दिल्ली में हाल ही में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और भड़की हिंसा की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति के पुनर्गठन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित राहत देने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि यह समिति सीधे सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में काम करेगी, इसलिए सभी पक्षों को इसे अपनी जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाने देनी चाहिए।
अदालत में तीखी बहस और केंद्र का विरोध
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहाना की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने यह मामला उठाया। उन्होंने समिति के मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताते हुए पुनर्गठन से जुड़ी अर्जी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। वकील प्रशांत भूषण ने भी इस मांग का समर्थन करते हुए कहा कि यह सभी याचिकाकर्ताओं की साझा चिंता है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अर्जी को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि अदालत को राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। तुषार मेहता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता खुद अपनी पसंद के जजों के नाम समिति के प्रमुख के तौर पर प्रस्तावित कर रहे हैं और उन्हें हर प्रक्रिया से शिकायत रहती है।
मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत समितियों के लिए वकीलों या पक्षकारों द्वारा जजों के नाम सुझाए जाने को सही नहीं मानती। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि मुख्य मामला अदालत के पास लंबित है और समिति जो भी काम करेगी, वह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में ही होगा। उन्होंने सभी वकीलों को जांच प्रक्रिया में सहयोग करने का निर्देश दिया।
जांच समिति का गठन और उसकी जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इस पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया था। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आर सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।
समिति के अन्य सदस्यों में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शलिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व डीजीपी एल आर बिश्नोई शामिल हैं।
इस जांच समिति को प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, पेलेट गन और आंसू गैस के इस्तेमाल सहित पुलिस बल के अत्यधिक प्रयोग के आरोपों की पड़ताल करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही समिति उन आरोपों की भी जांच करेगी जिनमें प्रदर्शनकारियों पर पुलिस और सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा करने के आरोप लगाए गए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा था कि समिति के सदस्यों के अनुभव, विशेषज्ञता और विविधता को ध्यान में रखते हुए इसका गठन किया गया है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि और मंत्री का इस्तीफा
यह न्यायिक जांच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन से जुड़ी हुई है। सीजेपी का यह प्रदर्शन 20 जून को नई दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ था, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई थी।
20 जुलाई को सीजेपी के नेतृत्व में संसद भवन की ओर निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तीखी झड़पें हुईं। संसद तक पहुंचने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। इसके बाद यह विरोध प्रदर्शन देश के कई अन्य शहरों में भी फैल गया।
करीब एक महीने तक चला यह आंदोलन 25 जुलाई को तब समाप्त हुआ जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और केंद्र सरकार ने सीजेपी की अन्य सभी मांगों को स्वीकार कर लिया।

