तकनीकी आधारों पर कोविड मुआवजे से इनकार नहीं कर सकती सरकार: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक कल्याणकारी राज्य में सरकार महज तकनीकी कमियों का हवाला देकर महामारी में अपनों को खोने वाले परिवारों को आर्थिक राहत से वंचित नहीं कर सकती। अदालत ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह दूसरी लहर के दौरान जान गंवाने वाले आठ मृतकों के परिजनों के खारिज दावों पर चार सप्ताह के भीतर पुनर्विचार करे। पात्रता सही पाए जाने पर प्रशासन को ‘बिहार कोविड-19 सहायता योजना 2022’ के तहत प्रत्येक पीड़ित परिवार को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि का भुगतान करना होगा।

जस्टिस आलोक कुमार की एकल पीठ ने 2 सितंबर को यह फैसला आठ प्रभावित नागरिकों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। इन सभी मामलों में मृतकों की कोरोना संक्रमण से मौत 20 अप्रैल से 20 मई 2021 के बीच अस्पताल में इलाज या होम आइसोलेशन के दौरान हुई थी।

लैब की मान्यता न होने पर खारिज हुए थे दावे

यह विवाद पटना जिले के मोकामा और मरांची इलाके के आठ निवासियों—अनीश सिंह, गीता देवी, माधुरी देवी, मणि भूषण सिंह, रीमा कुमारी, विशाखी देवी, अनंत कुमार शर्मा और कृष्ण मुरारी की ओर से दायर याचिकाओं के बाद सामने आया था। प्रशासनिक जांच में इन दावों को इस आधार पर निरस्त कर दिया गया था कि जिस निजी जांच केंद्र से कोविड टेस्ट कराए गए थे, वह आरटी-पीसीआर, रैपिड एंटीजन (आरएटी) या ट्रूनेट जांच के लिए बिहार सरकार से विधिवत अधिकृत नहीं था।

राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता के. के. सिन्हा ने अदालत को बताया कि दावों की पड़ताल दो स्तरों पर की गई थी। पहले पटना के सिविल सर्जन की अध्यक्षता वाली जिला स्तरीय समिति ने 3 फरवरी 2023 को इन आवेदनों को खारिज किया। इसके बाद राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक द्वारा गठित तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति ने 18 जुलाई 2024 को दोबारा समीक्षा के बाद पूर्व फैसले को सही ठहराया। राज्य का तर्क था कि जांच केंद्र अधिकृत न होने के कारण यह प्रशासनिक निर्णय पूरी प्रक्रिया के तहत लिया गया था।

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दूसरी तरफ, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने मृत्यु प्रमाण पत्र, डॉक्टरों के पर्चे और बैंक खाते के विवरण जैसे सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकार ने न तो जांच रिपोर्ट के फर्जी होने का कोई आरोप लगाया और न ही संक्रमण से मौत के तथ्य पर कोई संदेह जताया। इसके अलावा, राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा संकलित और जारी की गई आधिकारिक कोविड मृत्यु सूची में भी इन मृतकों के नाम क्रमांक संख्या 11, 14, 15, 18, 19, 23, 24 और 37 पर पहले से दर्ज थे।

कल्याणकारी राज्य में संवैधानिक दायित्व सर्वोपरि

हाईकोर्ट ने राज्य प्रशासन के रुख को पूरी तरह खारिज करते हुए रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत सरकार पर जनस्वास्थ्य संकट के समय नागरिकों के कल्याण की रक्षा करने का बाध्यकारी कर्तव्य है। पीठ ने टिप्पणी की कि संविधान राज्य को मानवीय पीड़ा के मूक दर्शक के रूप में नहीं, बल्कि जनता की गरिमा और सुरक्षा के सक्रिय संरक्षक के तौर पर देखता है। ऐसी स्थिति में वैध दावों को केवल तकनीकी आपत्तियों के सहारे नहीं रोका जा सकता।

राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों में लैब की मान्यता का बंधन नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ‘गौरव कुमार बंसल बनाम भारत संघ एवं अन्य’ मामले का हवाला दिया, जो आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 12(iii) के तहत मुआवजे के मानकों को तय करता है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, आईसीएमआर और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा सितंबर 2021 में जारी मार्गदर्शिकाओं के आधार पर राहत तय की थी।

राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार, आरटी-पीसीआर, मॉलिक्यूलर टेस्ट, रैपिड एंटीजन टेस्ट अथवा अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान डॉक्टर द्वारा प्रमाणित कोविड संक्रमण के आधार पर होने वाली मौतों को मुआवजे का पात्र माना गया है। इसमें पॉजिटिव जांच या क्लीनिकल पहचान के 30 दिनों के भीतर हुई मौतें, 30 दिन से अधिक लंबे इलाज के दौरान हुई मृत्यु, औपचारिक मेडिकल प्रमाण पत्र वाली मौतें और संक्रमण के 30 दिनों के भीतर की गई आत्महत्याएं भी शामिल हैं।

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जस्टिस आलोक कुमार ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले या केंद्र सरकार की गाइडलाइंस में कहीं भी यह शर्त नहीं रखी गई है कि जांच केंद्र का राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त या सूचीबद्ध होना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि मुआवजे की मूल कसौटी संक्रमण का तथ्य, उसकी समयावधि और तत्कालीन चिकित्सकीय दस्तावेज हैं, न कि जांच करने वाली प्रयोगशाला का प्रशासनिक दर्जा।

मोकामा में जांच सुविधाओं का अभाव और न्यायिक नजीर

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अदालत ने इसी तरह के एक पूर्व मामले ‘सुशीला देवी एवं मनोज कुमार बनाम बिहार राज्य एवं अन्य’ के अपने फैसले को भी आधार बनाया। उस मामले में यह तथ्य रिकॉर्ड पर आया था कि महामारी के चरम दौर में मोकामा क्षेत्र में राज्य सरकार की अपनी कोई अधिकृत कोविड जांच लैब मौजूद ही नहीं थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब लोग जीवन-मरण के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे थे, तब उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे पहले सरकारी वेबसाइट पर जाकर अधिकृत लैब खोजें और फिर यातायात की भारी पाबंदियों के बीच दूर-दराज के केंद्रों तक जाएं। अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जब संक्रमण और मौत का तथ्य पूरी तरह निर्विवाद है, तब अनाधिकृत लैब के तकनीकी तर्क को जोड़ना राहत योजना के मूल कल्याणकारी उद्देश्य को विफल करना होगा।

पीठ ने संबंधित प्राधिकारियों को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से चार सप्ताह के भीतर सभी आठों दावों का त्वरित निपटारा करने का निर्देश दिया है।

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