जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक अपील की कार्यवाही को सिर्फ इस आधार पर स्थगित नहीं किया जा सकता कि दोषी “एडजस्टमेंट डिसऑर्डर विद डिप्रेस्ड मूड” से पीड़ित है। अदालत ने टिप्पणी की कि अपील की सुनवाई के दौरान यदि कानूनी प्रतिनिधित्व उपलब्ध है, तो दोषी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने और बहस करने की आवश्यकता नहीं होती। जस्टिस राहुल भारती की एकल पीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई टालने से इनकार करने वाले सत्र अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता हकीम जफ्फार अहमद को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (सिटी जज), श्रीनगर की अदालत ने 10 सितंबर 2025 को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया था। यह मामला 40 लाख रुपये के चेक बाउंस होने से जुड़ा था।
इस दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, श्रीनगर की अदालत में आपराधिक अपील दायर की। अपीलीय कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता ने मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देते हुए सुनवाई टालने (डिफरमेंट) के लिए एक आवेदन प्रस्तुत किया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 30 जून 2026 को दिए अपने आदेश के जरिए इस अर्जी को खारिज कर दिया। निचली अपीलीय अदालत के इसी आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट के समक्ष दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील असमा रशीद ने कहा कि याचिकाकर्ता एक मनोरोगी (साइकियाट्रिक पेशेंट) है। उन्होंने अदालत से समय मांगते हुए दलील दी कि याचिकाकर्ता के मानसिक स्वास्थ्य की सटीक स्थिति से संबंधित मेडिकल सर्टिफिकेट प्राप्त करने में कम से कम एक महीने का समय लगेगा।
याचिकाकर्ता की वकील ने मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, गवर्नमेंट साइकियाट्रिक डिजीज हॉस्पिटल, काहती दरवाजा, रैनावाड़ी, श्रीनगर द्वारा 2 अप्रैल 2026 को जारी “इल्नेस सर्टिफिकेट” (सर्टिफिकेट संख्या: PSY/MB/CERT/2026/180) के आधार पर याचिका पर विचार करने का आग्रह किया। इस सर्टिफिकेट में याचिकाकर्ता को “एडजस्टमेंट डिसऑर्डर विद डिप्रेस्ड मूड” से पीड़ित बताया गया था।
वहीं, प्रतिवादी की ओर से वकील आसिफ अहमद भट पेश हुए।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत याचिकाकर्ता के वकील को ऐसा मेडिकल सर्टिफिकेट पेश करने का मौका देने को तैयार थी, जिससे यह साबित हो सके कि उसकी मानसिक स्थिति उसे कानूनी मामलों सहित जीवन के सभी दैनिक कामकाज निपटाने में असमर्थ बनाती है। हालांकि, मौजूदा बीमारी प्रमाण पत्र के आधार पर याचिकाकर्ता को अपीलीय कार्यवाही से बचने की छूट नहीं दी जा सकती।
अपीलीय कार्यवाही के स्वरूप और कानूनी प्रतिनिधित्व की भूमिका पर जोर देते हुए जस्टिस राहुल भारती ने टिप्पणी की:
“अपील कोई ऐसा मामला नहीं है जिसमें दोषी को खुद उपस्थित होकर बहस करनी होती है।”
अदालत ने रेखांकित किया कि अपील में याचिकाकर्ता को वकील महबूब सोफी की कानूनी सहायता उपलब्ध थी। पीठ ने कहा:
“इस तथ्य को देखते हुए कि याचिकाकर्ता को अपनी अपील में अधिवक्ता श्री महबूब सोफी की सहायता प्राप्त थी और है, इसलिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, श्रीनगर की अदालत के समक्ष लंबित अपील में बहस करने और उस अदालत के निर्णय पर विश्वास रखने के लिए अधिवक्ता श्री महबूब सोफी की ओर से कोई अक्षमता नहीं थी और न ही है।”
याचिकाकर्ता की कथित मानसिक स्थिति पर अदालत ने आगे कहा:
“इस अदालत को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, श्रीनगर की अदालत द्वारा ‘एडजस्टमेंट डिसऑर्डर विद डिप्रेस्ड मूड’ से पीड़ित होने के आधार पर अपील की सुनवाई टालने की याचिका खारिज करने में कोई अवैधता नजर नहीं आती। अदालत इस संभावना से इनकार नहीं कर सकती कि याचिकाकर्ता की उदासी (डिप्रेस्ड मूड) इस तथ्य से जुड़ी हो सकती है कि उसे 40 लाख रुपये के चेक बाउंस होने से जुड़े नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराया गया है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, श्रीनगर द्वारा पारित आदेश में किसी भी प्रकार की अवैधता या त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: हकीम जफ्फार अहमद बनाम रतन सिंह
वाद संख्या: सीएम(5285/2026), सीएम(एम) 353/2026 में, सीएम(5286/2026) कैविएट 1890/2026
पीठ: जस्टिस राहुल भारती
निर्णय की तिथि: 19.08.2026

