के सदस्यों को जेड-प्लस सुरक्षा प्रदान करने के लिए निर्देश दिया

अदालती कार्यवाही और चैंबर में बातचीत

हाईकोर्ट ने पहली बार इस याचिका पर 26 सितंबर 2025 को सुनवाई की थी। जैविक पिता पर नोटिस की तामील न हो पाने के कारण मामले को स्थगित किया गया। बाद में अखबार में विज्ञापन के जरिए नोटिस तामील कराने की प्रक्रिया पूरी की गई और 22 जुलाई 2026 को इस संबंध में हलफनामा पेश किया गया।

22 जुलाई 2026 के आदेश के तहत अदालत ने याचिकाकर्ता को विवाह प्रमाण पत्र रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति दी और मामले को चैंबर में बच्चे से बातचीत के लिए नियत किया। जस्टिस राजा बसु चौधरी ने वस्तुस्थिति को समझने के लिए चैंबर में दोनों अधिवक्ताओं की मौजूदगी में नाबालिग बच्चे और अभिभावकों से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की।

READ ALSO  पार्थ चटर्जी उस बच्चे की वित्तीय जिम्मेदारी लेने के लिए सहमत हुए जिसे अर्पिता मुखर्जी गोद लेना चाहती थीं: ईडी

हाईकोर्ट की टिप्पणी और कानूनी विश्लेषण

कानूनी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए अदालत ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 15 का संदर्भ दिया, जो रजिस्टर में दर्ज प्रविष्टियों में सुधार या बदलाव का अधिकार देती है। इसके अलावा हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले अकेला ललिता बनाम कोंडा हनुमंत राव (2022 एससीसी ऑनलाइन एससी 928) का भी उल्लेख किया, जिसमें मां को अपने बच्चे के उपनाम और पहचान के निर्धारण का अधिकार दिया गया है।

जस्टिस राजा बसु चौधरी ने अपने आदेश में कहा:

“संबंधित पक्षों के विद्वान वकीलों को सुनने के बाद, याचिकाकर्ता के अनुरोध पर विचार करते हुए और यह देखते हुए कि समाज आगे बढ़ चुका है और आज की दुनिया में रजिस्टर में जैविक पिता का नाम बनाए रखना या बच्चे का पालन-पोषण करने के लिए एकल अभिभावक होने अथवा अकेले मां द्वारा नाबालिग बच्चे का उपनाम तय करने के संबंध में पुराना रुख रखना अब आवश्यक नहीं है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘अकेला ललिता बनाम कोंडा हनुमंत राव’ (2022 एससीसी ऑनलाइन एससी 928) के फैसले में भी मान्यता दी गई है; साथ ही जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 15 भी जन्म और मृत्यु रजिस्टर में प्रविष्टि में सुधार का प्रावधान करती है, मेरा मानना है कि इस मामले के विशिष्ट तथ्यों में याचिकाकर्ता अपने नाबालिग बेटे के बर्थ सर्टिफिकेट में बदलाव कराने की हकदार है, जो पहले नगर पालिका अधिकारियों द्वारा जारी किया गया था। रिकॉर्ड में ऐसा बदलाव, मेरी दृष्टि में, नाबालिग बच्चे के सर्वोत्तम हित के लिए आवश्यक है।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि वर्तमान में यह बदलाव बच्चे के कल्याण के लिए जरूरी है, लेकिन चूंकि बच्चा अभी नाबालिग है, इसलिए बालिग होने पर वह अपनी स्वतंत्र राय रखने का अधिकार रखेगा।

READ ALSO  आवारा कुत्तों का मामला: मुख्य न्यायाधीश ने तीन-न्यायाधीशों की नई पीठ गठित की, सुनवाई कल

हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश

रिट याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने नगर पालिका अधिकारियों को निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. नगर पालिका अधिकारी पहले से जारी बर्थ सर्टिफिकेट में नाबालिग बच्चे के सौतेले पिता का नाम शामिल करते हुए एक ‘ऐडेंडम’ (परिशिष्ट) जारी करें।
  2. ऐडेंडम जारी करते समय बच्चे के उपनाम (सरनेम) में भी आवश्यक संशोधन किया जाए।
  3. जारी किए जाने वाले नए दस्तावेज में पहले जारी किए गए सर्टिफिकेट का सीरियल नंबर और जारी करने की तारीख जैसे विवरण स्पष्ट रूप से दर्ज होने चाहिए।
  4. संशोधित सर्टिफिकेट जारी करने का यह फैसला नाबालिग बच्चे के बालिग होने पर उसके द्वारा चुने जाने वाले विकल्प (एक्सरसाइज ऑफ ऑप्शन) के अधीन रहेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती बर्णाली घोष (कर्मकार) बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीए 21054 / 2025
पीठ: जस्टिस राजा बसु चौधरी
निर्णय की तिथि: 18 अगस्त 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles