प्रधानमंत्री पर टिप्पणी मामला: त्रिपुरा हाईकोर्ट का एफआईआर रद्द करने से इनकार, कहा- सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा गैरकानूनी

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री, अगरतला के मेयर और एक स्थानीय देवी के खिलाफ आपत्तिजनक व मानहानिकारक पोस्ट करने की आरोपी कंटेंट क्रिएटर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में राजनीतिक आलोचना एक आवश्यक हिस्सा है, लेकिन सोशल मीडिया पर उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ अमर्यादित या अभद्र भाषा का प्रयोग कानून के दायरे से बाहर है।

जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़ और जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ की पीठ ने कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती की ओर से दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जिसका निस्तारण ट्रायल के जरिए ही होना चाहिए।

नाम का मजाक उड़ाने और धार्मिक भावनाएं भड़काने का आरोप

यह मामला ईस्ट अगरतला और वेस्ट अगरतला पुलिस स्टेशनों में दर्ज प्राथमिकियों (एफआईआर) से जुड़ा है। पुलिस जांच के अनुसार, आरोपी माधबी बिस्वास चक्रवर्ती पर आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री और अगरतला के मेयर के नाम व सरनेम का मजाक उड़ाते हुए सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। इसके अतिरिक्त, उन पर माता त्रिपुरेश्वरी के संबंध में भी विवादित बयान देने का आरोप है, जिससे स्थानीय लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।

मामले की जांच पूरी होने के बाद पुलिस दोनों प्रकरणों में ट्रायल कोर्ट के समक्ष आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है।

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम बदनामी का अधिकार

हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में माधबी बिस्वास ने तर्क दिया था कि उनकी पोस्ट संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार व्यक्त करने की आजादी के दायरे में आती हैं और इनमें आपराधिक मानहानि का कोई तत्व शामिल नहीं है। उन्होंने आपराधिक कार्यवाहियों को राजनीति से प्रेरित भी बताया।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने जानबूझकर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक बातें कहीं और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई। अदालत ने राज्य के पक्ष को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने, झूठे दावे करने या दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाने का अधिकार नहीं देता।

सोशल मीडिया पर साइबर मानहानि पर कोर्ट की चिंता

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पीठ ने अपने फैसले में कहा कि प्रधानमंत्री देश का शीर्ष संवैधानिक पद संभालते हैं। अदालत ने चिंता जताई कि वर्तमान दौर में सोशल मीडिया का उपयोग तेजी से साइबर मानहानि के लिए किया जा रहा है। अपरिपक्व या झूठी जानकारी ऑनलाइन साझा करने से किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को बहुत कम समय में भारी नुकसान पहुंचता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस को मानहानि, लोक उपद्रव और शांति भंग करने के इरादे से किए गए अपमान के मामलों में एफआईआर दर्ज करने का पूरा कानूनी अधिकार है।

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जनवरी में अंतरिम और फरवरी में मिली थी स्थायी जमानत

मामले के घटनाक्रम के अनुसार, पुलिस कार्रवाई के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया था। त्रिपुरा हाईकोर्ट ने 7 जनवरी को उन्हें अंतरिम जमानत दी थी। पुलिस द्वारा जांच पूरी कर आरोप पत्र दाखिल किए जाने के बाद, 13 फरवरी को उनकी जमानत को स्थायी कर दिया गया था।

अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह माना कि याचिकाओं को समय से पहले खारिज नहीं किया जा सकता और शिकायतकर्ताओं को अपने मानहानि के दावों को ट्रायल के दौरान साबित करने का पूरा अधिकार है।

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