युगांडा में जन्मे व्यक्ति को मिलेगा भारतीय पासपोर्ट, बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज किया पासपोर्ट कार्यालय का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट ने युगांडा में जन्मे 61 वर्षीय एक व्यक्ति को भारतीय पासपोर्ट देने से इनकार करने के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की मां और दादा-दादी का जन्म आजादी से पहले गोवा में हुआ था, जिसके आधार पर कानूनन उन्हें भारत की नागरिकता प्राप्त होती है।

नया आवेदन और समयबद्ध समीक्षा का निर्देश

जस्टिस वाल्मीकि मेनेजिस और जस्टिस अमित एस. जमसंडेकर की पीठ ने 19 अगस्त को यह आदेश जारी किया। हाईकोर्ट ने पासपोर्ट कार्यालय द्वारा 7 मई 2025 को जारी किए गए उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता का आवेदन खारिज कर दिया गया था।

इसके साथ ही अदालत ने दक्षिण गोवा निवासी याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ नया पासपोर्ट आवेदन जमा करें। क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को आदेश दिया गया है कि वे नागरिकता पर अदालत के निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए और पुराने फैसले से प्रभावित हुए बिना, तीन सप्ताह के अंदर इस नए आवेदन पर निर्णय लें।

1962 के नागरिकता आदेश का कानूनी आधार

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यह पूरा मामला ‘गोवा, दमन और दीव (नागरिकता) आदेश, 1962’ के कानूनी प्रावधानों पर आधारित है। इस नियम के तहत 20 दिसंबर 1961 से पहले गोवा में जन्मे किसी भी व्यक्ति, या जिनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का जन्म उस तारीख से पहले गोवा में हुआ था, उन्हें 20 दिसंबर 1961 से भारत का नागरिक माना जाता है।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के माता-पिता के विवाह पंजीकरण दस्तावेजों का अवलोकन किया। इस रिकॉर्ड से साबित हुआ कि उनके माता-पिता और दादा-दादी का जन्म दिसंबर 1961 में गोवा के भारत में विलय से पहले हुआ था। विवाह पंजीकरण के समय पिता की उम्र 25 वर्ष दर्ज थी और वे 22 अप्रैल 1956 से तालिगांव पारिश के निवासी थे। उनके दादा पोंडा तालुका के क्वेला (कावलेम) के मूल निवासी थे, जबकि विवाह के समय मां की उम्र 21 वर्ष दर्ज थी।

युगांडा में जन्म और दस्तावेजों का सत्यापन

याचिकाकर्ता का जन्म 3 मई 1964 को युगांडा के टोरोरो शहर में हुआ था। उनके जन्म प्रमाण पत्र में मां की नागरिकता “भारतीय” और पिता की “पुर्तगाली” दर्ज की गई थी, क्योंकि गोवा के भारत में विलय के दौरान उनके माता-पिता युगांडा में रह रहे थे।

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पासपोर्ट प्राधिकारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता सोमनाथ कार्पे ने दलील दी थी कि याचिकाकर्ता शुरुआत में अपने माता-पिता के गोवा में जन्म लेने का प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहे थे, इसलिए विदेश में जन्म होने के कारण उनकी नागरिकता सिद्ध नहीं मानी गई।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि कंपाला स्थित भारतीय उच्चायोग और युगांडा के विदेश मंत्रालय के बीच हुए आधिकारिक पत्राचार से टोरोरो में हुए इस जन्म पंजीकरण की पूरी पुष्टि होती है। अदालत ने इस आधार पर जन्म प्रमाण पत्र को पूरी तरह प्रामाणिक दस्तावेज स्वीकार किया। अदालत में याचिकाकर्ता का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता सी. ए. कौटिन्हो और अधिवक्ता इवान संतीमानो ने रखा। सभी साक्ष्यों को देखने के बाद पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता का भारतीय नागरिकता का दावा कानूनी रूप से पूरी तरह सिद्ध होता है।

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