जांच अधिकारी की भूमिका सबूत जुटाने की है, गढ़ने की नहीं; गवाह का बयान दर्ज करने का कारण न बताना गंभीर संदेह पैदा करता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियों का काम उपलब्ध साक्ष्यों को निष्पक्ष रूप से एकत्र करना है, न कि किसी मामले को जबरन साबित करने के लिए साक्ष्य या परिस्थितियां गढ़ना। शीर्ष अदालत ने अपनी सौतेली मां और नाबालिग सौतेले भाई की हत्या के आरोप से बरी की गई एक महिला के मामले में हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल अपील को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की अटूट श्रृंखला स्थापित करने और अपराध से जुड़ी परिस्थितियों को उचित संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 7 सितंबर 2011 का है, जब मृतका के पिता (पीडब्लू-1) ने पुलिस को सूचना दी कि उनकी बेटी और उसका नाबालिग बेटा पिछले करीब एक सप्ताह से लापता हैं और उनके मकान पर ताला लगा हुआ है। साथ ही घर के भीतर से तेज दुर्गंध आ रही थी। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर घर का ताला तोड़ा, जहां दोनों के क्षत-विक्षत शव मिले। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पुष्टि हुई कि दोनों की मौत 5 से 7 दिन पहले गला घोंटने के कारण हुई थी।

अभियोजन का दावा था कि आरोपी महिला (जो मृतका के दिवंगत पति की पहली पत्नी की बेटी थी) ने पैतृक संपत्ति हड़पने के मकसद से 31 अगस्त 2011 की रात दोनों की हत्या कर दी। पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था:

  • मृतका के पिता का दावा था कि उन्होंने 31 अगस्त की शाम आरोपी को घर पर देखा था।
  • एक टैक्सी चालक (पीडब्लू-4) ने बयान दिया कि वह उस शाम आरोपी को चंबा से लेकर आया था और देर रात वापस ले गया, जिस दौरान उसने आरोपी के अंगूठे से खून बहते देखा था।
  • चंबा के एक होटल कर्मी (पीडब्लू-18) ने कहा कि आरोपी उस रात होटल में ठहरी थी।
  • गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने चाबियों का एक गुच्छा, मृतका का बिना सिम वाला मोबाइल फोन और अंगूठे के इलाज से जुड़ी एक ओपीडी पर्ची बरामद करने का दावा किया।
  • फॉरेंसिक जांच में घर में रखे एक ट्रंक से मिले खून के धब्बों का डीएनए आरोपी के ब्लड सैंपल से मैच होने की बात कही गई।
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सत्र न्यायालय ने 7 नवंबर 2012 को आरोपी को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, 28 जुलाई 2014 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और आरोपी को बरी कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी:

  • हाईकोर्ट ने ठोस वैज्ञानिक और मौखिक साक्ष्यों को अनुमानों के आधार पर खारिज किया।
  • ट्रंक पर मिले खून का आरोपी के डीएनए से मिलान और घटना की रात उसके अंगूठे पर चोट होना अपराध स्थल पर उसकी उपस्थिति साबित करता है।
  • गवाहों के बयान विश्वसनीय थे और घर के ताले को खोलने वाली चाबियों की बरामदगी सीधे तौर पर अपराध की ओर इशारा करती है।

प्रतिवादी (आरोपी) की ओर से दलील दी गई:

  • आखिरी बार देखे जाने (लास्ट सीन) के सिद्धांत और शवों की बरामदगी के बीच लगभग एक सप्ताह का लंबा अंतर था, जिसमें किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता।
  • मृतका के पिता ने पुलिस को दिए बयान से आगे बढ़कर अदालत में गवाही दी और उसी परिसर में रहने के बावजूद सात दिनों तक चुप रहे।
  • टैक्सी चालक और होटल कर्मी के बयान पूरी तरह बनावटी हैं, क्योंकि न तो कोई टैक्सी रसीद थी और न ही होटल रजिस्टर में कोई प्रविष्टि।
  • बरामद ताला दरवाजे की कुंडी पर नहीं बल्कि हैंडल पर टंगा पाया गया था, जिससे ताला-चाबी की बरामदगी की थ्योरी पूरी तरह संदिग्ध हो जाती है। इसके अलावा संपत्ति विवाद से जुड़ा कोई वसीयतनामा भी पेश नहीं किया गया।

अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ अपीलों पर विचार करने के स्थापित सिद्धांतों को दोहराया। राजस्थान राज्य बनाम शेरा राम उर्फ विष्णु दत्त और मध्य प्रदेश राज्य बनाम बच्चूदास उर्फ बलराम के फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि बरी किए जाने से आरोपी की बेगुनाही का अनुमान और मजबूत होता है। यदि रिकॉर्ड पर दो विचार संभव हों, तो आरोपी के पक्ष में जाने वाला दृष्टिकोण ही अपनाया जाना चाहिए। न्याय के सिद्धांत पर जोर देते हुए अदालत ने टिप्पणी की: “दोषी के बरी होने से न्याय का जो हनन हो सकता है, वह किसी निर्दोष को सजा मिलने से कम नहीं है।”

