पेंशन बकाए में देरी पर ब्याज दर तय करने वाले सरकारी सर्कुलर अदालतों पर बाध्यकारी नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 18% ब्याज के आदेश को रखा बरकरार

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में देरी पर निचली ब्याज दरें निर्धारित करने वाले प्रशासनिक सर्कुलर अदालतों या ट्रिब्यूनलों को उच्च मुआवजा देने से नहीं रोक सकते, खासकर तब जब किसी कर्मचारी को अपने वैध हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने को विवश किया गया हो। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुनीता गंधम की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (एपीएटी) के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि राज्य सरकार अप्रमाणित वित्तीय आरोपों की आड़ में सेवानिवृत्ति देयों के वितरण में वर्षों की देरी को उचित नहीं ठहरा सकती। इसके साथ ही अदालत ने एक सेवानिवृत्त अधिकारी को 18% वार्षिक दर से ब्याज देने के फैसले को सही ठहराया, जिनके बकाए का भुगतान सात वर्षों से अधिक समय तक रोके रखा गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद रोद्दम में मंडल परिषद विकास अधिकारी (एमपीडीओ) के पद पर कार्यरत रहे श्री बोल्लापल्ली वेंकट कृष्ण मूर्ति (प्रतिवादी संख्या 1) की सेवानिवृत्ति के बाद शुरू हुआ। वह 31 अगस्त 1995 को सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके सेवाकाल के दौरान ऑडिट विभाग ने स्टेशनरी, फर्नीचर, नक्शे, चार्ट खरीदने, ब्याज वाले ऋण मंजूर करने और अन्य मदों से धनराशि के डायवर्जन को लेकर ₹7,75,848 के व्यय पर आपत्ति जताई थी।

उनकी सेवानिवृत्ति के करीब चार साल बाद, 19 जून 1999 को पंचायती राज एवं ग्रामीण रोजगार आयुक्त ने आंध्र प्रदेश रिवाइज्ड पेंशन रूल्स, 1980 के नियम 9 के तहत उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का प्रस्ताव भेजा। हालांकि, प्रशासनिक जांच में पाया गया कि अत्यधिक समय बीत जाने के कारण अब अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। वित्त और योजना विभाग ने भी इस स्थिति पर सहमति व्यक्त की, लेकिन उसने आपराधिक कार्रवाई शुरू करने या सरकार को हुए नुकसान की वसूली करने की सलाह दी।

इसके बाद, जिला परिषद अनंतपुर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने 28 फरवरी 2001 को एक रिपोर्ट में कहा कि वित्तीय अनियमितताओं के कारण ₹7,75,848 का नुकसान हुआ है। हालांकि, ऑडिट विभाग पहले ही ₹59,254 और ₹3,16,200 से संबंधित आपत्तियों को समाप्त कर चुका था, जिससे ₹4,00,384 की शेष राशि ही असत्यापित बची थी। अपने सेवानिवृत्ति लाभों के अनिश्चितकालीन निलंबन से व्यथित होकर कर्मचारी ने एपीएटी में मूल आवेदन (ओ.ए. संख्या 4410/2001) दायर किया और 18% वार्षिक ब्याज के साथ पेंशनरी लाभ तुरंत जारी करने की मांग की।

ट्रिब्यूनल में मामला लंबित रहने के दौरान, मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने 9 सितंबर 2002 को एक और रिपोर्ट देकर प्रिंटरों को अधिक भुगतान किए जाने के एवज में ₹7,007 की वसूली की सिफारिश की। सेवानिवृत्त अधिकारी ने तत्काल यह राशि जमा कर दी। इसके बाद सरकार ने 26 फरवरी 2003 को सरकारी आदेश (जी.ओ. आरटी सं. 251) जारी कर उनके रोके गए पेंशन लाभ जारी किए।

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21 मार्च 2006 को एपीएटी ने मामले का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सेवानिवृत्ति की तारीख से विलंबित अवधि के लिए 18% वार्षिक ब्याज के साथ पूरी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ जारी करे। आंध्र प्रदेश सरकार ने 18% ब्याज देने के इस निर्देश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता राज्य की ओर से सहायक सरकारी वकील श्री चल्ला श्रीनिवास ने दलील दी कि केवल वैधानिक समय सीमा समाप्त हो जाने के कारण ही विभागीय कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकी थी। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि कर्मचारी ने मांगी गई ₹7,007 की राशि जमा कर दी थी, इसलिए यह मान लिया जाना चाहिए कि वह वित्तीय अनियमितताओं के दोषी पाए गए थे।

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित ब्याज दर अत्यधिक थी और मौजूदा सरकारी नीतियों के विपरीत थी। सरकारी वकील ने 21 अप्रैल 1999 के सरकारी सर्कुलर मेमो का हवाला दिया, जिसमें ग्रेच्युटी भुगतान में तीन महीने से अधिक और एक वर्ष तक की देरी पर 7% और एक वर्ष से अधिक की देरी पर 10% वार्षिक ब्याज का प्रावधान था। इसके अलावा 20 फरवरी 2006 के एक अन्य सर्कुलर मेमो का उल्लेख किया गया, जिसके तहत इन दरों को घटाकर क्रमशः 4.5% और 5% कर दिया गया था। इन आधारों पर राज्य ने दलील दी कि 18% ब्याज देने का निर्देश टिकने योग्य नहीं है।

हाईकोर्ट के समक्ष प्रतिवादियों की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस सुनीता गंधम ने शुरुआत में ही रेखांकित किया कि राज्य सरकार एपीएटी के समक्ष कोई जवाबी हलफनामा (काउंटर) दाखिल करने में विफल रही थी और उसने उपयुक्त समय पर इन सर्कुलरों को ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड पर भी नहीं रखा था। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की विफलता को सामान्यतः नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, फिर भी पक्षों के बीच पूर्ण न्याय करने के उद्देश्य से अदालत ने कानूनी बिंदुओं का गुण-दोष के आधार पर परीक्षण किया।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि मामूली विवादित राशि जमा करने का अर्थ यह है कि कर्मचारी ने अपना दोष स्वीकार कर लिया या उसका दोष साबित हो गया। उचित प्रक्रिया के महत्व पर जोर देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

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“धनराशि की वसूली मात्र से कदाचार या दोष का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। ऐसा निष्कर्ष कानून के अनुसार, अनुशासनात्मक कार्यवाही पर लागू प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही दर्ज किया जाना चाहिए। ₹7,007 की अदायगी स्पष्ट रूप से सरकार के निर्देश पर की गई थी और यह अपने आप में दोष का निष्कर्ष नहीं बन सकती।”

सेवानिवृत्ति पर बकाए का भुगतान करने के नियोक्ता के दायित्व पर चर्चा करते हुए पीठ ने दोहराया कि एक सेवानिवृत्त कर्मचारी प्रासंगिक सेवा नियमों के तहत पेंशन लाभ पाने का कानूनी रूप से हकदार है, और राज्य का यह दायित्व है कि वह उचित समय के भीतर इन लाभों का वितरण सुनिश्चित करे। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले स्टेट ऑफ केरला व अन्य बनाम एम. पद्मनाभन नायर का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब राज्य बिना किसी पर्याप्त औचित्य के वैध रूप से देय राशि के भुगतान में देरी करता है, तो सेवानिवृत्त कर्मचारी उस देरी की अवधि के लिए ब्याज के रूप में उचित मुआवजे का हकदार होता है।

हाईकोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ द्वारा ए.जे. रंधावा (सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता) बनाम पंजाब राज्य में दिए गए निर्णय का भी संदर्भ दिया, जिसमें माना गया था कि मामले की परिस्थितियों, देरी की अवधि और पक्षों के आचरण को देखते हुए आम तौर पर 18% तक का उचित ब्याज दिया जा सकता है।

