केरल हाईकोर्ट का फैसला: 55 वर्षीय व्यक्ति को 56 की उम्र तक सरोगेसी प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति

केरल हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि 55 वर्ष का व्यक्ति 56 वर्ष की आयु पूरी होने तक सरोगेसी की प्रक्रिया जारी रख सकता है। अदालत ने माना कि यदि किसी कानूनी व्याख्या के कारण दंपत्ति को स्थायी रूप से संतान प्राप्ति के अधिकार से वंचित होना पड़ता है, तो ऐसे मामलों में गहन न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता होती है।

यह आदेश जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन की पीठ ने कोल्लम निवासी एक शादीशुदा जोड़े की याचिका का निपटारा करते हुए जारी किया। सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 की धारा 4(iii)(c) के तहत पति की उम्र 55 वर्ष होने के बाद अस्पताल ने प्रक्रिया रोक दी थी। इसके खिलाफ दंपत्ति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने निर्देश दिया कि पति के 56 वर्ष पूरे होने तक दंपत्ति को सरोगेसी की सुविधाएं प्रदान की जाएं।

समान कानूनी मानक लागू करने का तर्क

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में ‘रजिता पी. वी.’ मामले में दिए गए डिवीजन बेंच के एक पूर्व निर्णय का हवाला दिया। उस मामले में अदालत ने महिला की कानूनी आयु सीमा (23 से 50 वर्ष) की व्याख्या करते हुए कहा था कि ’50 वर्ष तक’ का अर्थ महिला का पूरा 50वां वर्ष शामिल होना है। इसका तात्पर्य यह है कि महिला अपने 51वें जन्मदिन से एक दिन पहले तक सरोगेसी के लिए पात्र रहती है।

जस्टिस मेनन ने इसी सिद्धांत को पुरुषों के मामले में भी लागू करते हुए कहा कि जो कानूनी मापदंड महिला के लिए अपनाया गया है, वही पति पर भी लागू होना चाहिए। चूंकि याचिकाकर्ता पति ने अभी 56 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, इसलिए वह सरोगेसी की आगे की प्रक्रिया के लिए पूरी तरह योग्य है।

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2022 से क्रायोप्रीजर्व है दंपति का एम्ब्रियो

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, दंपत्ति ने कानूनी विवाद शुरू होने से काफी पहले ही सरोगेसी की चिकित्सा प्रक्रिया प्रारंभ कर दी थी। अदालत के समक्ष पेश किए गए मेडिकल प्रमाण पत्रों से पुष्टि हुई कि दंपत्ति का भ्रूण (एम्ब्रियो) वर्ष 2022 में ही तैयार कर सुरक्षित (क्रायोप्रीजर्व) रख लिया गया था।

पति के 55 वर्ष का होते ही सेवाएं रोक दी गईं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यदि उन्हें इलाज पूरा करने की अनुमति नहीं मिली, तो 2022 से सुरक्षित रखा एम्ब्रियो बेकार हो जाएगा और वे हमेशा के लिए माता-पिता बनने का अवसर खो देंगे।

मौलिक अधिकारों और मानवीय पक्ष पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

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अदालत ने 21 अगस्त के अपने निर्णय में कहा कि मातृत्व और पारिवारिक जीवन व्यक्ति के बेहद निजी और मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं। कानून की ऐसी व्याख्या से बचना चाहिए जिससे किसी व्यक्ति का संतान प्राप्त करने का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाए।

हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि कानूनी व्याख्या कोई केवल सैद्धांतिक अभ्यास नहीं है, क्योंकि इसके सीधे परिणाम आम लोगों के जीवन और उनके अधिकारों को प्रभावित करते हैं। जब किसी निर्णय से अपूरणीय क्षति की आशंका हो, तो न्यायपालिका को अधिक संवेदनशीलता और सतर्कता के साथ मामले की समीक्षा करनी चाहिए।

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