सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर हासिल किए गए अवैध एब्जॉर्प्शन (स्थायी विलय) को केवल समय बीत जाने या न्यायिक सहानुभूति के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत हरियाणा सरकार के लोक निर्माण विभाग (भवन एवं सड़कें) में एब्जॉर्ब किए गए चार अधिकारियों की सेवाओं को सुरक्षा प्रदान की गई थी। ‘पंजाब सर्विस ऑफ इंजीनियर्स, क्लास II, पी.डब्ल्यू.डी. (बिल्डिंग्स एंड रोड्स ब्रांच) रूल्स, 1965’ के तहत डेपुटेशन, एब्जॉर्प्शन और अंतर-वरिष्ठता (इंटर-से सीनियरिटी) से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने चारों अधिकारियों के एब्जॉर्प्शन को गैर-कानूनी और प्रारंभ से ही शून्य (वॉइड एबी इनिशियो) घोषित किया। इसके साथ ही कोर्ट ने उन्हें तुरंत प्रभाव से उनके मूल विभाग में वापस भेजने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद साल 2004 और 2005 में शुरू हुआ था, जब श्री प्रदीप अत्री, श्री प्रवीण चौधरी, श्री पंकज गौड़ और श्री अरुण भाटिया को हरियाणा सरकार के विकास एवं पंचायत विभाग में उप-मंडल अधिकारी (पंचायती राज) के पद पर प्रोबेशन पर नियुक्त किया गया था।
प्रोबेशन की अवधि पूरी होने से पहले ही इन अधिकारियों को लोक निर्माण विभाग (भवन एवं सड़कें) यानी PWD (B&R) में डेपुटेशन पर भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। श्री प्रदीप अत्री ने सीधे इंजीनियर-इन-चीफ को आवेदन देकर डेपुटेशन की मांग की। वहीं श्री प्रवीण चौधरी के मामले में, नियुक्ति के कुछ ही समय भीतर राज्य के राजस्व मंत्री और परिवहन मंत्री ने सिफारिशी पत्र जारी किए थे। यद्यपि इन्हें शुरुआती दौर में सीधी भर्ती के खाली पदों के खिलाफ अस्थायी व्यवस्था के तौर पर लाया गया था, लेकिन बाद में चारों अधिकारियों ने PWD (B&R) विभाग में ही स्थायी एब्जॉर्प्शन की मांग की।
विभाग के अधिकारियों की आपत्तियों के बावजूद और हरियाणा स्टाफ सिलेक्शन कमीशन द्वारा 2006 में आयोजित सीधी भर्ती की खुली प्रतियोगी परीक्षा में तीन अधिकारी (श्री अत्री, श्री गौड़ और श्री भाटिया) के असफल हो जाने के बाद भी, राज्य सरकार ने 2006 से 2009 के बीच आदेश जारी कर इन्हें सहायक अभियंता/उप-मंडल अभियंता के रूप में एब्जॉर्ब कर लिया। सरकार ने इसके लिए 1965 के नियमों के नियम 10 का सहारा लिया, जो विशेष परिस्थितियों में ट्रांसफर द्वारा नियुक्ति की अनुमति देता है। चौथे अधिकारी श्री प्रवीण चौधरी ने इस परीक्षा में भाग तक नहीं लिया था।
इसके बाद जारी की गई वरिष्ठता सूचियों में इन एब्जॉर्ब किए गए अधिकारियों को 2007 और 2009 में सीधे भर्ती होकर आए नियमित इंजीनियरों से ऊपर रख दिया गया। इसके विरोध में नियमित रूप से चयनित इंजीनियरों ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर एब्जॉर्प्शन और वरिष्ठता दोनों को चुनौती दी। 15 मार्च 2023 को हाईकोर्ट ने माना कि डेपुटेशन और एब्जॉर्प्शन कानून की दृष्टि से गलत थे और यह राजनीतिक जोड़-तोड़ का परिणाम थे। हालांकि, यह देखते हुए कि अधिकारी 18 से अधिक वर्षों से सेवा दे रहे थे और अपने मूल विभाग में उनका लीन (मूल पद पर अधिकार) समाप्त हो चुका था, हाईकोर्ट ने सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाते हुए उनके एब्जॉर्प्शन को रद्द नहीं किया, बल्कि केवल सीधी भर्ती वाले इंजीनियरों पर उनकी वरिष्ठता के दावों को सीमित कर दिया। इस फैसले के खिलाफ सीधी भर्ती वाले इंजीनियरों, एब्जॉर्ब हुए अधिकारियों और हरियाणा राज्य सरकार तीनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
विभिन्न पक्षों की बहस