पीठ ने इस बात पर विशेष बल दिया कि सेवानिवृत्ति लाभ कोई अनुकंपा या खैरात नहीं बल्कि अर्जित संवैधानिक अधिकार हैं। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय डी.डी. तिवारी (मृत) विधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से बनाम उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड व अन्य को उद्धृत करते हुए कहा गया:

“पेंशन और ग्रेच्युटी सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पर बांटी जाने वाली कोई खैरात नहीं है, बल्कि यह उनके हाथों में मूल्यवान अधिकार और संपत्ति है, और इसके निपटान तथा संवितरण में किसी भी गैर-वाजिब देरी पर ब्याज का भुगतान किया जाना चाहिए।”

ब्याज दरों को सीमित करने वाले विभागीय सर्कुलरों पर राज्य की निर्भरता का जवाब देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि विभाग द्वारा अपनी मर्जी से किए जाने वाले भुगतान और कर्मचारी को मुकदमेबाजी के लिए मजबूर किए जाने वाले मामलों में बड़ा अंतर होता है:

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“सर्कुलर मेमो के संबंध में हमारा मानना है कि यदि राज्य ने स्वयं सेवानिवृत्ति लाभों की प्रक्रिया पूरी की होती और उस प्रक्रिया में देरी हुई होती, तो कर्मचारी को 21.04.1999 के सर्कुलर मेमो के अनुसार तय दर पर ब्याज दिया जा सकता था। लेकिन, यहां कर्मचारी को अपनी शिकायत के निवारण के लिए ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाना पड़ा। भुगतान 31.08.1995 को सेवानिवृत्ति पर देय हो गया था, लेकिन वास्तव में इसका भुगतान बाद में 26.02.2003 को किया गया। सर्कुलर मेमो अदालत या ट्रिब्यूनल को उसमें उल्लिखित दर पर ब्याज देने के लिए बाध्य नहीं करेगा। यह उच्च दर पर ब्याज दे सकता है।”

अपने निष्कर्ष को और सुदृढ़ करने के लिए पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय विजय एल. मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के मुख्य अंशों को उद्धृत किया:

“3. सेवा पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी के मामले में यह अपेक्षा की जाती है कि सेवानिवृत्ति के सभी लाभों का भुगतान सेवानिवृत्ति की तारीख पर या उसके तुरंत बाद कर दिया जाए, यदि किन्हीं अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण सेवानिवृत्ति की तारीख पर भुगतान न किया जा सका हो।”

“4. इस मामले में, महीनों तक भुगतान न करने का बिल्कुल कोई कारण या औचित्य नहीं है। इसलिए, हम प्रतिवादी को निर्देश देते हैं कि वह अपीलकर्ता को आज से 12 सप्ताह के भीतर उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख यानी 31-8-1997 से भुगतान की तारीख तक 18 प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का भुगतान करे।”

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने पाया कि कर्मचारी के खिलाफ कदाचार का कोई निष्कर्ष स्थापित नहीं हुआ था और 31 अगस्त 1995 से 26 फरवरी 2003 तक पेंशन लाभ रोके रखने का कोई वैध कारण मौजूद नहीं था। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि एपीएटी द्वारा 18% वार्षिक ब्याज देने के आदेश में कोई गैर-कानूनी पहलू नहीं है।

अदालत ने राज्य सरकार की रिट याचिका को आधारहीन पाते हुए खारिज कर दिया। साथ ही, याचिकाकर्ता प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे बिना किसी और देरी के सेवानिवृत्त कर्मचारी को देय राशि का भुगतान सुनिश्चित करें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: आंध्र प्रदेश सरकार व अन्य बनाम श्री बोल्लापल्ली वेंकट कृष्ण मूर्ति व अन्य 

वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 18779/2006 

पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुनीता गंधम 

निर्णय की तिथि: 29.09.2026

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