कानूनी उम्र सीमा पार कर चुके दंपति को केरल हाईकोर्ट से राहत, 2013 में शुरू हुए आईवीएफ इलाज को जारी रखने की मंजूरी

केरल हाईकोर्ट ने तय कानूनी उम्र सीमा पार कर चुके एक दंपति को अपनी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) सेवाएं और आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) इलाज दोबारा शुरू करने की अनुमति दे दी है। अदालत ने इस बात को आधार बनाया कि 50 वर्षीय महिला और उनके 55 वर्षीय पति ने यह इलाज साल 2013 में ही शुरू कर दिया था, जब दोनों तत्कालीन और मौजूदा कानून के तहत निर्धारित आयु सीमा के दायरे में आते थे।

जोखिम का हलफनामा देना होगा अनिवार्य

जस्टिस हरिशंकर वी मेनन ने 19 अगस्त को जारी अपने आदेश में निर्देश दिया कि दंपति को इलाज की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले एक नोटरी से सत्यापित अंडरटेकिंग (हलफनामा) जमा करनी होगी। इसमें उन्हें इलाज और प्रक्रिया से जुड़े सभी तरह के चिकित्सकीय जोखिमों, परिणामों और जवाबदेही को खुद स्वीकार करना होगा। यह हलफनामा केरल राज्य एआरटी और सरोगेसी बोर्ड या जिला कलेक्टर के समक्ष पेश करना अनिवार्य होगा। आवश्यक दस्तावेज जमा होने के बाद संबंधित अस्पताल और स्वास्थ्य अधिकारियों को नियमानुसार आगे का इलाज प्रदान करना होगा।

केंद्र सरकार का विरोध और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की नजीर

यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब संबंधित अस्पताल ने एआरटी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की धारा 21(जी) में दर्ज आयु सीमा का हवाला देते हुए आगे का इलाज करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद पीड़ित दंपति ने केंद्र सरकार, जिला कलेक्टर, राष्ट्रीय और केरल राज्य एआरटी बोर्ड, स्वास्थ्य सेवा निदेशक तथा अस्पताल को पक्षकार बनाते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

READ ALSO  आपने कोर्ट का माहौल खराब किया: सुप्रीम कोर्ट ने वकील पर लगाया ₹5 लाख का जुर्माना, याचिका को बताया निराधार

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने याचिका का विरोध किया। केंद्र का पक्ष था कि एआरटी एक्ट की धारा 21(जी) में निर्धारित आयु सीमा अनिवार्य है और इसमें कोई छूट नहीं दी जा सकती, इसलिए याचिकाकर्ता इलाज पाने के हकदार नहीं हैं।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता प्रक्रिया का पूरा जोखिम उठाने को तैयार हैं। अपने फैसले के समर्थन में जस्टिस मेनन ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा ‘डॉ. पुष्पा व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में 19 मई 2026 को दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस मामले में भी समान परिस्थितियों का सामना कर रहे एक ओवर-एज दंपति को जोखिम का हलफनामा देने के बाद इलाज जारी रखने की अनुमति दी गई थी। केरल हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले के याचिकाकर्ता भी कानून के तहत समान राहत पाने के हकदार हैं।

READ ALSO  हर महत्वपूर्ण मुद्दा हमारे पास आये ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने जोशीमठ मामले में तत्काल सुनवाई से किया इनकार

दशक भर पुराना इलाज और मेडिकल रिकॉर्ड

अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, दंपति ने सबसे पहले 2013 में अस्पताल में आईवीएफ इलाज की शुरुआत की थी। इलाज के निरंतर प्रवाह को साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने कई मेडिकल दस्तावेज पेश किए।

इनमें 14 जुलाई 2016 की आईवीएफ और आईसीएसआई (इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन) क्रायोप्रिजर्वेशन समरी, 23 अप्रैल 2026 की तारीख वाला एम्ब्रियो वायबिलिटी (भ्रूण व्यवहार्यता) प्रमाणपत्र और अस्पताल द्वारा 24 अप्रैल 2026 को जारी आधिकारिक पत्र शामिल है।

READ ALSO  अनिवार्य सेवानिवृत्ति से सेवानिवृत्ति लाभ समाप्त नहीं होते; केवल बर्खास्तगी ही उन्हें रोक सकती है: सुप्रीम कोर्ट
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles