अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित रहने के दौरान अंतरिम स्तर पर वकीलों को प्रैक्टिस से निलंबित करने का अधिकार बार काउंसिल के पास नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

दो वकीलों के खिलाफ जारी अंतरिम निलंबन आदेश को रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित रहने के दौरान किसी वकील को अंतरिम स्तर पर प्रैक्टिस से निलंबित करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने माना कि अधिनियम की धारा 35(3)(सी) के तहत दिया जाने वाला निलंबन आदेश एक अंतिम आदेश की प्रकृति का होता है, जिसे अंतरिम कदम के रूप में पारित नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सेंट्रल बार एसोसिएशन, सिविल कोर्ट, लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महासचिव अवनीश दीक्षित द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल रिट याचिका से जुड़ा है। दोनों याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की अनुशासन समिति के चेयरमैन द्वारा 26 सितंबर 2026 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनका पंजीकरण अगले आदेश तक के लिए निलंबित कर दिया गया था।

अनुशासन समिति के समक्ष यह कार्रवाई उन आरोपों के आधार पर शुरू की गई थी जिन्हें गंभीर प्रकृति का बताया गया था। आरोपों के अनुसार, दोनों वकीलों ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के प्रस्ताव और उसके चेयरमैन के आदेश को खारिज कर दिया था तथा इसे उत्तर प्रदेश के दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया था।

जब 26 सितंबर 2026 को यह मामला अनुशासन समिति के समक्ष पेश हुआ, तब याचिकाकर्ताओं की ओर से उनके अधिवक्ता श्री अनीश कुमार सिंह और श्री ज्योतिरेष पांडेय ने वकालतनामा दाखिल किया। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं ने एक प्रार्थना पत्र देकर शिकायत की प्रति उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। हालांकि, इस प्रार्थना पत्र पर कोई निर्णय लिए बिना ही अनुशासन समिति के चेयरमैन ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी और साथ ही यह आदेश पारित कर दिया:

“सुना गया। सुनवाई की अगली तिथि 11.10.2026 नियत की जाती है, इस बीच दोनों अधिवक्ताओं का लाइसेंस (पंजीकरण) अगले आदेश तक निलंबित रहेगा। वे किसी भी अदालत में अधिवक्ता के तौर पर उपस्थित नहीं होंगे।”

अनुशासन समिति ने अपने कार्यालय को यह भी निर्देश दिया कि इस निलंबन आदेश की प्रति ईमेल के जरिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश, लखनऊ को आवश्यक सूचना हेतु भेजी जाए, साथ ही इसकी प्रतियां पुलिस आयुक्त, लखनऊ और जिलाधिकारी, लखनऊ को भी प्रेषित की जाएं। इस आदेश से आहत होकर याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत में पक्ष और वकीलों की मौजूदगी

हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट श्री शरद पाठक ने बहस की, जिनके साथ अधिवक्ता श्री मयंक पांडेय, श्री आरव सिंह और सुश्री प्रिया सिंह उपस्थित रहे।

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विपक्षी संख्या 1 (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) की ओर से अधिवक्ता श्री शैलेश कुमार पाठक ने पैरवी की।

विपक्षी संख्या 2 और 3 (उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के प्राधिकारी) की ओर से अधिवक्ता श्री सुभाष चंद्र पांडेय ने पक्ष रखा।

इससे पहले अनुशासन समिति के समक्ष याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता श्री अनीश कुमार सिंह और श्री ज्योतिरेष पांडेय ने किया था।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और टिप्पणियां

आक्षेपित आदेश का अवलोकन करने के बाद खंडपीठ ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की प्रति मांगी थी, लेकिन आदेश इस बात पर पूरी तरह मौन है कि क्या उन्हें वह प्रति दी गई, क्या वह पहले ही उपलब्ध करा दी गई थी, या फिर किसी कारणवश उनकी यह मांग विचारणीय नहीं मानी गई। पीठ ने टिप्पणी की कि एक तरफ सुनवाई 11 अक्टूबर 2026 तक स्थगित करना और दूसरी तरफ उसी सांस में अधिवक्ताओं के लाइसेंस अगले आदेश तक निलंबित कर देना कानून के प्रतिकूल प्रतीत होता है।

एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35(3) के कानूनी ढांचे का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर देने के बाद अनुशासन समिति केवल वही आदेश पारित कर सकती थी जो धारा 35(3) के तहत निर्धारित हैं, जैसे—शिकायत को खारिज करना या कार्यवाही समाप्त करना, अधिवक्ता को फटकार लगाना, एक निश्चित अवधि के लिए प्रैक्टिस से निलंबित करना, या राज्य की अधिवक्ता सूची से नाम हटाना।

अंतरिम निलंबन पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“वर्तमान मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि प्राधिकारी ने अधिवक्ताओं/याचिकाकर्ताओं को अगले आदेश तक प्रैक्टिस से निलंबित कर दिया है। पहली बात तो यह कि बिना अवधि तय किए अनिश्चितकाल के लिए किया गया यह निलंबन कानूनन टिकने योग्य नहीं लगता। दूसरी बात, एक बार जब अनुशासन समिति ने निलंबन का आदेश पारित कर दिया, तो याचिकाकर्ताओं को नया नोटिस जारी किए बिना और उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना उनके खिलाफ कोई और प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जा सकती थी। इस न्यायालय के अनुसार, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35(3)(सी) में उल्लिखित निलंबन का आदेश एक अंतिम आदेश है और इसे उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा अंतरिम स्तर पर पारित नहीं किया जा सकता था।”

हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष के समर्थन में मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा ‘आर. जिम बनाम सेक्रेटरी, बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु एंड पुडुचेरी’ (2025 एससीसी ऑनलाइन मद्रास 14556) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें पैरा 122 में कहा गया था:

“122. उपरोक्त चर्चा के आलोक में, हमारा यह विचार है कि तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान किसी व्यक्ति को अंतरिम निलंबन पर रखने का अधिकार नहीं है। हम निम्नलिखित निष्कर्ष देते हैं:- (i) एडवोकेट्स एक्ट ने बार काउंसिल को अनुशासनात्मक जांच लंबित रहने के दौरान किसी अधिवक्ता को निलंबित करने का कोई अधिकार नहीं दिया है; (ii) व्याख्या के माध्यम से अदालतें किसी वैधानिक निकाय के उन अधिकारों का विस्तार नहीं कर सकतीं जो उसे कानूनन स्पष्ट रूप से नहीं दिए गए हैं; (iii) जब एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35 निलंबन का आदेश पारित करने से पहले नोटिस जारी करने, आरोप तय करने, विधिवत विचारण और सुनवाई की प्रक्रिया की व्यवस्था करती है, तो ऐसा एकपक्षीय अंतरिम आदेश कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता; (iv) जब एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 6 बार काउंसिल के ‘कार्यों’ का उल्लेख करती है, तो इसे बार काउंसिल को ‘शक्तियां’ प्रदान करने के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता; (v) किसी भी स्थिति में, चूंकि यह आदेश परस्पर विरोधी है और रिट याचिकाकर्ता को सुने बिना पारित किया गया है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले में प्राधिकारियों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया न तो एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों के अनुरूप है और न ही मद्रास हाईकोर्ट द्वारा ‘आर. जिम’ मामले में प्रतिपादित कानून के अनुकूल है।

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हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

अंतरिम निलंबन को कानून की दृष्टि में अनुचित और अस्थिर मानते हुए हाईकोर्ट ने 26 सितंबर 2026 के आक्षेपित आदेश को पूरी तरह निरस्त और रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अनुशासन समिति के समक्ष नियत अगली तिथि यानी 11 अक्टूबर 2026 को उपस्थित हों। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि कोई दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को दिए जाने बाकी हैं, तो याचिकाकर्ताओं द्वारा मांग किए जाने के 24 घंटे के भीतर उत्तर प्रदेश बार काउंसिल नियमानुसार वे दस्तावेज उपलब्ध कराएगी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता मामले में अनावश्यक स्थगन (तारीख) की मांग नहीं करेंगे। इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अखिलेश जायसवाल और अन्य बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया व 2 अन्य
वाद संख्या: रिट-सी संख्या 10924/2026
पीठ: जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर, 2026

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