ओडिशा डीजीपी चयन मामला: सुप्रीम कोर्ट में अब 2 सितंबर को होगी सुनवाई, सरकार के जवाब का इंतज़ार

ओडिशा में नए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के चयन को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है। शीर्ष अदालत अब इस मामले पर 2 सितंबर को सुनवाई करेगी। अदालत ने यह कदम राज्य सरकार का औपचारिक जवाब आधिकारिक रिकॉर्ड पर उपलब्ध न होने के कारण उठाया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष राज्य सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि ओडिशा सरकार ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत कोई भी दलील सुनने से पहले सरकार के जवाब का अध्ययन करना चाहती है।

यूपीएससी पर 18 अगस्त तक चयन की रोक

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को आदेश दिया था कि वह 18 अगस्त तक ओडिशा के डीजीपी पद के लिए संभावित अधिकारियों की सूची को अंतिम रूप न दे। राज्य के निवर्तमान पुलिस प्रमुख वाई. बी. खुरानिया का कार्यकाल 16 अगस्त को समाप्त होना तय था।

कनिष्ठ अधिकारी को शामिल करने का आरोप

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याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने पिछली सुनवाइयों में तर्क दिया था कि राज्य प्रशासन नियमों का उल्लंघन करते हुए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) रैंक के एक जूनियर अधिकारी को पदोन्नत कर डीजीपी पद के योग्य बनाने का प्रयास कर रहा है।

चिदंबरम ने चयन प्रक्रिया की समय-सारणी साझा करते हुए बताया कि ओडिशा सरकार ने शुरुआत में अप्रैल में अधिकारियों का एक पैनल भेजा था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। इसके बाद मई में भेजी गई दूसरी सूची में तीन डीजीपी स्तर और आठ एडीजीपी स्तर के अधिकारियों के नाम शामिल किए गए।

वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि यूपीएससी ने योग्य अधिकारियों का मूल्यांकन करने के लिए 7 अगस्त को बैठक तय की थी, लेकिन राज्य सरकार ने उस बैठक से ठीक पहले पैनल वापस ले लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सेवारत वरिष्ठ अधिकारी सीधे सरकार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने से हिचकिचाते हैं, इसीलिए इस मामले को जनहित याचिका के जरिए अदालत के समक्ष लाया गया।

मामले पर टिप्पणी करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पूर्व आदेशों के अनुसार, यदि चयन प्रक्रिया में निर्देशों का पालन नहीं होता है, तो यूपीएससी सीधे अदालत का रुख करने के लिए बाध्य है।

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प्रकाश सिंह मामले के अनिवार्य दिशानिर्देश

कानूनी चुनौती का मुख्य आधार 2006 के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह मामले में तय किए गए दिशानिर्देश हैं। इन नियमों के तहत, राज्य सरकार को यूपीएससी द्वारा सेवा अवधि, प्रदर्शन रिकॉर्ड और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर तैयार किए गए तीन सबसे वरिष्ठ अधिकारियों के पैनल में से ही नए पुलिस प्रमुख का चयन करना होता है।

इसके साथ ही, इन न्यायिक दिशानिर्देशों में यह भी अनिवार्य किया गया है कि शीर्ष पद पर नियुक्त अधिकारी को कम से कम दो साल का निश्चित कार्यकाल मिले, चाहे उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख बीच में ही क्यों न आ जाए।

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