इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाल न्यायशास्त्र को सुदृढ़ करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किशोरों की जमानत प्रक्रिया केवल औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह सकती। अदालत ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन्स) एक्ट, 2015 के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और चिल्ड्रन्स कोर्ट कानूनी रूप से बाध्य हैं कि वे कानून के उल्लंघन में आए बच्चे को जमानत पर रिहा करते समय पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण योजना की आवश्यकता की समीक्षा करें, व्यक्तिगत बाल देखरेख योजना तैयार करें और उसकी स्कूली शिक्षा सुनिश्चित करें।
जस्टिस अजय भनोट की एकल पीठ ने कासगंज की चिल्ड्रन्स कोर्ट द्वारा जमानत खारिज किए जाने के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने कहा कि यदि किसी बच्चे को जमानत के बाद बिना किसी सामाजिक व संस्थागत सहारे के छोड़ दिया जाए, तो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का सुधारात्मक उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। उत्तर प्रदेश में बाल देखरेख से जुड़े बुनियादी ढांचे की भारी कमी को देखते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि नियमों के बनने तक राज्य सरकार द्वारा संचालित सामान्य डे-स्कूलों और शिक्षकों को व्यक्तिगत देखरेख योजना के शैक्षिक घटकों को लागू करने के लिए ‘फिट इंस्टीट्यूशन’ और ‘फिट पर्सन’ के रूप में मान्यता दी जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन्स) एक्ट, 2015 (जेजे एक्ट, 2015) की धारा 101(5) के तहत दायर दो संबद्ध आपराधिक अपीलों पर आया।
मुख्य अपील कासगंज की चिल्ड्रन्स कोर्ट/विशेष जज (पॉक्सो एक्ट) द्वारा 3 जनवरी 2024 को पारित उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें नाबालिग अपीलकर्ता की जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी। यह मामला कासगंज के पटियाली थाने में आईपीसी की धारा 328, 363, 366, 376डी, 506, पॉक्सो एक्ट की धारा 5/6 और आईटी एक्ट की धारा 67ए के तहत दर्ज मुकदमे से जुड़ा था।
दूसरी संबद्ध अपील जालौन (उरई) के विशेष जज (पॉक्सो एक्ट) द्वारा 25 नवंबर 2024 को पारित जमानत अस्वीकृति आदेश के विरुद्ध दाखिल की गई थी, जो आईपीसी की धारा 376(3) और पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4(2) से संबंधित थी।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं के वकीलों और अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता किशोर हैं और वे जेजे एक्ट, 2015 तथा जेजे रूल्स, 2016 के तहत सभी वैधानिक संरक्षाओं और पुनर्वास व समाज में पुनः एकीकरण योजना के हकदार हैं। उन्होंने कहा कि पुनर्वास कार्यक्रम और स्कूली शिक्षा सुधारात्मक न्याय का मूल आधार हैं, जिन्हें जमानत याचिका पर निर्णय लेते समय ही लागू किया जाना चाहिए।
कासगंज के मुख्य मामले में मेरिट पर दलील देते हुए अपीलकर्ता के वकीलों ने कहा कि अभियोजन ने पीड़िता को झूठे तरीके से 15 वर्ष का नाबालिग दर्शाया, जबकि रिकॉर्ड में उसकी उम्र को लेकर गंभीर विरोधाभास हैं और वह वास्तव में बालिग है। यह भी कहा गया कि दोनों एक ही पड़ोस के थे और उनके बीच सहमति से प्रेम संबंध था, जिसका पीड़िता के परिजन विरोध कर रहे थे। प्राथमिकी दर्ज कराने में दो महीने की अकारण देरी हुई, पीड़िता कभी किसी बंधक स्थिति में नहीं रही, उसने कोई शोर नहीं मचाया और मंदिर में हुए विवाह में शामिल हुई जिसका वीडियो भी बना। इसके अलावा किसी नशीले पदार्थ या जबरन शारीरिक संबंध की चिकित्सकीय पुष्टि नहीं हुई, कोई आपत्तिजनक वीडियो बरामद नहीं हुआ और अपीलकर्ता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता ने अदालत को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार पुनर्वास और शिक्षा से जुड़े प्रावधानों को किसी भी रूप में विरोधी या शत्रुतापूर्ण मुकदमेबाजी के रूप में नहीं देखती। उन्होंने कहा कि राज्य सभी बच्चों का प्राकृतिक संरक्षक है और अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव द्वारा दाखिल हलफनामे से सामने आया कि पूरे राज्य में केवल तीन ‘फिट पर्सन’, तीन ‘फिट फैसिलिटी’ और 14 फॉस्टर केयर परिवार ही चिन्हित हैं। कासगंज और मैनपुरी जिलों में एक भी मान्यता प्राप्त फिट संस्था या व्यक्ति मौजूद नहीं था। राज्य ने यह तर्क भी रखा कि ‘फिट फैसिलिटी’ केवल 24 घंटे आवासीय देखभाल वाले संस्थानों को ही माना जा सकता है और गैर-आवासीय व्यवस्थाओं के लिए वित्तीय बजट का अभाव है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने बाल न्याय, जमानत के समय पुनर्वास की अनिवार्यता और संबंधित कानूनों के आपसी समन्वय पर विस्तृत विश्लेषण किया।
1. संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय आधार
अदालत ने रेखांकित किया कि बाल कल्याण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3), 21, 21-ए, 24, 39(ई), 39(एफ), 45 और 47 में गहराई से समाहित है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन और बीजिंग रूल्स जैसे अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज बच्चों के अधिकारों को सर्वोपरि स्थान देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के प्रताप सिंह बनाम झारखंड राज्य फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि घरेलू बाल कानूनों की व्याख्या अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुरूप की जानी चाहिए।
जितेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि “आपराधिक न्याय के पारंपरिक उद्देश्य, यानी प्रतिशोध और दमन को जुवेनाइल जस्टिस के पुनर्वास और सुधारवादी उद्देश्यों के आगे झुकना होगा।” अदालत ने बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि पुनर्वास ही बाल कानूनों की वास्तविक सफलता का पैमाना है।
2. जमानत के स्तर पर सुधारात्मक दायित्व
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेजे एक्ट की धारा 12 या धारा 101(5) के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए अदालतें ‘पेरेंट्स पैट्रियाई’ (संरक्षक) के रूप में कार्य करती हैं। अदालत ने टिप्पणी की:
“जहां आवश्यकता मौजूद हो, वहां भी यदि स्कूली शिक्षा और पुनर्वास व पुनः एकीकरण योजना या व्यक्तिगत बाल देखरेख योजना का अभाव रहता है, तो यह जमानत प्रक्रिया को विशुद्ध रूप से एक ऐसी न्यायिक प्रक्रिया बना देगा जो सुधारात्मक तत्वों से पूरी तरह विहीन होगी। जमानत प्रक्रिया में ऐसा संकुचित न्यायिक दृष्टिकोण जेजे एक्ट, 2015 और जेजे रूल्स, 2016 की कल्याणकारी मंशा को निष्फल कर देगा।”
अदालत ने कहा कि केवल जमानत मिल जाने से बच्चे के पुनर्वास या शिक्षा की जरूरत खत्म नहीं हो जाती, क्योंकि कानून के उल्लंघन में आने वाले बच्चे अक्सर प्रतिकूल सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, पारिवारिक विपन्नता, आघात या युवावस्था की नासमझी से घिरे होते हैं।
3. संबंधित कानूनों का एकीकृत ढांचा
हाईकोर्ट ने जेजे एक्ट 2015, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (आरटीई एक्ट), दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 (पीडब्ल्यूडी एक्ट) और मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 के परस्पर संबंधों का विश्लेषण किया।
अपने पूर्ववर्ती फैसले जुनैद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का संदर्भ लेते हुए अदालत ने कहा:
“अदालत का कार्य विभिन्न कानूनों को एक एकीकृत कानूनी ढांचे में पिरोकर समग्र और अंतर्निहित विधायी मंशा को प्राप्त करना है। इसके लिए विभिन्न वैधानिक संस्थाओं को एक साझा कानूनी छत्रछाया के नीचे लाना, उनके उद्देश्यों में तालमेल स्थापित करना और इन सभी प्राधिकरणों की संयुक्त कार्रवाई सुनिश्चित करना आवश्यक है।”
समावेशी शिक्षा पर जोर देते हुए अदालत ने सोसायटी फॉर अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स ऑफ राजस्थान बनाम भारत संघ, अविनाश मेहरोत्रा बनाम भारत संघ और महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय बनाम मध्य प्रदेश राज्य का उल्लेख किया और माना:
