अधीनस्थों की लापरवाही पर वरिष्ठ अधिकारियों की तय हो आपराधिक जवाबदेही, इलाहाबाद हाईकोर्ट की केंद्र से सिफारिश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों की आपराधिक जवाबदेही तय करने के लिए ‘सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (वरिष्ठों की जवाबदेही) का कानूनी ढांचा तैयार करने की सिफारिश की है। हाईकोर्ट का मानना है कि यदि वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों के भ्रष्टाचार, लापरवाही या गलतियों को रोकने अथवा उन्हें दंडित करने में नाकाम रहते हैं, तो उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए। बुधवार को जारी अपने एक आदेश में कोर्ट ने कहा कि लोक सेवकों को असीमित और बेलगाम अधिकार देने से कानून का शासन कमजोर होता है और अधिकारियों में जवाबदेही का डर खत्म हो जाता है।

यूपी के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय प्रसाद के आचरण पर कड़ी नाराजगी

हाईकोर्ट ने यह अहम टिप्पणी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (आईएएस) संजय प्रसाद के आचरण पर गहरी आपत्ति जताते हुए की। जस्टिस विनोद दिवाकर ने संजय प्रसाद को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि उन्होंने जानबूझकर और सोचे-समझे तरीके से अदालत के प्राधिकार व सम्मान को ठेस पहुंचाने का प्रयास किया है। इस रवैये को देखते हुए हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि संजय प्रसाद की सर्विस फाइल को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के माध्यम से कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) को भेजा जाए, ताकि भविष्य में उन्हें कोई भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपने से पहले उनकी प्रशासनिक योग्यता और उपयुक्तता की समीक्षा की जा सके।

झांसी की नाबालिग की बरामदगी से जुड़ा है पूरा मामला

यह पूरा मामला झांसी की मेघा रायकवार द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हेबियस कॉर्पस) से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता ने अपनी 15 वर्षीय बेटी को अवैध हिरासत से छुड़ाने के लिए कोर्ट से गुहार लगाई थी। हालांकि, स्थानीय पुलिस द्वारा नाबालिग लड़की को सुरक्षित बरामद कर उसके माता-पिता को सौंप दिए जाने के बाद कोर्ट ने इस याचिका का निपटारा कर दिया, लेकिन मामले में पुलिस की जांच के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किए।

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सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि स्थानीय पुलिस ने मुख्य आरोपी को बचाने के इरादे से केवल सह-आरोपियों के बयानों के आधार पर ही चार्जशीट दाखिल कर दी थी। कोर्ट ने पाया कि पुलिस की यह कार्रवाई ‘सुभाष चंद्र एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में हाईकोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन थी। इस ऐतिहासिक फैसले में हाईकोर्ट ने निर्देश दिए थे कि राज्य में सभी आपराधिक जांच वैज्ञानिक, निष्पक्ष और कानून सम्मत होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में अपील के नाम पर केवल समय टालने का प्रयास

इससे पहले, उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने 20 फरवरी 2026 को कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर दावा किया था कि राज्य सरकार ‘सुभाष चंद्र’ मामले के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। सरकार ने अनुरोध किया था कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) पर कोई फैसला नहीं आ जाता, तक तक हाईकोर्ट इस मामले में कोई नया आदेश जारी न करे।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इस हलफनामे के तीन महीने से अधिक का समय बीत जाने और मुख्य फैसले को आए एक साल से ज्यादा समय होने के बावजूद सरकार की तरफ से कोई भी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नहीं की गई। बेंच ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय प्रसाद द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील का केवल बहाना बनाया गया, ताकि अदालती आदेशों की लगातार की जा रही अवहेलना पर होने वाली कानूनी कार्रवाई और समीक्षा को टाला जा सके। यह न्याय पाने की कोई वास्तविक या गंभीर कोशिश नहीं थी।

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असीमित प्रशासनिक अधिकारों पर हाईकोर्ट का रुख

अपने आदेश में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल सेवा के अधिकारियों को मिलने वाले असीमित प्रशासनिक अधिकार कानून व्यवस्था और कानूनी निश्चितता के लिए ठीक नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों का यह पेशेवर और प्रशासनिक कर्तव्य है कि वे अपने अधीनस्थों के कामकाज और प्रदर्शन की जिम्मेदारी लें ताकि जनता को बेहतर सेवाएं मिल सकें। यदि वरिष्ठ अधिकारियों की लापरवाही या निगरानी की कमी के कारण विभाग में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, जानबूझकर तथ्यों को छिपाने या अदालती आदेशों की अवहेलना जैसी गंभीर घटनाएं होती हैं, तो इस विफलता को आपराधिक लापरवाही माना जाना चाहिए और इसके लिए वरिष्ठों पर ही आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए।इसी के मद्देनजर हाईकोर्ट ने डीओपीटी (DoPT) सचिव से इस संबंध में एक ठोस कानूनी सिद्धांत लागू करने की सिफारिश की है।

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