सीधी भर्ती वाले इंजीनियरों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं श्री रंजीत कुमार और श्री गुरमिंदर सिंह ने तर्क दिया कि यह डेपुटेशन और एब्जॉर्प्शन सीधी प्रतियोगिता परीक्षा प्रक्रिया को दरकिनार करने का एक बैकडोर तरीका था, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि जब हाईकोर्ट ने शुरुआती प्रवेश को ही गैर-कानूनी पाया, तो न्यायिक सहानुभूति का उपयोग कर अवैध नियुक्तियों को बनाए रखना गलत था। उन्होंने ‘सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमादेवी’ और ‘एम.पी. स्टेट कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम ननूराम यादव’ के फैसलों का हवाला देते हुए जोर दिया कि जो लोग बैकडोर से प्रवेश करते हैं, उन्हें उसी दरवाजे से बाहर निकलना चाहिए। 2009 बैच के सीधी भर्ती वाले इंजीनियरों का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वी. गिरि ने कहा कि अवैध प्रवेशकों को संरक्षण देने से नियमित रूप से नियुक्त इंजीनियरों के करियर में ठहराव आ गया है।
इसके विपरीत, एब्जॉर्ब अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पटवालिया (श्री प्रदीप अत्री के लिए), श्री निधेश गुप्ता (श्री प्रवीण चौधरी के लिए) और श्री गुरु कृष्णा कुमार (श्री पंकज गौड़ और श्री अरुण भाटिया के लिए) ने तर्क दिया कि 1965 के नियमों के नियम 2(9)(b), 2(12), 7(4) और 10 के तहत ट्रांसफर द्वारा नियुक्ति एक कानूनी रूप से स्वीकृत माध्यम है। उन्होंने कहा कि इंजीनियरों की भारी कमी और अदालत में लंबित मामलों के कारण नई भर्तियों पर लगी रोक ऐसी विशेष स्थितियां थीं जिन्होंने उनके ट्रांसफर और एब्जॉर्प्शन को न्यायसंगत बनाया। उन्होंने ‘चीफ इंजीनियर बनाम के.एस. बरार’, ‘पी.एम. बयास बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’, ‘स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम आनंद प्रकाश सोलंकी’, ‘के. माधवन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ और ‘सब इंस्पेक्टर रूपलाल बनाम लेफ्टिनेंट गवर्नर’ का हवाला देते हुए कहा कि नियम 12(5) के तहत सरकार को समतुल्य रैंकों में दी गई पिछली सेवा का वरिष्ठता लाभ देने का अधिकार है।
हरियाणा राज्य की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री बिजेंदर चाहल ने नियम 10 और 12 के तहत राज्य के कार्यकारी विवेकाधिकार का समर्थन करते हुए कहा कि जनहित और कर्मचारियों की कमी एब्जॉर्प्शन के वैध आधार थे, तथा इसके लिए हरियाणा लोक सेवा आयोग की सहमति भी प्राप्त की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और प्रमुख टिप्पणियां
पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने डेपुटेशन और ट्रांसफर से जुड़े सेवा कानून तथा 1965 के नियमों के प्रावधानों का गहन विश्लेषण किया।
अदालत ने प्रमुख पूर्व उदाहरणों का उल्लेख करते हुए डेपुटेशन की स्थापित कानूनी परिभाषा को दोहराया। ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम इंदर सिंह’ मामले का संदर्भ देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“सर्विस लॉ में ‘डेपुटेशन’ की अवधारणा की एक विशिष्ट पहचान है और इसके लिए शब्दकोश का अर्थ पर्याप्त नहीं है। सरल शब्दों में ‘डेपुटेशन’ का अर्थ अपने मूल कैडर या मूल विभाग से बाहर सेवा देना है। डेपुटेशन का अर्थ किसी कर्मचारी को उसके कैडर से बाहर किसी अन्य विभाग में अस्थायी आधार पर भेजना है। डेपुटेशन की अवधि समाप्त होने के बाद कर्मचारी को अपने मूल विभाग में वापस आना होता है।”
पीठ ने आगे ‘उमापति चौधरी बनाम बिहार राज्य’, ‘कुणाल नंदा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ और ‘सीबीआई बनाम रमेश चंद्र दीवान’ के फैसलों का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि डेपुटेशन सार्वजनिक सेवा की आपात आवश्यकताओं को पूरा करने की एक अस्थायी व्यवस्था है, जिससे कर्मचारी का अपने मूल विभाग के साथ लीन (अधिकार) बना रहता है।
