25% जमा राशि का नियम पूरा होने पर ईएमडी में मामूली कमी से नीलामी रद्द नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरफेसी (SARFAESI) अधिनियम के तहत आयोजित नीलामी प्रक्रिया में यदि सफल बोलीदाता नीलामी के दिन कुल बिक्री राशि का 25% जमा करने के वैधानिक नियम का अनुपालन करता है, तो नीलामी सूचना में निर्धारित अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट (EMD) में हुई मामूली शुरुआती कमी के आधार पर नीलामी रद्द नहीं होगी। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट और ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) के फैसलों को रद्द करते हुए यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया द्वारा की गई नीलामी को वैध ठहराया। इसके साथ ही अदालत ने बैंक को निर्देश दिया कि वह देनदार (बॉरोअर) को अधिशेष बिक्री राशि ₹1,33,94,054 पर 7% वार्षिक ब्याज के साथ वापस करे।

मामले का पृष्ठभूमि

यह विवाद यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया (जिसका वर्ष 2020 में पंजाब नेशनल बैंक में विलय हो गया) द्वारा मैसर्स एयरटेक प्रोजेक्ट्स इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड (देनदार) को दी गई कैश-क्रेडिट सुविधा से उत्पन्न हुआ था। 31 जुलाई 2008 तक 85 लाख रुपये की स्वीकृत सीमा के मुकाबले 88,52,741 रुपये का भुगतान न होने पर बैंक ने इस खाते को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) घोषित कर दिया था।

इसके बाद 1 अगस्त 2008 को बैंक ने वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (सरफेसी अधिनियम) की धारा 13(2) के तहत मांग नोटिस जारी किया। बैंक ने गिरवी रखी गई संपत्ति—चेतपेट, चेन्नई स्थित मैकनिकोलस रोड के डोर नंबर 32 पर लगभग 4,900 वर्ग फीट जमीन और उस पर बनी दो मंजिला इमारत—का मूल्यांकन कराया और कब्जा-सह-बिक्री नोटिस जारी किया।

ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) और मद्रास हाईकोर्ट के समक्ष शुरुआती प्रक्रियागत चुनौतियों के बाद, बैंक ने 18 मार्च 2009 को 24 अप्रैल 2009 के लिए ई-नीलामी का नया नोटिस जारी किया। इस नोटिस की शर्त संख्या 7 में कहा गया था कि बोलीदाताओं को 23 अप्रैल 2009 तक डिमांड ड्राफ्ट या पे ऑर्डर के जरिए 21,50,000 रुपये का ईएमडी जमा करना अनिवार्य है और “अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट के बिना प्रस्तुत प्रस्ताव को खारिज कर दिया जाएगा।”

23 अप्रैल 2009 को नीलामी खरीदारों—श्रीमती लक्ष्मी मोहन (अब उनके कानूनी प्रतिनिधियों, जिनमें उनके बेटे एम. प्रेमकुमार शामिल हैं)—ने अपनी बोली के साथ 21,15,000 रुपये की ईएमडी जमा की, जो तय राशि से 35,000 रुपये कम थी। 24 अप्रैल 2009 को हुई नीलामी में वे 2,17,40,000 रुपये की उच्चतम बोली लगाकर सफल बोलीदाता घोषित किए गए। उसी दिन उन्होंने 33,20,000 रुपये की अतिरिक्त राशि जमा की, जिससे उनका कुल जमा 54,35,000 रुपये हो गया, जो कि कुल बोली राशि का 25% था।

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यद्यपि DRT ने 1 अक्टूबर 2009 को देनदार की सीक्योरिटाइजेशन एप्लीकेशन (SA) खारिज कर दी थी, लेकिन DRAT ने देनदार की अपील स्वीकार करते हुए नीलामी को निरस्त कर दिया। DRAT का मानना था कि नीलामी में सिक्योरिटी इंटरेस्ट (एनफोर्समेंट) रूल्स, 2002 के नियम 8(5) और नीलामी सूचना की शर्तों का उल्लंघन हुआ है। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी 22 मार्च 2013 को नीलामी खरीदारों और बैंक की रिट याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।

पक्षकारों की दलीलें

नीलामी खरीदारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निरंजन रेड्डी ने तर्क दिया कि बोली के साथ अर्नेस्ट मनी जमा करना न तो कोई वैधानिक रूप से अनिवार्य शर्त है और न ही यह पात्रता का आवश्यक मापदंड है। उन्होंने कहा कि खरीदारों ने नियमों के नियम 9(3) का पूरी तरह अनुपालन करते हुए नीलामी के दिन ही कुल बिक्री मूल्य का 25% जमा कर दिया था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि दूसरे प्रतिस्पर्धी बोलीदाता ने भी 35,000 रुपये की ही कमी की थी, जिससे स्पष्ट है कि इस मामूली तकनीकी अनियमितता से देनदार या किसी अन्य पक्ष को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने कहा कि ईएमडी जमा करने की शर्त केवल बैंक के लाभ के लिए रखी गई थी ताकि गैर-गंभीर बोलीदाताओं को छांटा जा सके। उन्होंने तर्क दिया कि अमानक बोली की स्वीकृति पर केवल कोई प्रतिस्पर्धी बोलीदाता ही सवाल उठा सकता था, और चूंकि दूसरा बोलीदाता भी समान स्थिति में था, इसलिए कोई शिकायत नहीं बनती। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक अधिशेष बिक्री राशि देनदार को लौटाने के लिए तैयार है।