राजेश प्रसाद बनाम बिहार राज्य मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि बरी किए गए फैसले में केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही हस्तक्षेप किया जा सकता है, जहां निष्कर्ष पूरी तरह विकृत हों। परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मानक को हनुमंत बनाम मध्य प्रदेश राज्य और शरद विरधीचंद सारड़ा बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसलों के आधार पर स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “परिस्थितियों की श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चाहिए कि आरोपी की बेगुनाही के अनुरूप किसी भी निष्कर्ष के लिए कोई उचित आधार न बचे, और यह ऐसा होना चाहिए जो यह दर्शाए कि सभी मानवीय संभावनाओं के भीतर यह कृत्य आरोपी द्वारा ही किया गया होगा।”

साक्ष्यों की गहन समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जांच और अभियोजन की कई गंभीर खामियों को उजागर किया:

  1. सबूत गढ़ने का संदेह: अदालत ने इस बात पर कड़ा एतराज जताया कि जांच अधिकारी (पीडब्लू-20) यह स्पष्ट नहीं कर सके कि वे टैक्सी चालक (पीडब्लू-4) और होटल कर्मी (पीडब्लू-18) तक कैसे पहुंचे। अदालत ने टिप्पणी की: “यह सुस्थापित है कि जांच अधिकारी की भूमिका सबूत जुटाने की है, न कि उसे गढ़ने की। जहां जांच अधिकारी के पास किसी व्यक्ति का बयान दर्ज करने का या उस व्यक्ति के पास पुलिस को जानकारी देने का कोई अवसर नहीं था, फिर भी पुलिस उन परिस्थितियों को बताए बिना उसका बयान दर्ज करने की दिशा में आगे बढ़ती है जिनमें उसका बयान दर्ज करना आवश्यक समझा गया था, तो यह गंभीर संदेह पैदा होता है कि क्या उस गवाह को सबूत गढ़ने के लिए खड़ा किया गया है।” पीठ ने पाया कि टैक्सी चालक का बयान आरोपी की गिरफ्तारी और उसकी चोट की जानकारी मिलने के बाद दर्ज किया गया, जिससे यह संभावना प्रबल होती है कि पुलिस ने कहानी को बाद में बुना।
  2. अविश्वसनीय ‘लास्ट सीन’ और गंभीर चूक: मृतका के पिता ने पुलिस को दिए पहले बयान में यह नहीं कहा था कि उन्होंने आरोपी को बच्चे से बात करते देखा था। साथ ही, उसी घर में एक कमरा होने के बावजूद 6-7 दिनों तक दरवाजा बंद रहने पर कोई शिकायत न करना उनके आचरण को संदिग्ध बनाता है। इसके अलावा, दोनों मोबाइलों के टावर लोकेशन वाले कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) अदालत में पेश न करना जांच की बड़ी विफलता थी, जिसने महत्वपूर्ण साक्ष्य को दबा दिया।
  3. ताले और डीएनए साक्ष्य में विरोधाभास: बरामदगी के गवाह (पीडब्लू-3) ने स्वीकार किया कि ताला कुंडी पर नहीं बल्कि दरवाजे के हैंडल पर लटका था। ताला तोड़े जाने के समय मौजूद पुलिस अधिकारी भी अदालत में ताले की पहचान नहीं कर सके, जिससे चाबियों की बरामदगी अर्थहीन हो गई। ट्रंक पर मिले डीएनए मिलान पर अदालत ने कहा कि आरोपी पहले भी नियमित रूप से उस घर में आती-जाती थी, ऐसे में किसी पुरानी चोट का खून वहां मौजूद होना संभव था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मृतकों के कपड़ों या गला घोंटने में इस्तेमाल सामग्री पर आरोपी का कोई खून नहीं मिला।
  4. मकसद साबित न होना: अभियोजन पक्ष ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि पिता ने अपनी संपत्ति नाबालिग बेटे के नाम की थी। परिवार में पहली पत्नी की पांच बेटियां थीं, इसलिए नाबालिग की मृत्यु के बाद भी संपत्ति अकेले आरोपी को नहीं मिल सकती थी।
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फैसला

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी टूटी हुई पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया: “संक्षेप में, न तो आपत्तिजनक परिस्थितियां उचित संदेह से परे साबित हुईं और न ही उन्होंने ऐसी पूर्ण श्रृंखला बनाई जो आरोपी की बेगुनाही के अनुरूप हर परिकल्पना को खारिज कर सके और निर्णायक रूप से यह दर्शा सके कि सभी मानवीय संभावनाओं के अनुसार यह अपराध आरोपी ने ही किया था और किसी अन्य ने नहीं।”

हाईकोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या विकृति न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और आरोपी को बरी रखने का निर्णय बरकरार रखा।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम आंचला उर्फ चंचला
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 166/2019
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस विजय बिश्नोई
निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026

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