“वंचितों को अलग-थलग करने वाली शिक्षा प्रणाली समानता की वकालत करने वाले संविधान के साथ सह-अस्तित्व में नहीं रह सकती। देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों को बाहर करने वाली शिक्षा प्रणाली बंधुत्व को बढ़ावा देने वाले संविधान के अनुकूल नहीं है। एक को दूसरे के लिए रास्ता छोड़ना ही होगा।”
4. राज्य के तर्कों को खारिज करना
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस रुख को अस्वीकार कर दिया कि ‘फिट फैसिलिटी’ केवल पूर्णकालिक आवासीय संस्थान ही हो सकते हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि जमानत के बाद का पुनर्वास मुख्य रूप से परिवार और सामाजिक परिवेश पर आधारित होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बजट की कमी को अनुच्छेद 21-ए और जेजे एक्ट के तहत मिलने वाले मौलिक व वैधानिक अधिकारों से इनकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
जेजे एक्ट की धारा 110 के तहत विस्तृत नियम न होने के संबंध में अदालत ने कहा:
“पुनर्वास योजना और व्यक्तिगत बाल देखरेख योजना के शैक्षिक घटकों के तहत बच्चों के अधिकार नियमों के अभाव में मृतप्राय नहीं रह सकते। यदि नियमों के न होने के आधार पर पुनर्वास के शैक्षिक घटकों के क्रियान्वयन को रोक दिया जाता है, तो बच्चों की एक पूरी पीढ़ी उस बुनियादी शिक्षा से वंचित हो जाएगी जो समाज में उनके पुनः एकीकरण के लिए अनिवार्य है। कार्यपालिका की निष्क्रियता विधायी उद्देश्य को विफल नहीं कर सकती और न ही संवैधानिक ठहराव पैदा कर सकती है।”
अंतिम निर्णय और राज्यव्यापी दिशानिर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कासगंज की चिल्ड्रन्स कोर्ट के 3 जनवरी 2024 के आदेश को रद्द कर दिया और नाबालिग अपीलकर्ता को अंतरिम जमानत के दौरान दाखिल व्यक्तिगत बंधपत्र और दो प्रतिभूतियों पर नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने अधीनस्थ अदालत को अरविंद सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले के आलोक में निर्देश दिया कि गैर-वाजिब या अत्यधिक शर्तों की मांग न की जाए।
जिला प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने अपीलकर्ता के लिए 12-सूत्रीय पुनर्वास कार्यक्रम को औपचारिक रूप दिया, जिसे संबंधित स्कूल द्वारा संचालित किया जाएगा:
- शैक्षणिक अध्ययन
- योग
- खेलकूद
- संगीत
- कला
- शिल्प
- रंगमंच और कहानी सुनाना
- पर्यावरण संवेदनशीलता के लिए वृक्षों व पौधों की देखरेख
- सहपाठियों के साथ सामूहिक गतिविधियां
- शिक्षक मार्गदर्शकों द्वारा नैतिक मूल्य और जीवन कौशल का विकास
- आवश्यकतानुसार नियमित काउंसलिंग
- मध्याह्न भोजन के माध्यम से पौष्टिक आहार
हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश के लिए निम्नलिखित प्रमुख दिशानिर्देश जारी किए:
- अनिवार्य मूल्यांकन: जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और चिल्ड्रन्स कोर्ट किसी भी किशोर को जमानत पर रिहा करते समय या जांच समाप्त होने पर पुनर्वास योजना और स्कूली शिक्षा की आवश्यकता का अनिवार्य रूप से मूल्यांकन करेंगे।
- डे-स्कूल ‘फिट फैसिलिटी’ के रूप में: बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा संचालित सरकारी दिन के स्कूलों और उनके शिक्षकों को शैक्षणिक घटकों के क्रियान्वयन के लिए ‘फिट इंस्टीट्यूशन’ और ‘फिट पर्सन’ के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
- पहचान की गोपनीयता: पूरी प्रक्रिया के दौरान स्कूल प्रशासन और अदालतों द्वारा बच्चे की पहचान और गोपनीयता की पूर्ण सुरक्षा की जाएगी।
- नियम बनाने का निर्देश: राज्य सरकार जेजे एक्ट के तहत फिट संस्थाओं, फिट व्यक्तियों और फॉस्टर केयर की पहचान व संचालन के लिए तुरंत मानक नियम तैयार करे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: एक्स जुवेनाइल-रिहैबिलिटेशन एंड रीइंटीग्रेशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य (संबद्ध अपील सहित)
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1470/2024 एवं क्रिमिनल अपील संख्या 2446/2026
पीठ: जस्टिस अजय भनोट
निर्णय की तिथि: 31 अगस्त 2026

