मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरोगेसी (रोगेट प्रक्रिया) के जरिए जन्म लेने वाला बच्चा कानूनी रूप से इच्छुक दंपत्ति की ही जैविक संतान माना जाएगा। अदालत ने कहा कि ऐसे बच्चे को वे सभी अधिकार और सुविधाएं मिलेंगी जो किसी प्राकृतिक रूप से जन्मे बच्चे को प्राप्त होती हैं। जस्टिस शमीम अहमद ने 5 अगस्त को यह निर्णय सुनाते हुए निचले मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने दंपत्ति को बच्चे के कानूनी माता-पिता का दर्जा देने और कस्टडी सौंपने की अर्जी खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट के इस आदेश के तहत बच्चे के जन्म लेते ही उसकी कानूनी कस्टडी तुरंत इच्छुक दंपत्ति को मिल जाएगी। अदालत ने अपने फैसले में यह शर्त भी रखी है कि दंपत्ति किसी भी स्थिति में बच्चे को छोड़ नहीं सकते और न ही सरोगेट मां भविष्य में बच्चे पर अपने अभिभावक अधिकार का दावा कर सकती है। इसके साथ ही कोर्ट ने दोहराया कि पूरी प्रक्रिया के दौरान कमर्शियल सरोगेसी (व्यावसायिक सरोगेसी) पर पूर्ण प्रतिबंध लागू रहेगा। अदालत का यह कानूनी आदेश बच्चे के जन्म के बाद आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र और हलफनामे के रूप में काम करेगा।
मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र पर हाईकोर्ट का स्पष्टीकरण
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेटी अदालत के 22 अप्रैल 2026 के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें दंपत्ति की याचिका को यह कहकर निरस्त कर दिया गया था कि यह दीवानी (सिविल) प्रकृति का मामला है और इसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत आपराधिक अधिकार क्षेत्र में नहीं सुना जा सकता। मजिस्ट्रेटी अदालत का तर्क था कि सरोगेसी अधिनियम के तहत किसी अपराध का आरोप या शिकायत दर्ज नहीं की गई है।
जस्टिस शमीम अहमद ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की धारा 4(iii)(a)(ii) के तहत प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को माता-पिता के कानूनी अधिकार और कस्टडी से जुड़ा आदेश जारी करने की सीधी वैधानिक शक्ति प्राप्त है। इसके लिए किसी आपराधिक कार्यवाही या शिकायत का होना जरूरी नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट का काम केवल यह देखना है कि कानूनी शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं। मजिस्ट्रेट को यह अधिकार नहीं है कि वह जांच का दायरा बढ़ाए या जिला मेडिकल बोर्ड और सक्षम प्राधिकारी द्वारा पहले से मंजूर फैसलों की समीक्षा करे।
तीन स्तरीय कानूनी ढांचा
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने सरोगेसी अधिनियम के तहत गठित तीन स्तरीय व्यवस्था की भूमिका को रेखांकित किया। इसके तहत जिला मेडिकल बोर्ड का काम चिकित्सीय जरूरतों का मूल्यांकन करना है, सक्षम प्राधिकारी पात्रता और अनिवार्य शर्तों की जांच करता है, जबकि मजिस्ट्रेट की वैधानिक जिम्मेदारी बच्चे के माता-पिता का कानूनी दर्जा तय करने और कस्टडी का आदेश जारी करने तक सीमित है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 21 अगस्त 2006 को विवाह बंधन में बंधे एक दंपत्ति से जुड़ा है, जिन्होंने शादी के कई सालों तक संतान न होने के बाद सरोगेसी का रास्ता चुना था। सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद दंपत्ति और सरोगेट मां दोनों को 7 मार्च को पात्रता प्रमाण पत्र जारी किए गए थे। दंपत्ति का प्रमाण पत्र 28 फरवरी 2027 तक और सरोगेट मां का प्रमाण पत्र 6 मार्च 2027 तक वैध है। 10 अप्रैल को दंपत्ति ने सरोगेट मां के लिए अनिवार्य 36 महीने का स्वास्थ्य बीमा भी करा लिया था।
सभी वैधानिक शर्तें पूरी करने के बाद दंपत्ति और सरोगेट मां ने संयुक्त रूप से 21 अप्रैल को ई-फाइलिंग के जरिए याचिका दायर की थी। मजिस्ट्रेट के सामने यह मामला 22 अप्रैल को पेश हुआ और उसी दिन इसे सुनवाई के योग्य न मानकर खारिज कर दिया गया, जिसके बाद दंपत्ति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

