अंकिता भंडारी मामला: पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ को हाईकोर्ट से आंशिक राहत, दो एफआईआर रद्द, दो मामलों में जांच जारी रहेगी

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़ी आपत्तिजनक ऑडियो और वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर साझा करने के मामले में पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ को आंशिक राहत दी है। कोर्ट ने राठौड़ के खिलाफ दर्ज कुल चार प्राथमिकियों (एफआईआर) में से दो को रद्द कर दिया है, जबकि दो अन्य मामलों में पुलिस जांच जारी रखने का आदेश दिया है।

जस्टिस राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने साफ किया कि देहरादून में दर्ज दो एफआईआर पर पुलिस की जांच कानून के मुताबिक आगे बढ़ेगी। सुरेश राठौड़ ने अपने खिलाफ दर्ज चारों मामलों को राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद बताते हुए इन्हें खारिज करने के लिए याचिका दायर की थी।

हरिद्वार के मामलों में दोहरा संकट कानून लागू

हाईकोर्ट ने हरिद्वार जिले के बहादराबाद और झबरेड़ा थानों में दर्ज दो एफआईआर को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इन दोनों मामलों में लगाए गए आरोप बिल्कुल वैसे ही हैं, जैसे देहरादून के डालनवाला थाने में दर्ज मामले में थे।

अदालत ने पाया कि हरिद्वार के मामलों में शिकायत दर्ज कराने वाले लोग मुख्य पीड़ित नहीं थे। चूंकि इस घटना की मुख्य पीड़ित पहले ही देहरादून में अपनी शिकायत दर्ज करा चुकी थीं, इसलिए एक ही मामले में बार-बार एफआईआर दर्ज करना सही नहीं है। इसी कानूनी आधार पर कोर्ट ने दोहरा संकट (डबल जियोपार्डी) सिद्धांत के तहत हरिद्वार के दोनों मुकदमों को रद्द करने का फैसला सुनाया।

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देहरादून के मामलों में जारी रहेगी पुलिस जांच

दूसरी तरफ, हाईकोर्ट ने देहरादून के डालनवाला थाने में दर्ज दो एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया। ये शिकायतें भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव व उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत गौतम और आरती गौर नाम की महिला ने दर्ज कराई थीं।

अदालत ने कहा कि इन दोनों शिकायतों को पहली नजर में देखने पर संज्ञेय अपराध का मामला बनता है, जिसकी विस्तृत पुलिस जांच होनी आवश्यक है। सुनवाई के दौरान जस्टिस थपलियाल ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की छवि बिगाड़ने के उद्देश्य से सोशल मीडिया पर उसे किसी जघन्य अपराध से जोड़ना एक बेहद गंभीर विषय है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास किसी अपराध से जुड़े सबूत हैं, तो उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने के बजाय संबंधित कानूनी अधिकारियों और जांच एजेंसियों को सौंपना चाहिए। सोशल मीडिया का उपयोग जनहित के मुद्दों को उठाने के लिए होना चाहिए, न कि किसी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए।

साजिश और सुरक्षा का पहलू

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह पुलिस की जांच का विषय है कि इन ऑडियो-वीडियो क्लिपों को किसी राजनीतिक लाभ, विशेष उद्देश्य या किसी सुनियोजित साजिश के तहत साझा किया गया था या नहीं। जांच एजेंसियों को इस मामले की तह तक जाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए।

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इसके साथ ही, अदालत ने शिकायतकर्ता आरती गौर और दुष्यंत गौतम को यह छूट दी है कि यदि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर कोई खतरा महसूस होता है, तो वे पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और संबंधित जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) से संपर्क कर सकते हैं। पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे सुरक्षा खतरों का आकलन करें और जरूरत पड़ने पर दोनों को सुरक्षा मुहैया कराएं।

क्या है पूरा मामला

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यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ पर सोशल मीडिया पर कुछ मीडिया क्लिप साझा करने के आरोप लगे। इन क्लिपों में भाजपा नेता दुष्यंत गौतम को अंकिता भंडारी मामले से जुड़ा एक रसूखदार ‘वीआईपी’ बताया गया था। इसके अलावा, खुद को राठौड़ की दूसरी पत्नी बताने वाली उर्मिला सनावर के दावों के बाद आरती गौर का नाम भी इस पूरे घटनाक्रम में सामने आया था।

यह मामला मूल रूप से सितंबर 2022 का है, जब पौड़ी जिले के यमकेश्वर में स्थित वनंतरा रिजॉर्ट की 19 वर्षीय रिसेप्शनिस्ट अंकिता भंडारी की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में हाल ही में एक अदालत ने रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उसके दो कर्मचारियों, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को दोषी ठहराते हुए कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

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