उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक फैसला सुनाते हुए भारतीय सेना में कार्यरत एक सिपाही की पत्नी और उनके तीन साल के बच्चे के लिए तय मासिक गुजारा भत्ता 12,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य की सुरक्षा या रिटायरमेंट योजनाओं में स्वेच्छा से की जाने वाली कटौतियों को आधार बनाकर परिवार के वैध भरण-पोषण के अधिकार को कम नहीं किया जा सकता।
जस्टिस आलोक मेहरा की एकल पीठ ने 17 अगस्त को यह फैसला जारी किया। पीठ ने 18 अप्रैल को फैमिली कोर्ट द्वारा जारी आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया कि पति को बढ़ी हुई राशि हर महीने की 10 तारीख या उससे पहले जमा करनी होगी।
रिटायरमेंट सेविंग्स से गुजारे भत्ते के अधिकार पर असर नहीं
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अपनी मर्जी से बचत योजनाओं में पैसा लगाने से पति की उन कानूनी जिम्मेदारियों में कोई कमी नहीं आती, जो उसके आश्रितों के प्रति हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि किसी भी व्यक्ति की भरण-पोषण देने की क्षमता का आकलन सिर्फ इस बात से नहीं किया जा सकता कि स्वेच्छा से की गई कटौतियों के बाद उसके हाथ में कितना वेतन बचता है।
सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार
मामले पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का मूल उद्देश्य केवल आश्रितों का किसी तरह पेट भरना भर नहीं है, बल्कि उन्हें पति के सामाजिक और आर्थिक स्तर के अनुरूप एक सम्मानजनक जीवन जीने की सुविधा देना है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता महिला के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है और उस पर अपने छोटे बच्चे की देखरेख की जिम्मेदारी है। ऐसे में पति की कुल कमाई की तुलना में फैमिली कोर्ट द्वारा पूर्व में तय की गई 12,000 रुपये की राशि बहुत कम थी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले पक्ष की ओर से वकील गौरव कांडपाल ने दलील दी कि निचली अदालत ने पति की वास्तविक कमाई का सही आकलन किए बिना भत्ता तय किया था। उन्होंने पीठ को बताया कि पति सेना में सिपाही के पद पर कार्यरत है और उसका कुल मासिक वेतन लगभग 88,588 रुपये है, जिसमें 31,400 रुपये का बैंड पे भी शामिल है। वकील ने कहा कि महिला को मजबूरी में अपना ससुराल छोड़ना पड़ा था और वह अकेले ही भोजन, कपड़े, इलाज तथा बच्चे के आगामी स्कूल दाखिले के खर्चों का प्रबंधन कर रही है।
वहीं, सिपाही का पक्ष रख रहे वकील नितिन कमाल ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल का नेट इन-हैंड वेतन करीब 50,000 रुपये ही रहता है। उन्होंने बताया कि सिपाही ने अपनी इच्छा से विभिन्न पोस्ट-रिटायरमेंट योजनाओं को चुना है, जिसके तहत उसके वेतन से लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा कट जाता है। इसलिए पति के पास अधिक राशि देने की क्षमता नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और गुजारा भत्ते की राशि में बढ़ोतरी कर दी।