देनदार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत भूषण ने तर्क दिया कि निर्धारित ईएमडी के बिना कानून की नजर में कोई वैध बोली मौजूद ही नहीं थी। ईएमडी की शर्त एक अनिवार्य शर्त थी जिससे बैंक छूट नहीं दे सकता था। इसके अलावा, उन्होंने आरोप लगाया कि शेष 75% बिक्री राशि का भुगतान लगभग पांच महीने की देरी से किया गया, जो 15 दिनों की निर्धारित अवधि से काफी अधिक था।

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कोर्ट का विश्लेषण

फैसला लिखते हुए जस्टिस आलोक अराधे ने निविदा (टेंडर) नोटिस में पात्रता की आवश्यक शर्तों और सहायक/गौण शर्तों के बीच अंतर का विश्लेषण किया। अदालत ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए टिप्पणी की कि “टेंडर नोटिस में रखी गई आवश्यकताओं को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: (i) वे जो पात्रता की आवश्यक शर्त तय करती हैं; और (ii) अन्य जो शर्त के मुख्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए केवल सहायक या गौण होती हैं।”

कोर्ट ने कहा कि जहां आवश्यक शर्तों का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिए, वहीं गैर-वैधानिक या सहायक शर्तों में मामूली ढील या अनुरूपता की कमी से पूरी प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती, बशर्ते इससे किसी पक्ष या जनहित को कोई बड़ा नुकसान न पहुंचा हो।

मामले के तथ्यों पर इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने माना कि नीलामी सूचना की शर्त 7, जिसमें 21,50,000 रुपये की ईएमडी मांगी गई थी, गैर-वैधानिक प्रकृति की थी और इसका मुख्य उद्देश्य गैर-गंभीर बोलीदाताओं को अलग करना था। कोर्ट ने पाया कि दोनों प्रतिस्पर्धी बोलीदाताओं ने 21,15,000 रुपये जमा किए थे और बैंक ने दोनों की बोलियों पर विचार किया था।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि नीलामी खरीदारों ने नीलामी की तारीख पर ही कुल बोली राशि का 25% (ईएमडी सहित) जमा करके नियमों के नियम 9(3) के वैधानिक जनादेश का अनुपालन किया था। पीठ ने टिप्पणी की:

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“इसलिए, 25% बिक्री मूल्य जमा होते ही ईएमडी के जमा में पहले हुई कोई भी कमी बेमायने हो जाती है।”

शेष 75% राशि के भुगतान में देरी के मुद्दे पर कोर्ट ने नोट किया कि देनदार द्वारा शुरू की गई मुकदमेबाजी को देखते हुए बैंक ने 4 जून 2009 को पत्र जारी कर भुगतान की समय सीमा बढ़ा दी थी। जैसे ही 1 अक्टूबर 2009 को DRT द्वारा देनदार की याचिका खारिज की गई, नीलामी खरीदारों ने तुरंत 5 अक्टूबर 2009 को शेष राशि का भुगतान कर दिया।

अधिशेष राशि के संबंध में, कोर्ट ने पाया कि अपने बकाए के समायोजन के बाद बैंक के पास 1,33,94,054 रुपये का अधिशेष बचा था। बैंक मुकदमेबाजी के दौरान इस राशि को ब्याज देने वाले खाते में रखने में विफल रहा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि बैंक की इस गलती का खामियाजा देनदार को नहीं भुगतना पड़ सकता और वह इस अधिशेष राशि पर ब्याज पाने का हकदार है।

कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के 22 मार्च 2013 के निर्णय और DRAT के 20 जून 2011 के आदेश को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने नीलामी खरीदारों द्वारा दायर सिविल अपील संख्या 9228-9231 / 2013 और बैंक की अपील को स्वीकार कर लिया, जबकि देनदार की अपीलों को निस्तारित कर दिया।

बैंक को निर्देश दिया गया कि वह 1,33,94,054 रुपये की अधिशेष राशि 23 मार्च 2010 से (जब इस राशि को गैर-ब्याज वाले खाते में रखा गया था) वास्तविक भुगतान की तारीख तक 7% वार्षिक ब्याज के साथ देनदार को लौटाए।

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