इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सात वर्षीय बच्ची से जुड़े कथित यौन उत्पीड़न और पोक्सो मामले में आरोपी को नियमित जमानत दे दी है। जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने माना कि पीड़िता के वैधानिक बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं और चूंकि पीड़िता की गवाही ट्रायल कोर्ट के समक्ष पहले ही दर्ज हो चुकी है, इसलिए सबूतों से छेड़छाड़ की कोई संभावना नहीं रह जाती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वाराणसी जनपद के थाना रामनगर में दर्ज केस क्राइम संख्या 53/2026 से संबंधित है। इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 137(2), 87, 65(2) और 62 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम की धारा 5एम/6 और 18 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
प्राथमिकी के अनुसार, आवेदक पर लगभग 7 वर्ष की नाबालिग बच्ची का यौन उत्पीड़न करने और उसकी लज्जा भंग करने का आरोप लगाया गया था। आवेदक 7 मार्च 2026 से जेल में बंद था। सुनवाई की शुरुआत में अपर शासकीय अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि प्रथम सूचनाकर्ता को मामले की विधिक सूचना तामील कराई जा चुकी है।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदक की ओर से अधिवक्ता चमन आरा और अधिवक्ता शबिस्ता परवीन पेश हुईं, जिसमें बहस शबिस्ता परवीन ने की। उन्होंने दलील दी कि आवेदक को इस मामले में झूठा फंसाया गया है। अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 180 और धारा 183 के तहत दर्ज पीड़िता के बयानों में गंभीर और महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि पीड़िता ने अपने बयानों में कपड़े उतारे जाने को लेकर कुछ नहीं कहा था। इसके अलावा, पीड़िता की गवाही ट्रायल कोर्ट में पहले ही पूरी हो चुकी है, इसलिए साक्ष्यों या गवाहों को प्रभावित करने की कोई गुंजाइश नहीं है। आवेदक का कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं है और वह 7 मार्च 2026 से लगातार जेल में बंद है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जमानत मिलने पर आवेदक स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगा और विचारण की कार्यवाही में पूरा सहयोग करेगा।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से उपस्थित अपर शासकीय अधिवक्ता शिव दत्त शुक्ला और हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति की ओर से अधिवक्ता उत्कर्षणी सिंह ने जमानत अर्जी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि पीड़िता मात्र 7 वर्ष की नाबालिग बच्ची है। उन्होंने विशेष रूप से इंगित किया कि बीएनएसएस की धारा 183 के तहत दर्ज बयान में पीड़िता ने कहा था कि आवेदक ने उसके कपड़े उतारे थे।
अदालत की टिप्पणियां और कानूनी विश्लेषण
पत्रावली और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने आरोपों की प्रकृति और दर्ज बयानों की समीक्षा की। हाईकोर्ट ने स्पष्ट तौर पर टिप्पणी की:
“एफआईआर के आरोपों के अनुसार, आवेदक पर लगभग 07 वर्ष की पीड़िता का यौन उत्पीड़न करने और उसकी लज्जा भंग करने का आरोप है, हालांकि, बीएनएसएस की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज पीड़िता के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास प्रतीत होते हैं।”
साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका और हिरासत की अवधि पर विचार करते हुए अदालत ने कहा:
“पीड़िता की गवाही ट्रायल कोर्ट के समक्ष पहले ही हो चुकी है, इसलिए सबूतों से छेड़छाड़ की कोई संभावना नहीं है। आवेदक 7 मार्च 2026 से जेल में बंद है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।”
जमानत पर विचार करते हुए अदालत ने व्यावहारिक पहलुओं का भी संज्ञान लिया और “जेलों में बंदियों की अत्यधिक भीड़ और विचारण न्यायालयों में आपराधिक मामलों के भारी लंबित रहने” की स्थिति को ध्यान में रखा। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा कपिल वधावन बनाम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (2025 एससीसी ऑनलाइन एससी 3038) में दिए गए फैसले और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा माया तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024 एससीसी ऑनलाइन ऑल 6765) में प्रतिपादित दिशानिर्देशों को ध्यान में रखते हुए, तथा मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना आवेदक को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट का निर्णय और जमानत की शर्तें
हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी को स्वीकार करते हुए आवेदक को संबंधित ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार एक व्यक्तिगत बंधपत्र और समान राशि के दो जमानतदार प्रस्तुत करने पर रिहा करने का निर्देश दिया।
अदालत ने जमानत के लिए निम्नलिखित अनिवार्य शर्तें तय कीं:
- आवेदक मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई प्रलोभन, धमकी या वचन नहीं देगा, जिससे वह अदालत या पुलिस के समक्ष तथ्यों को उजागर करने से विमुख हो, और न ही वह किसी सबूत से छेड़छाड़ करेगा।
- आवेदक बिना कोई स्थगन मांगे पूरी निष्ठा के साथ मुकदमे और जांच में सहयोग करेगा।
- जमानत पर रिहा होने के बाद आवेदक किसी भी आपराधिक गतिविधि या अपराध में लिप्त नहीं होगा।
- आवेदक अपने द्वारा निष्पादित बंधपत्र की शर्तों के अनुसार अदालत में उपस्थित रहेगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन जमानत रद्द करने का आधार बनेगा। साथ ही, ट्रायल कोर्ट को जमानत स्वीकार करने से पहले आवेदक और जमानतदारों की पहचान, स्थिति, निवास प्रमाण, मोबाइल नंबर और आधार कार्ड का सत्यापन करने का निर्देश दिया गया।
रिहाई में होने वाली अनावश्यक देरी को रोकने के लिए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया कि वह बेल ऑर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (बीओएमएस) के माध्यम से संबंधित जेल को तत्काल रिहाई आदेश भेजे। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन री: पॉलिसी स्ट्रेटजी फॉर ग्रांट ऑफ बेल (सुओ मोटो रिट पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 4/2021) में जारी निर्देशों के अनुपालन में, हाईकोर्ट रजिस्ट्री को आदेश की प्रति ई-मेल या ई-प्रिजन पोर्टल के माध्यम से संबंधित जेल अधीक्षक को 24 घंटे के भीतर आवेदक तक पहुंचाने के लिए प्रेषित करने का निर्देश दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अशफ़ाक उर्फ मूसे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य
वाद संख्या: आपराधिक प्रकीर्ण जमानत आवेदन संख्या 15354 / 2026
पीठ: जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा
निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026