1965 के नियमों के नियम 6 और नियम 10 का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 6 के तहत नियमित भर्ती 50 प्रतिशत सीधी भर्ती और 50 प्रतिशत पदोन्नति के रूप में बंटी हुई है। हालांकि नियम 10 विशेष परिस्थितियों में ट्रांसफर द्वारा नियुक्ति की अनुमति देता है, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य प्रशासनिक कर्मचारियों की कमी इस मानदंड को पूरा नहीं करती। विशेष परिस्थितियों के कानूनी मानक की व्याख्या करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“हमारी समझ में ‘विशेष परिस्थितियों’ का अर्थ किसी ऐसी स्थिति से है जो सामान्य या रूटीन प्रक्रिया से परे हो। किसी कैडर में पदों का खाली होना एक सामान्य प्रक्रिया है; यह कोई असामान्य या असाधारण स्थिति नहीं है।”
अदालत ने उस प्रक्रिया पर कड़ा रुख अपनाया जिसके माध्यम से अधिकारियों ने PWD (B&R) विभाग में प्रवेश पाया। पीठ ने रेखांकित किया कि प्रोबेशन पर चल रहे अधिकारियों ने विभागीय प्रोटोकॉल को तोड़कर मंत्रियों के हस्तक्षेप के जरिए अपना डेपुटेशन और एब्जॉर्प्शन करवाया। कोर्ट ने माना कि जो अधिकारी खुली भर्ती परीक्षा में असफल रहे, उन्हें ट्रांसफर के जरिए विभाग में प्रवेश की अनुमति देना उस काम को अप्रत्यक्ष रूप से करने जैसा है जिसे प्रत्यक्ष रूप से हासिल नहीं किया जा सकता था।
सहानुभूति के आधार पर एब्जॉर्प्शन को रद्द करने से हाईकोर्ट के इनकार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने गंभीर कानूनी त्रुटि की है। पीठ ने ‘सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमादेवी’ का उल्लेख करते हुए अवैधता और अनियमितता के बीच अंतर स्पष्ट किया:
“गैर-कानूनी (इल्लीगैलिटी) का तात्पर्य ऐसी स्थिति से है जो कानून के विरुद्ध हो और शुरुआत से ही गलत हो। यह प्रारंभ से ही शून्य (वॉइड एबी इनिशियो) होती है। समय बीतने के साथ किसी अवैधता को वैध नहीं ठहराया जा सकता। अवैधता, जो कि किसी प्रक्रियात्मक अनियमितता से बिल्कुल अलग है, को लंबी सेवा का हवाला देकर या सहानुभूतिपूर्वक रुख अपनाकर नियमित नहीं किया जा सकता।”
लीन (मूल पद पर अधिकार) के समाप्त होने के बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘रामलाल खुराना बनाम पंजाब राज्य’ का संदर्भ दिया और निर्णय दिया कि जब कोई अवैध एब्जॉर्प्शन रद्द कर दिया जाता है, तो मूल विभाग में कर्मचारी का substantive (मूल) पद पर लीन स्वतः ही बहाल हो जाता है।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि श्री प्रदीप अत्री और श्री प्रवीण चौधरी का डेपुटेशन पूरी तरह से अवैध था, जबकि श्री पंकज गौड़ और श्री अरुण भाटिया का डेपुटेशन अनियमित था। हालांकि, अदालत ने सर्वसम्मति से माना कि PWD (B&R) विभाग में चारों अधिकारियों का स्थायी एब्जॉर्प्शन अवैध, अमान्य और प्रारंभ से शून्य (वॉइड एबी इनिशियो) था।
परिणामस्वरूप, सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के उस निर्देश को निरस्त कर दिया जिसके तहत अधिकारियों को PWD (B&R) विभाग में बने रहने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने चारों अधिकारियों को तुरंत उनके मूल विभाग ‘विकास एवं पंचायत विभाग, हरियाणा सरकार’ में वापस भेजने (रेपेट्रिएशन) का आदेश दिया। मूल विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे उप-मंडल अधिकारी (पंचायती राज) के मूल कैडर में उनकी वरिष्ठता और कैडर का निर्धारण करते हुए उन्हें उन उम्मीदवारों के ठीक ऊपर रखें जो उनकी मूल वरिष्ठता सूची में उनसे कनिष्ठ (जूनियर) थे। सभी संबद्ध सिविल अपीलों को इसी अनुसार निस्तारित कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: हेमंत कुमार एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य व अन्य
वाद संख्या: विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 12017-12018/2023
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुयान
निर्णय की तिथि: 18 अगस्त 2026

